आज सच में पता चल ही गया कि झूठ के पांव नहीं होते. देश की रक्षा और इसकी सुरक्षा संबंधी डील्स को ले कर जिस भ्रष्टाचार को हम इतने वर्षों से देखते आ रहे हैं, वह सच में निंदनीय है. यह एक प्रकार से देश के लोगों का टैक्स का पैसा ही बर्बाद नहीं करता बल्कि सेना को भी कमजोर करता है.
ये सारी बातें तब की सिचुएशन पर भी ठीक लागू होती है, जब एक सही सौदे में भ्रष्टाचार ढूंढा जाने लगे. इससे भी देश की सुरक्षा व्यवस्था पर कुठाराघात होता है.
आज सुप्रीम कोर्ट ने राफेल पर एक आदेश दिया. ध्यान दीजियेगा, आदेश दिया. अभी कोई फैसला नहीं सुनाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा उसको स्पष्ट शब्दों में समझने के लिए कुछ टेक्निकल बातों पर ध्यान देना पड़ेगा.
इस डील के विरुद्ध याचिकाकर्ताओं ने जो तर्क रखें, वे उस संवेदनशील डाक्यूमेंट्स के आधार पर खड़े थे जिनको पब्लिक डोमेन में नहीं रखा जा सकता. यह बात सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा कही भी गयी थी. सुप्रीम कोर्ट का भी दिया हुआ पिछला फैसला इसी बात पर आधारित था.
सरकार ने कोर्ट को बताया कि उन दस्तावेज़ों को सामने नहीं रख सकते क्योंकि वे बेहद संवेदनशील हैं.
आज के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने उसी दस्तावेज़ को देखने की बात कही है. अब ध्यान दीजियेगा, अभी भी याचिकाकर्ताओं की याचिका सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग पड़ी है. 2018 में 14 दिसंबर को दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट बहुत पहले ही दायर हुई रिट याचिका को खारिज कर चुका है. यहां सरकार का पक्ष और मज़बूत होता है. लेकिन यहीं पर बिना पांव वाला झूठ भागता है.
दस्तावेज़ों को देखने मात्र से यह घोटाला कैसे सिद्ध हो जाता है, यह समझ से बाहर है. वहीं मीडिया में दौड़ाए जा रहे घोड़ों ने जिस ”तथाकथित झटके वाली’ बात कही है, वह और भी अधिक हास्यास्पद है.
दूसरी तरफ इस सौदे के खिलाफ याचिका करने वालों का एक पक्षपाती आधार इसको और अधिक संदेह के घेरे में डालता है. एक तरफ जहाँ सरकार सुप्रीम कोर्ट के मांगे हर दस्तावेज़ को मुहैय्या करा रही है, वहीं याचिकाकर्ता यह बता रहे हैं कि यह सौदा ‘कैसे होना चाहिए’ था. यह हास्यास्पद भी है और निंदनीय भी.
सरकार का पक्ष सीधा सा है कि वह सौदे से जुड़े संवेदनशील खबरों को बचाना चाहती है. वह यह नहीं चाहती है कि भारत के दुश्मन देश को यह पता चले कि देश की सुरक्षा में कौन से नए हथियार लग रहे हैं.
राजनैतिक विचार विमर्श के स्तर को सबसे निचले धरातल पर ला चुकी कांग्रेस पार्टी अब देश में चुनावों के चलते और छटपटाहट में नज़र आ रही है. यह देख कर एक आशंका का माहौल यह बनता है कि जब देश की मुख्य विपक्षी पार्टी ही ऐसी हो चुकी है तो अब देश की राजनीति का क्या स्तर होगा.
फिलहाल इंतज़ार कीजिये! बिना पैरों वाला झूठ फिर पकड़ा जाएगा. बस मीडिया के लच्छेदार ब्रेकिंग न्यूज़ वाले खेल में मत फंसिए!
