ब्रिगेड मैदान की ऐतिहासिक रैली के मायने

ब्रिगेड मैदान की रैली का पश्चिम बंगाल की राजनीति में वही ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक महत्व है जो  बिहार की राजनीति में गाँधी मैदान का और दिल्ली में रामलीला मैदान का है. किसी भी राजनीतिक रैली के लिए यह मैदान जरूरत से ज्यादा बड़ा है.

वाममोर्चा जब पश्चिम बंगाल में शासन में था तो महीनों की तैयारियों के बाद ब्रिगेड में रैली आयोजित किया करता था. इसके लिए न केवल पूरे पश्चिम बंगाल बल्कि पड़ोसी राज्यों के वामपंथी प्रभाव वाले  इलाकों से भी भीड़ जुटाई जाती थी. उस ज़माने में कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस ब्रिगेड में रैली करने से परहेज करते थे. इस विशाल मैदान को भरने के लिए सरकारी मशीनरी जरूरी होता है और मैदान खाली रह जाये तो उपहास का कारण बनता है.

लेकिन 3 अप्रैल को भाजपा ने इस मैदान में ऐतिहासिक रैली कर बंगाल की राजनीति में मुख्य विपक्षी दल होने का दावा ठोक दिया.

पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों में से भाजपा के पास मात्र 3 सीटें हैं. लोकसभा की 42 सीटों में से मात्र 2 सीटें हैं. इन दो सीटों में से भी एक, दार्जीलिंग सीट गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कृपा से है. लेकिन ये आँकड़े पश्चिम बंगाल की राजनीति की सच्चाई बयान नही करते.

पिछले 5 वर्षों में अथक परिश्रम और संघर्ष से भाजपा ने बंगाल की राजनीति में वाममोर्चा और कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए नम्बर दो की हैसियत बनाई है. एक बड़ा कारण यह भी है कि पश्चिम बंगाल की जनता लोकतंत्र में गुंडातन्त्र के प्रयोगों से त्रस्त  हो चुकी है और इसका विकल्प वह भाजपा में देखती है.

जाहिर है अब शीर्ष स्थान के लिए मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है. यही कारण है कि तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी ने अपनी रैलियों में 90 प्रतिशत हमला भाजपा पर करती हैं.   
प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की ब्रिगेड रैली हर लिहाज से ऐतिहासिक थी.

स्वत्रन्त्र पर्यवेक्षक बताते हैं की भीड़ 5 लाख से अधिक थी. यह भीड़ कोलकाता और आस-पास के जिलों से ही जुटी थी क्योंकि चुनाव की तैयारियों में व्यस्त दूरदराज के क्षेत्र से कार्यकर्ताओं का कोलकाता में जुटान संभव नही था. ब्रिगेड रैली से ठीक पहले प्रधानमन्त्री ने उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी में भी एक रैली में भाग लिया था.

ऐसे में ब्रिगेड की रैली वाममोर्चा के उन ‘ऐतिहासिक रैलियों’ की तरह नही थी जिनकी तैयारी महीनों चलती थी. यह भीड़ काफी हद तक स्वतःस्फूर्त थी और उत्साह से भरी हुई थी. तमाम राजनीतिक पर्यवेक्षक भाजपा को पश्चिम बंगाल के 42 में से 8-10 सीटें दे रहे थे. लेकिन ब्रिगेड मैदान की रैली के बाद उन्हें अपने विचार बदलने होंगे.

तृणमूल कांग्रेस के नीति निर्धारकों की नींद उड़ जाएगी. वाममोर्चा के नेताओं को खास फर्क नही पड़ेगा क्योंकि उनकी सीटें शून्य ही रहनी है. लेकिन जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं भाजपा और तृणमूल का मुकाबला और करीबी होता जा रहा है. आज की रैली के बाद यह मुकाबला 30  और 10 की जगह 19 और 20 का होता लग रहा है.

तृणमूल कांग्रेस की ताकत उसकी सांगठनिक शक्ति है. उसके कार्यकर्ताओं का विशाल नेटवर्क और राजनीतिक संसाधनों पर कब्जा उसे एक मजबूत पार्टी बनाती है. भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में संगठन बनाने का प्रयास किया है लेकिन उसका नेटवर्क अब भी तृणमूल को टक्कर देने में पूरा सक्षम नहीं है.

सोशल मीडिया भी काफी हद तक संगठन की कमी को पूरा कर देता है. लेकिन मतदान के दिन स्थानीय नेटवर्क ही काम आता है. दर्जन भर सीटों पर तो भाजपा सांगठनिक रूप से बेहद मजबूत हो चुकी है. लेकिन शेष सीटों पर मतदाताओं को बूथ तक लाने के लिए वह बहुत हद तक नरेंद्र मोदी के करिश्मा पर ही निर्भर करेगी. ऊँट किस करवट बैठता है, देखना दिलचस्प होगा.