1984 के लोकसभा चुनाव के पूर्व, कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता पश्चिम बंगाल की सीटों के लिए उम्मीदवार चुन रहे थे. कोलकाता के जादवपुर लोकसभा सीट पर किसी भी नेता ने दावेदारी पेश नही की. सन 1967 में जादवपुर लोकसभा सीट का सृजन हुआ था. तब से लेकर 1984 तक यह सीट वामपंथियों के नियंत्रण में थी. उस समय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी जादवपुर से सांसद थे. ऐसे में भला कोई क्यों इस सीट से चुनाव लड़ना चाहता? फिर भी चुनाव लड़ना तो था ही. ऐसे में पार्टी ने कांग्रेस युवा मोर्चा की 28 वर्षीया महिला कार्यकर्ता को जादवपुर का टिकट थमा दिया. कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता ने जादवपुर सीट पर चुनाव प्रचार में रुचि नही दिखाई. लेकिन जब परिणाम आये तो सभी चौंक गए. जादवपुर सीट से सोमनाथ चटर्जी पहली और आखिरी बार चुनाव हार गए थे. 28 वर्षीय युवती जिसने जीत दर्ज की, वह थीं ममता बनर्जी.
उन दिनों जहाँ पश्चिम बंगाल कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं पर माकपा से सांठगांठ का आरोप लगता था. वहीं अपनी आक्रामक राजनीति से ममता ने युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं के दिल में अपनी जगह बना ली. 1998 में ओल्ड गार्ड और युवा मोर्चा का झगड़ा जब चरम पर पहुंचा तब कांग्रेस पार्टी दो फाड़ हो गई. एक तरह से युवा मोर्चा ही तृणमूल कांग्रेस के रूप में सामने आया. शुरुआती सफलता के बाद ममता बनर्जी की राजनीति में वह समय भी आया जब 2004 के लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी मात्र एक सीट पर सिमट गई. सिंगुर आंदोलन को बंगाल की राजनीति में टर्निंग पॉइंट माना जाता है. उसके ठीक बाद हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की संख्या आधी से भी कम हो गई. यहाँ तक कि तृणमूल कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी के दर्जे के लिए जरूरी 10% सीटें भी न जीत सकी। तमाम लोगों ने ममता और तृणमूल कांग्रेस का मर्सिया पढ़ना शुरू कर दिया था. लेकिन अगले 2 वर्षों में ही ममता ने जबरदस्त वापसी की. 2009 के लोकसभा चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने वाममोर्चा के किले को ढाह दिया.
2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने नारा दिया था – बदला नही बदलाव, प्रतिकार नही परिवर्तन. इसका जबरदस्त असर हुआ और 34 वर्षों के अजेय दिखते वामपंथी शासन को बंगाल से उखाड़ फेंकने में ममता बनर्जी सफल रहीं. लेकिन जिस परिवर्तन के लिए लोगों ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया, वह कहीं दूर छिटक गया लगता है. जिस तरह वामपंथी शासन में माकपा एक गिरोह में तब्दील हो गई थी, वैसे ही तृणमूल कांग्रेस पर सिंडिकेट के तहत काम करने का आरोप लगता है जिसके कारण भ्रष्टाचार व्यवस्था का अभिन्न अंग बन गया है. तृणमूल कांग्रेस के शासन में भी विरोधी दलों और विशेषकर भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न जारी है. ऐसा लगता है कि तृणमूल कांग्रेस यह मानने को तैयार ही नही है कि लोकतंत्र में विपक्ष का स्थान भी होता है. पश्चिम बंगाल सरकार को जो ऊर्जा जनता की समस्याओं को सुलझाने में लगाना चाहिए उसका बड़ा हिस्सा विपक्ष को निबटाने में बर्बाद हो रहा है.
जाहिर है कि इन चीजों का असर तृणमूल कांग्रेस और ममता की लोकप्रियता पर पड़ा है. यदि आज तृणमूल बहुतायत में पंचायत और निकाय चुनाव जीत रही है तो इसका कारण विकल्पहीनता और भयतंत्र का राज अधिक है, तृणमूल का ‘सुशासन’ कम. तृणमूल कांग्रेस जिस तरह से भाजपा पर आक्रामक हुई, उससे भाजपा को लाभ ही हुआ है. देखें तो 1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 11% से अधिक मत मिले थे और 2016 में महज 10% मत ही मिले. मतलब भाजपा कहीं से भी पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ी शक्ति बनकर नही उभरी थी. लेकिन ममता के भाषणों में 90% हमला भाजपा पर और 10% ही वामपंथी प्रतिद्वंदियों पर होता है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा यदि नम्बर दो पार्टी बनकर उभरी है तो इसमें भाजपा के कार्यकर्ताओं के श्रम और रक्त का योगदान तो है ही लेकिन कुछ योगदान तृणमूल, कांग्रेस और माकपा के सम्मिलित हमलों का भी है. बंगाल के भाजपा के उदय से एक मौलिक परिवर्तन यह हुआ है कि वे प्रश्न उठने लगे हैं जो कल तक खेल के सेकुलर नियमों के तहत निषिद्ध माने जाते थे. बंगलादेश से जारी निर्बाध घुसपैठ के मुद्दे को भाजपा ने पूरी आक्रामकता से उठाया है. उर्दू को बढ़ावा देने, मुल्ले मौलवियों को सरकारी धन बाँटने, बिना किसी आधार के अधिकसंख्य मुस्लिम आबादी को ओबीसी कोटे से आरक्षण देने जैसे मुद्दों पर ममता बनर्जी सरकार को पहली बार जवाब देना पड़ रहा है. चिट फंड घोटाले से लेकर नारदा स्कैण्डल तक, तृणमूल के अधिकतर बड़े नेता दागदार हो चुके हैं.
तृणमूल कांग्रेस को बनाने में शामिल रहे कई नेता पार्टी से नाराज बताये जा रहे हैं. आगामी लोकसभा चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस में एक बड़ी टूट-फूट की सम्भावना से इनकार नही किया जा सकता. नागरिकता संशोधन विधेयक पर जिस तरह का साहस भाजपा ने दिखाया है, उससे पता चलता है कि बंगाल की राजनीति को भाजपा कितनी गम्भीरता से ले रही है. वहीं बांग्लादेशी घुसपैठियों को खुश करने के लिए ममता बनर्जी ने इस विधेयक पर जो रुख लिया है, उसका बंगाली हिंदुओं पर निश्चित ही प्रतिकूल असर पड़ा होगा. 2019 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि इस नई और आक्रामक भाजपा का सामना करने के लिए उनके पास क्या योजना है.
