कहते हैं कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है. वैसे 1991 में नरसिंह राव के लिए यह रास्ता आंध्र प्रदेश, कर्णाटक और महाराष्ट्र के जरिये खुला था. 2004 में मनमोहन सिंह का रास्ता भी आंध्र से ही आया था.
लेकिन अक्सर जो पार्टी यूपी जीतती है, वही केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाती है. जिन्हें आँकड़ों में दिलचस्पी है, वे 1993 के विधानसभा चुनावों के आँकड़े देख रहे हैं जब पहली बार बसपा और सपा मिलकर चुनाव में गए थे और उन्होंने भाजपा को बहुमत से पहले रोक दिया था. 1989 और 1993 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 33 प्रतिशत के करीब मत मिले थे.
लेकिन इन 25 वर्षों में राजनीति इतनी बदली है कि इन आँकड़ों का कोई विशेष महत्त्व नही है. 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 42 के उपर स्थिर रहा. 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिले मतों को जोड़ दिया जाये तो वह भाजपा गठजोड़ को मिले मतों के बराबर ही बैठता है लेकिन चुनावी राजनीति सिर्फ अंकगणित का सवाल तो है नही.
2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठजोड़ को 10 प्रतिशत मत मिले थे. इस चुनाव में भी सीटें भले ही दो मिलें, लेकिन 9-10 प्रतिशत मत तो कांग्रेस प्राप्त कर ही लेगी. यदि जबरदस्त ध्रुवीकरण नही हुआ तो कम से कम 8 प्रतिशत मत छोटे दल व निर्दल उम्मीदवार ले जायेंगे.
ऐसे में महागठबंधन और भाजपा के पास मुकाबले के लिए 82 प्रतिशत का मैदान होगा. इन 82 प्रतिशत मतों में से जो पक्ष 45% मत ले जाएगा तो उसे 50 या उससे अधिक सीट मिलने की सम्भावना रहेगी. मतलब साफ़ है कि सपा और बसपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में मिले कुल मत प्रतिशत भी उसे बड़ी जीत दिलाने में नाकाम साबित होंगे.
यहीं भाजपा के लिए आशा की किरण है. एक बात तो तय है कि भाजपा 2014 जैसी सफलता उत्तर प्रदेश में नही दुहरा सकेगी. लेकिन उसे 1996 या 1998 जैसी सफलता दुहराने की पूरी उम्मीद है, जब पार्टी को 55 से उपर सीटें मिलती थी.
जब भी दो विपरीत विचारधारा या भिन्न कार्य संस्कृति के दल एक साथ आते हैं तो वे अपने सभी मतों को गठजोड़ में नही ला पाते. उनके साथ उनका कोर वोटर ही आता है. बाकी मतदाता अपना निर्णय परिस्थितयों के हिसाब से करते हैं. सपा-बसपा का कोर वोटर जाटव, यादव और मुस्लिम मतदाता हैं.
मुस्लिम वोट का एक हिस्सा कांग्रेस के साथ भी जाएगा. ऐसे में सपा-बसपा का कोर वोट लगभग 30 प्रतिशत का ही होगा. इसके बाद आता है रालोद फैक्टर. पश्चिमी यूपी में सिमट चुके अजित सिंह के साथ कितने जाट हैं, इसका जवाब बेहद मुश्किल है. 2014 में जाटों ने बागपत में भी चौधरी अजित सिंह को वोट नही दिया था.
2017 के विधानसभा चुनावों में दावा किया गया कि जाट राष्ट्रीय लोकदल की तरफ लौटे हैं. लेकिन नतीजे इन दावों के ठीक उलट रहे. इन चुनावों में भी जाटों के अजित सिंह की तरफ लौटने के दावे मीडिया में किये जा रहे हैं. लेकिन ऐसा होता है या नही, यह देखने वाली बात होगी. यदि जाट वोट निर्णायक तौर पर अजित सिंह के पाले में आता है तो महागठबंधन की राह पश्चिमी यूपी में आसान होगी.
इस समय उत्तर प्रदेश में सवर्ण, वैश्य और कुर्मी-कोइरी और निषाद जाति भाजपा के कोर वोटर हैं. ये सभी मिलकर 35 प्रतिशत से उपर ही बनते हैं. दोनों पक्ष की सामने चुनौती जाट, गैर-जाटव हरिजन और छोटी संख्या वाली ओबीसी जातियों को अपने पाले में लाने की होगी. जो भी यह करने में सक्षम होगा वही यूपी जीतेगा. यदि ये जातियां किसी एक तरफ नही गई और दोनों धड़ों में बराबर बट गई तो उत्तर प्रदेश के नतीजे भी वैसे ही होंगे.
भाजपा इन चीजों के अलावा एक और फैक्टर पर ध्यान केन्द्रित कर रही है. यूपी में चुनाव कई चरणों में ही होते हैं. यदि ये चुनाव पूर्वांचल से आरम्भ हो तो जाति पर वोटिंग होती है. यदि चुनाव पश्चिमी उत्तरप्रदेश से आरम्भ हो तो साम्प्रदायिकता का रंग वोटिंग पैटर्न पर साफ़ दिखता है.
2014 और 2017 के तरह यह चुनाव भी पश्चिमी यूपी से ही शुरू होगा. सहारनपुर जैसी कुछ सीटें, जहाँ कांग्रेस मजबूत है, को छोड़कर हर सीट पर मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के साथ होंगे.
जाहिर है कि इस क्रिया की प्रतिक्रिया भी होगी और जातियों के वोट बैंक की जगह हिन्दू वोट बैंक लेगा. और फिर पश्चिमी यूपी से जो हवा चलेगी वह ठेठ बलिया तक उसी रौ में बहेगी. कुल मिलकर यह तो तय है कि यूपी का चुनाव करीबी भी रहने वाला है और दिलचस्प भी.
