चीन का बहिष्कार कर भारत के साथ आया भूटान

15 अगस्त, 2011. पूरा देश आज़ादी की सालगिरह मना रहा था. भारत के प्रत्येक कोने में हर्षोल्लास का माहौल था. लेकिन उस दिन एक बयान ने पूरे देश को हिला कर रख दिया. यह बयान था तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का.

प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया और कहा कि हमारे पास जादू की कोई छड़ी नहीं है, जिसे घुमाएं और समस्या का हल हो जाएं. मनमोहन सिंह जी के इस बयान के बाद मीडिया सहित हर जगह पर एक ही मुद्दा था ‘जादू की छड़ी’. यह मुद्दा वाजिब भी था, क्योंकि जनता ने समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री चुना था, न कि बहाने सुनने के लिए.

आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी का बयान याद आने का कारण है वैश्विक स्तर पर भारत के नाम का ‘जाप’ किया जाना. चंद देशों को छोड़ दिया जाए तो शेष सभी का रुख भारत की ओर ही है. जो देश आज भारत के साथ नहीं हैं, उनमें से एक है चीन और दूसरा पाकिस्तान.

पाकिस्तान तो गरीबी व कर्ज में ही डूबकर समाप्त हो जाएगा, लेकिन चीन बीते सप्ताह तक समस्या का सबब बना हुआ था. हालांकि ‘चीन नामक’ समस्या आज भी है किन्तु गत दिनों मसूद अजहर के मसले पर यूएनएससी (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) में अमेरिका, फ्रांस व ब्रिटेन द्वारा चीन को जिस तरह अल्टीमेटम दिया गया, वह उसकी हक़ीक़त को स्पष्ट दर्शाता है. 

रविवार को चीन से जुड़ी एक खबर फिर सामने आई. खबर यह है कि भारत के सबसे छोटे पड़ोसी देश भूटान ने चीन के उस न्यौते को ठुकरा दिया है, जिसमें चीन द्वारा उसे बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) फोरम बैठक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था.

ज्ञात हो कि भारत पहले ही इस बैठक में शामिल होने से इनकार कर चुका है. हालांकि भारत के ज्यादातर पड़ोसी देश मालदीव, श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश व्यापारिक कारणों से इस बैठक में सम्मिलित होंगे. रिपोर्ट्स के अनुसार इस बैठक में आमन्त्रित कुल 100 में से 40 देशों का प्रतिनिधि मण्डल ही सम्मिलित होगा. इसका मतलब यह है कि 50 फीसदी से अधिक देश इस फोरम में शामिल नहीं हो रहे हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स में राजनयिक सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि भूटान बीआरआई फोरम बैठक में शामिल नहीं होगा. चीन ने भूटान की नई सरकार को लुभाने की काफी कोशिश भी की थी, ताकि उसे भारत के प्रभाव से दूर ले जाया जा सके, किन्तु अब तक वह इसमें सफल नहीं हो सका है.

ज्ञात हो कि भूटान के चीन के साथ राजनयिक संबंध नहीं है. हालांकि वह अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए चीन के साथ साझेदारी को बढ़ाना चाहता है. भूटान की सरकार का मानना था कि बीआरआई फोरम में उसकी मौजूदगी से भारत में अच्छा संकेत नहीं जाएगा.

यहां महत्वपूर्ण यह है कि भूटान भारत के साथ संबंध बनाए रखने के लिए 2017 में भी इस बैठक का बहिष्कार कर चुका है.

बीआरआई के तहत छह गलियारे बनाने की योजना है, जिनमें से कई गलियारों पर काम भी शुरू कर दिया गया है. इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरने वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी शामिल है.

भारत के लिए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भारत की आपत्ति संप्रभुता है क्योंकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है जिस उस पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है. ऐसे में भारत की इजाजत के बिना चीन वहां से आर्थिक गलियारा नहीं बना सकता है.

गौरतलब है कि चीन की बीआरआई परियोजना का अमेरिका और जापान सहित कई देशों ने भी विरोध किया है. अमेरिका ने कहा है कि चीन की यह परियोजना जिन देशों से गुजरेगी, उन देशों के किए यह आर्थिक सहयोग कम और खतरा ज्यादा उत्पन्न करेगी.

बीआरआई परियोजना का मकसद दुनिया भर में चीन के निवेश से बुनियादी परियोजनाओं का विकास करना और चीन के प्रभुत्व को बढ़ाना है. चीन ने आर्थिक मंदी से उबरने, बेरोजगारी से निपटने और अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए 2013 में यह परियोजना पेश की थी.

लगभग 62 अरब डॉलर की इस परियोजना पर चीन अब तक अरबों रुपये खर्च कर चुका है. अब यदि इस परियोजना में भारत द्वारा या किसी अन्य देश द्वारा इस पर यूएन में मुद्दा उठाया जाता है तो मुमकिन है कि यूएन इस पर रोक लगाने का आदेश भी दे सकता है. यदि चीन की इस महत्वकांक्षी योजना पर रोक लगती है तो चीन को अरबों रुपयों का नुकसान होना तय है.

बहरहाल, देखना यह है कि बीआरआई पर किस देश की विदेश नीति सफल होती है,क्योंकि दोनों ही बड़े देश भारत व चीन अपने-अपने तरीके से जोर लगा रहे हैं.