कुछ देर में मन को दृढ करते हुए, दोनों आखों से बहते आंसुओं को अपने स्लीवलेस टॉप से पोंछने की नाकाम कोशिश करते हुए उसने बहुत हिम्मत करके नंबर डायल किया.
“सुनो एक बार मिलना है तुमसे.”
“नहीं!”
“बस एक बार”
“नहीं!”
“इतने निष्ठुर न बनो, एक दोस्त की तरह ही मिल लो.”
“मैं नहीं मिलना चाहता तुमसे. हमारे बीच जो कुछ था, अब खत्म हो चुका है फ़रहत. अब मिलकर करोगी भी क्या? मैं फिर उसी चक्र में फंसना नहीं चाहता.”
“कम से कम एक बार मिल लो, पांच मिनट से ज्यादा नहीं लूँगी.”
“ठीक है, मैं पुणे में ही हूँ. अपनी मंगेतर से मिलने आया था. मिल लो, हम कल सेंट्रल मॉल जा रहे हैं, वहीं आ जाओ.”
“उसका होना जरूरी है?”
“हाँ, उससे मेरी शादी होने वाली है. वह रहेगी तो ठीक ही रहेगा.”
“अकेले मिल लोगे तो उससे छीन नहीं लूँगी तुमको. वैसे भी तुमने फैसला तो कर ही लिया है, कौन सा तुम बदल जाओगे?”
“हाँ, फैसला तो नहीं बदलेगा पर कल दोपहर एक बजे करीब मिलते हैं. तीनो साथ खाना खाएंगे.”
इस बातचीत के बाद फरहत ने फोन काट दिया. वह बहुत बेचैन थी. उसने उस बैग को सीने से लगाया और रोते रोते कब सो गई, पता नहीं चला. उधर धीर के मन में एक अजीब सा डर घर गया. उसने उसे आने को कह तो दिया था लेकिन उसे लग रहा था कि ठीक नहीं किया. छह साल के रिश्ते में सामान्य प्रेमियों की तरह इन दोनों के पांच ब्रेकअप हो चुके थे. बात मामूली होती थी लेकिन ले-देकर ब्रेकअप पर रुक जाती. चार दिन से लेकर एकाध महीने तक बातचीत बंद रहती और फिर एक समय आता कि प्रेम की पीड़ा सारे झगडे भुला देती. दोनों की प्रेमकहानी उस झगडे को उसी मोड़ पर छोड़ कर आगे बढ़ जाती. लेकिन जब छठी बार ऐसा हुआ तो बात कुछ ज्यादा ही बढ़ गई. दोनों की बढ़ती उम्र पर माँ बाप का तकाजा था कि दोनों शादी कर लें, लेकिन मामला उलझ गया था. दोनों के मन में शंका घर कर गई थी. एक तरफ धीर का दिमाग दिल्ली के उस लड़के की हत्या के बाद से कुछ विचलित सा था, ऊपर से फ़रहत के घरवालों की धमकियां आनी शुरू हो गई थीं. इस सबका तोड़ तो धीर ने निकाल लिया था. उसकी योजना शादी के बाद देश छोड़कर सेटल होने की लगभग बन चुकी थी. दोनों शादी की बात कर रहे थे, धीर के घर में लगभग फ़रहत को स्वीकार कर लिया गया था. लेकिन उसे जो बात खटक रही थी, वह था फरहत का कुछ बातों पर अड़ियल रवैया अपना लेना. कभी कभी कुछ बातों पर अड़ जाती तो कोई ओर छोर नहीं मिलता.
फरहत को आने वाले कल पर भरोसा नहीं था. वह कल की घटनाओं को आज ही लिखकर तय कर देना चाहती थी. कब क्या करना है, कैसे करना है, कौन घर के क्या काम करेगा, वो घर के कौन से काम नहीं करेगी, ठीक भी था. दोनों की बार बार उन्ही बातों पर चर्चा होती, लेकिन निष्कर्ष न निकलता. चर्चा के विषयों की जैसे लिस्ट बनने लगी और फिर लिस्ट की हर बात पर बहस होने लगी. धीर को लग रहा था जैसे शादी नहीं कोई कॉन्ट्रैक्ट करने जा रहा है पर सबकुछ शर्तों पर तो नहीं चल सकता. घटनाएं समय के साथ उतार चढ़ाव तो लाएंगी ही लेकिन फरहत को यह समझ नहीं आता. फिर एक दिन बहस बढ़ी और उनका छठा ब्रेकअप हो गया. धीर ने इस बार कसम ही खा ली कि बाद में ऐसे झगडे होने से अच्छा है कि सब छोड़ दिया जाए. कुछ घर से भी दबाव था और कुछ तेजी से गुजरते समय में आवश्यक ठहराव की कमी. एक वह दिन था और एक आज का दिन था जब दोनों के बीच बात हुई थी पूरे एक साल होता बाद. धीर अब इन सब बातों से आगे निकल कर शादी कर लेना चाहता था, वह आगे बढ़ चुका था लेकिन वो अब भी वहीं अटकी हुई थी.
