अभी सोशल मीडिया पर एक वीडियो चल रहा है. हवाई जहाज़ के अंदर दिल्ली के जिल्ले सुभानी अरविंद केजरीवाल बैठे हुए हैं. बगल में उनके PA बैठे हुए हैं. कहानी शुरू हुई कि भइया 2019 में तो मोदी ही आएगा. भाजपा का ही भगवा लहराएगा. अब PA साहब कैसे चुप रहते. तुरंत मोहल्ला क्लीनिक का एड्रेस देते हुए बोल दिया कि विज़िट करो. अब उस व्यक्ति ने जो जवाब दिया वही केजरीवाल के ट्रोलिंग का कारण बन रहा.
जिस आम आदमी ने यह वीडियो बनाया है उसने इसका जवाब देते हुए कहा कि भाई मोहल्ला क्लीनिक का तो दरवाजा ही बंद पड़ा हुआ है तो क्या देखने जाए? ध्यान दीजियेगा की बगल में ही मुख्यमंत्री जी बैठे हुए थे. पृथ्वी से लेकर प्लूटो तक के मुद्दों पर मुखर रहने वाले मुख्यमंत्री जी की शांति देखने वाली थी. मानो अपने ही ज़ोन में खोए हुए हो. आसपास क्या बात हो रही, पता ही नहीं चला. अपनी कॉफी (या जो भी पेय पदार्थ वो पीते है) उसका ग्लास रखते हुए वो दिखाई भी दिए.
सवाल यहाँ यह बनता है कि जनता के प्रतिनिधि बनकर दिल्ली के गद्दी पर बैठे केजरीवाल जी इतने शांत क्यों थे. सच है कि वीडियो बनाने वाले में यह नहीं पूछा कि केजरीवाल जी ये मोहल्ला क्लीनिक क्यों बंद है. लेकिन जन प्रतिनिधि को तो बिना सवाल के भी जवाब देने चाहिए. कम से कम जिस नैतिक मूल्यों के स्तर को केजरीवाल जी ने अपने विरोधियों के लिए तय किये हैं, वहीं उनके ऊपर भी लागू होती है. वस्तुतः मुख्यमंत्री महोदय इस समय मोदी जी के खिलाफ लड़ने में अधिक व्यस्त हैं. जिल्ले सुभानी की अपनी प्राथमिकताएं हैं, ज़ाहिर सी बात है कि आम नागरिक विशेष दर्जे वाले तो होते नहीं कि उनको जवाब दिया जाए?
कुल मिलाकर हमारे केजरीवाल जी की स्थिति इस समय डांवाडोल है. कहो तो शीला दीक्षित के 300 पेजेस का नाव बनाकर नदी में बहा दे लेकिन उधर से हरी बत्ती जलाई नहीं जा रही. दूसरी तरफ संविधान भी बचाना है. संविधान बचेगा तभी पार्टियां बचेंगी. बड़ी विडंबना है. काटो तो खून नहीं वाली स्थिति. इस असमंजस की स्थिति में ईश्वर केजरीवाल जी को हिम्मत दे. अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे बहुत लड़ाई है.
