हे पिंगल, पाणिनि, कल्हण और अभिनव गुप्त की संतानों, भरत, क्षेमेंद्र और आनंद वर्द्धन के वंशजों! विडम्बना है कि तुम्हारे पूर्वजों ने ही समूची दुनिया को पहली बार बताया था कि संगीत और साहित्य क्या है. रस, भाव और अनुभाव, विभाव से उन्होने ही विश्व का साक्षात्कार कराया. व्याकरण, योग और आयुर्वेद उनकी ही देन है. धर्म और दर्शन में उनका योगदान अतुल्य है. लेकिन आज तक तुम्हारे आँसूओं पर हिंदी के पुरोधा एक कविता न रच सके. तुम्हारे पलायन की वेदना पर एक उपन्यास नहीं लिखा जा सका जिसे साहित्य का कोई बड़ा पुरस्कार दिया जाए. एक नाटक भी न खेला गया होगा, गीत की कल्पना क्या करें हम.
दुःख तो यह है कि एक भी ट्रेन न चली तुम्हारे नाम पर जबकि दुनिया के सारे पुस्तकालय तुम्हारी किताबें से भरे पड़े हैं. उस वाग्भट्ट, भामह और रुद्रट जैसे सैकड़ों मनीषियों के नाम से दिल्ली में एक सड़क भी न होगी. लेकिन छोड़ो ये सम्मान की बातें. तुम्हारे घर फूंक दिए गए. तुम्हारी बेटियो और बहनों से बलात्कार होते रहे, तुमनें हजारो जानें गवाईं और एक दिन अपना सब कुछ छोड़कर तुम टेंटों में जीवन गुजारने लगे.
तीस वर्षों से चुप है मानवाधिकार की नित नयी परिभाषाएं गढ़ने वाले. सेक्युलरिज्म की नानी तो हर साल उन्नीस जनवरी को मर जाती है और कोई मर्सिया पढ़ने भी नहीं आता. कोई सहिष्णुतावादी पुरस्कार नहीं लौटाता. हाँ, मुझ जैसों को थोड़ी शर्म जरूर आती है कि तुम बस राजनीतिक रूप से ही नहीं, बौद्धिक रूप से भी छले गए. तुम्हारे आँसूओं की कीमत इस देश के राजनैतिक व बौद्धिक विमर्श में कुछ भी नहीं है.
तुमसे बेहतर तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की किस्मत है जिन पर संसद से लेकर मीडिया के गलियारों में संवेदना के न जाने कितने लाउडस्पीकर चीख रहे हैं. शायद इन्ही चीखों में तुम्हारे लिए बनने वाली हर संवेदना दम तोड़ देती है. काश, तुमने भी खुद को वोट बैंक बनाया होता.
‘लेकर रहेंगे आजादी’ के नारों के शोर के बीच तुमने बुलंदी से यह कहा होता कि कश्मीर पहले हमारा है. ये तुम्हारा जायज हक था. तुमने कुछ नेता तो पैदा किये होते. अपने हक की लड़ाई के लिए दो-चार आतंकवादी और अलगाववादी संगठन बनाए होते. लेकिन नहीं, लोग बेवकूफ़ हैं जो तुमको कायर कहते हैं. मैं जानता हूँ कि ये सब तुम्हारे डीएनए में नही है. तुम कश्मीर से पहले शारदा प्रदेश के निवासी हो. तुम्हें सदियों से शस्त्र नहीं, शास्त्र साधने की आदत है. हिंसा और अतिरेक तुम्हारे स्वभाव में है ही नहीं.
बड़ा दुःख है कि आज भारत की एक समूची पीढ़ी तुमसे और तुम्हारे पूर्वजों से अनजान है. तुम्हारी अहमियत का अंदाजा उसे नही है. जिस कश्मीर में तुम्हारे कारण दो हजार साल तक बोली जाने वाली भाषा संस्कृत थी, वहाँ अब उर्दू अनिवार्य है. लेकिन संस्कृत की लाइब्रेरी में मोटे-मोटे ग्रन्थों को पलटकर और तुम्हारा नाम याद करके देर तक खोए रहने वाला मैं, आज तुमको याद न करूँ तो ये बौद्धिक बेईमानी होगी न ?
पिछले दिनों बनारस के घाट पर तुम्हारे एक बुजुर्ग टकरा गए, गौर वर्ण, चमकता चेहरा साथ में एक प्यारा सा बच्चा. हमसे पूछने लगे; “कहाँ हैं पंचगंगा घाट?” हमने पूछा कि आप कहाँ से आए हैं तो उत्तर मिला – दिल्ली से. हमने फिर पूछा; “लेकिन आप तो दिल्ली के नही लगते?” तब उन्होंने कहा; “हम कश्मीरी ब्राह्मण हैं”. इतना सुनते ही न जाने कब मेरे हाथ उनकी पैरों की तरफ झुक गए. मुंह से निकल गया – अहा! और उसके आगे हम कुछ न बोल सके. वो सजल नेत्रों से मुझे देखने लगे, आशीष देकर जाने लगे मानों चले जा रहे हों एक साथ चरक, विष्णु शर्मा और नागसेन, कालिदास, वसुगुप्त और सोमनन्द. वह पीछे मुड़कर मुझे देखते रहे बार-बार और मैं उन्हे निहारता रहा. फिर वह खो गए, वैसे ही जैसे आचार्य अभिनव गुप्त उस रहस्यमयी गुफ़ा में खो गए थे.
उन्नीस जनवरी के दिन फिर मैं खोया था, उदास था. मैं जानता हूँ कि उस दिन तुम्हारे टेंटों से निकलते धुँएं में हताशा और निराशा का बवंडर उठ रहा होगा. न जाने कितने दर्द उठकर कराह उठे होंगे. तुम्हें दुख होगा कि अपने घावों के हरे होने का.
देश के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, लेफ्ट, राइट और सेंटर से छले जाने का. लेकिन उदास न होना. एक वक्त आएगा जब समूची दुनिया जानेगी कि भारत और भारत की मेधा की पहचान किसी भाजपा या कांग्रेस के राजनेता या किसी तथाकथित बुद्धिजीवी से नही है. भारत की पहली पहचान तो तुमसे और तुम्हारे पूर्वजों से है.
आप जहाँ भी हैं, आपको बारम्बार प्रणाम है.

8 Comments
963212 184366You must participate in a contest for among the top blogs on the internet. I will suggest this internet website! 610451
593680 724423You can certainly see your enthusiasm in the work you write. 359602
253273 248255Black Ops Zombies is now available […]Take a appear here[…] 635496
679750 561823Yeah bookmaking this wasnt a risky determination outstanding post! . 768573
652600 955900I do not have a bank account how can I place the order? 538444
694784 870575Soon after study a few of the weblog posts on your own site now, we actually like your way of blogging. I bookmarked it to my bookmark internet website list and are checking back soon. Pls consider my web-site likewise and make me aware should you agree. 316241
271876 557650Thanks for the weblog loaded with so many info. Stopping by your blog helped me to get what I was looking for. 561873
226094 690453surely like your web web site but you need to check the spelling on several of your posts. Several of them are rife with spelling issues and I find it really troublesome to tell the truth nevertheless I will definitely come back once more. 951922