धीर फ़ूड कोर्ट में बैठा हुआ प्रतीक्षा कर रहा था. उसने चाय आर्डर की और कप लेकर रेलिंग की तरफ वाली टेबल पर बैठ गया. उसे पसंद था रेलिंग की तरफ बैठना, ऊपर से आते जाते, एस्कलेटर पर चढ़ते उतरते लोगों को देखकर न जाने कैसा सुकून मिलता था उसे. शायद घर से दूर अजनबी शहर के अकेलेपन में ऐसे लोगों को आते जाते देखना उसे कुछ याद दिलाता था. उसने चाय में दो पैकेट चीनी के डाले और प्लास्टिक की छोटी सी चम्मच घुमाने लगा. कप में चाय के घूमने से से जो छोटा सा भंवर बन रहा था, उसे अपनी जिंदगी वैसी ही घूमती दिख रही थी. बस घूम रही थी और उसमे न जाने क्या क्या चीनी की तरह घुलता जा रहा था. बस कप को उठा कर होंठो से लगाया ही था कि उसे सामने से वो आती हुई दिखी. वो कितनी अलग लग रही थी. उसने हाथ हिलाकर अभिवादन किया और आकर सामने बैठ गई. दोनों बातें कर ही रहे थे कि फरहत भी आ ही गई. आकर वह उस लाल चौकोर टेबल के एक ओर बैठ गई.
उसने धीर से तो कुछ न कहा लेकिन दूसरी तरफ मुड़कर बोली; “तुमने ऐसा क्यों किया रक्षा?”
रक्षा ने धीरे से कहा; “तुम जो कहना चाहो, कह लो फरहत.”
“तुम्हे मैंने अपनी बहन की तरह माना था, तुमने मुझे धोखा दिया. तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी.”; फरहत रुकी नहीं.
रक्षा ने बचाव किया; “मैंने तुम दोनों को पूरा समय दिया था फरहत, धीर से शादी की बात करने से पहले मैं एक साल रुकी रही. इसी उम्मीद में कि तुम दोनों हमेशा की तरह फिर एक हो जाओगे.”
धीर ने बीच में कहा; “इसमें रक्षा अकेली क्या करती, निर्णय मेरा था. मैं शादी के लिए लड़की ढूंढ रहा था और मुझे लगा कि रक्षा से ठीक लड़की मेरे लिए हो नहीं सकती.”
फरहत ने झिड़की देते हुए कहा; “तुमसे तो मैं अकेले में बाद में बात करुँगी.”
धीर अडिग था; “नहीं, जो कहना है यहीं कहो.”
फरहत ने ताना दिया; “आज मैं इतनी पराई हो गई?”
धीर ने बात खत्म करने की कोशिश की; “हाँ ! अब तुम पराई ही हो.”
फरहत ने रक्षा की ओर रुख करके पूछा; “तुम शुरू से ही मुझसे धीर को छीन लेना चाहती थी न?”
चारों तरफ से लोग इस तमाशे को देख रहे थे लेकिन फरहत रुकने का नाम नहीं ले रही थी और रक्षा आत्मरक्षा में लगी हुई थी.
बहुत देर बाद जब फरहत का गुस्सा शांत हुआ तो इतना ही बोली; “मैं तुम दोनों के लिए खुश हूँ. जाओ खुश रहो, अब मैं कभी बीच में नहीं आउंगी.”
“हम आगे बढ़ गए हैं. तुम भी आगे बढ़ो फरहत, अपनी जिंदगी देखो”; धीर ने कहा.
फरहत ने वो बैग उठाया और धीर के हाथ में रखते हुए कहा कि इसमें तुम्हारी यादें हैं और उठ कर चली गई.
धीर और रक्षा चुप थे. क्या कहें, समझ ही न आ रहा था. दोनों ने एक सांस भी न ली होगी कि फरहत लौट कर आई और धीर से बोली; “एक बार तो अकेले में बात कर लो.” धीर ने न में सर हिलाया और फिर वो चली गयी. उसने पलट कर नहीं देखा. आगे जाकर सीढ़ियों पर लड़खड़ा कर गिरी और उठकर फिर चल दी.
रक्षा ने पूछा; “क्या दे गई है बैग में?”
“पता नहीं, देखते हैं.”; धीर ने जबाब दिया.
बैग में रखे सामान को देखकर दोनों हतप्रभ थे.
रक्षा ने कहा; “ये बेड़ियाँ थीं जिनसे वह तुमसे अब तक बंधी हुई थी. अब वो भी मुक्त हो कर आगे बढ़ जाएगी. अच्छा ही हुआ जो उसके मन का ग़ुबार निकल गया.”
धीर के दिमाग में एक छिछोरी सी बात उठ रही थी कि मैं इतना भी कुछ ख़ास नहीं हूँ, कभी सोचा न था कि दो लड़कियाँ मेरे लिए ऐसे बीच बाज़ार में लड़ाई करेंगी. वाह री किस्मत!

2 Comments
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