रविवार की एक दोपहर मेरे पिता ने मुझे यह फिल्म देखने के लिए प्रोत्साहित किया. साफ-साफ कहूँ तो इस फिल्म से मेरी अपेक्षाएं अधिक नहीं थी लेकिन फिल्म देखकर मैं खिल
रविवार की एक दोपहर मेरे पिता ने मुझे यह फिल्म देखने के लिए प्रोत्साहित किया. साफ-साफ कहूँ तो इस फिल्म से मेरी अपेक्षाएं अधिक नहीं थी लेकिन फिल्म देखकर मैं खिल
लोकतंत्र खतरे में था, है और तब तक रहेगा जब तक राजनीतिक स्वार्थ से हटकर राजनीतिक दल नहीं सोचते. लोकतंत्र को खतरा पूरे भारत में नहीं बल्कि देश के कुछ