हर साल की तरह इस साल भी २ अक्टूबर आ ही गया. हर साल की तरह इस साल भी भाषणों की झड़ी लगेगी, टीवी पर गाँधी फिल्म दिखाई जाएगी, रेडिओ
हर साल की तरह इस साल भी २ अक्टूबर आ ही गया. हर साल की तरह इस साल भी भाषणों की झड़ी लगेगी, टीवी पर गाँधी फिल्म दिखाई जाएगी, रेडिओ
न हो कबाब तो आधा दो हो पास अगर तो ज़्यादा दो बस दे दो हमको दो सौ ग्राम रक्खो अपनी प्लेटें तमाम हम वही ख़ुशी से खायेंगे आगे न
पिछले कई दिनों से जीवन कोहरा प्रधान हो गया है. चारों तरफ कोहरा ही कोहरा है. इधर कोहरा, उधर कोहरा. आसमान में कोहरा जमीन पर कोहरा. सड़क पर कोहरा. पगडंडी
पी एम वाइज़ डीमोनिटाइज ड़ू ऐक्सेप्ट इट गॉल ऐंड गाइज काला धन भारी मन थोड़ी पीड़ा ज़्यादा फन बात की धार बस धिक्कार लूट रही है ये सरकार पाँच सौ
मतलब सिद्ध उड़ते गिद्ध भांग घुली है तर्क निषिद्ध झूठ का नाच सच पर आँच जनपथ बाबा फिर से लॉंच ट्रोलम ट्रोल वही बवाल फ़ासीवाद बिकट अवसाद प्रेस्यागण करते आबाद
वाह दीवाली क्रैकर वाली खीर मिठाई लेकर आई बर्फ़ीखोरी भूल कैलोरी सजी रंगोली हँसी ठिठोली खील बताशा सुख की आशा धन की आस खेलाए ताश तीन ठो पत्ती गुल है
सिवाय गीतकार के बाकी सब के लिए फ़िल्मी गीत सुनने के लिए होते हैं. उधर गाना बजा इधर आवाज़ कान तक पहुंची और हमने सुन लिया. मन में आया तो
फ़ंडिंग बंद धंधा मंद पॉवर लॉस्ट वेरी फ़ास्ट बी सी सी आई जमी है काई न्यायालय है भारी भय है बैठा झाग दुखी अनुराग काँगरेस की उत प्रदेश की नेत्री
इस सप्ताह लंबी आह कितना पानी मिले न थाह फ़ैमिली साग़ा खिंचता धागा सब उधड़ेगा बोले कागा कहें मुलायम हम हैं क़ायम हयेंको पटके किसमे है दम? सुने न पूत