मिशन शक्ति : अब अंतरिक्ष में भी घुस कर मारेंगे

आज सुबह प्रधानमंत्री मोदी ने ये कहकर सबको चौंका दिया की वो लगभग 11 :45 PM पर एक बहुत महत्वपूर्ण घोषणा करने जा रहें हैं.

इसी के साथ ही कयासों का दौर शुरू हो गया, अभी नोटबांदी की यादें ताज़ा ही थी तो कुछ लोग एटीएम के तरफ भी लपके, फिर करीब 12:30 बजे प्रधानमंत्री ने एक लाइव टेलीकास्ट में बताया की एक सफल ओपरेशन में DRDO द्वारा विकसित एंटी सैटलाइट मिसाइल (ASAT) ने लौ अर्थ ऑर्बिट (LEO) में चक्कर लगते हुए एक सैटेलाईट को मार गिराया हैं. इसके साथ ही अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत दुनिया की चौथी ऐसी शक्ति बन गया हैं जिसके पास ASAT तकनीक हैं.

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ये बहुत महत्वपूर्ण घटना हैं. चीन ने 2007 से ही कई सफल ASAT परीक्षण किए है, चीन अपने डाँग फेंग 21 या DN-2 मिसाइल का इस्तेमाल एन्टी सैटेलाइट मिसाईल के रूप में भी करता हैं. इस लिहाज से भारत के लिए ये उपलब्धि देश की सुरक्षा व्यवस्था को और मज़बूत करती है.

क्या होता है एन्टी सैटेलाइट वेपन?

मॉडर्न वॉर फेयर में सैटेलाइट अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान देते है, सेना को नैविगेशन, खुफिया तस्वीरें और कम्युनिकेशन में मदद करते है. युद्ध की किसी भी परिस्तिथि में दुश्मन देश के सबसे पहले हमलो के ठिकानों में आपके सैटेलाइट भी रहते है, सैटेलाइट गिरा कर वो आपके संचार तंत्र और नैविगेशन को खत्म कर सकते है. जिससे आपके कई तरह के सैन्य व संचार उपकरण बेकार हो जाएंगे।

क्या है भारत का ASAT वेपन?

भारत के ASAT प्रोग्रम में अग्नि मिसाइल या PDV का इस्तेमाल किया गया हैं, यहाँ Hit-To-Kill मेथड, जिसमे एक इंटरसेप्टर मिसाइल किनेटिक एनर्जी इम्पेक्ट से सैटेलाइट को तबाह कर देता हैं, का उपयोग हुआ. अमेरिका और चीन के पास भी यही तकनीक हैं. आज का टेस्ट उड़ीसा के बालासोर से हुआ जहां एक बहुत तेज गति से चक्कर लगाते एक लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाईट को हमने सफल तरीके से मार गिराया.

क्यों ज़रूरी था ये टेस्ट?

NSG और MTCR की तरह ही बहुत दिनों से विश्व शक्तियां ASAT वेपन के लिए भी कंट्रोल रिजीम लाने पर विचार कर रही हैं, ताकि नए देश जो ऐसी तकनीक डेवलप करना चाहते हैं उन पर लगाम लगा सकें. इस लिए ये ज़रूरी था की आप इसको जग ज़ाहिर कर के टेस्ट करें ताकि अब किसी भी ऐसे तकनीकी कंट्रोल रिजीम का हिस्सा पहले दिन से हों.

कुछ साल पहले DRDO के वैज्ञानिक वी के सारस्वत ने एक बयान दिया था जो उस समय दुनिया में चर्चा का विषय बन गया था.

डीआरडीओ प्रमुख डॉ वीके – “हमारे पास पहले से ही इस तरह के एक हथियार का डिजाइन है, लेकिन इस स्तर पर देश को अपने सामरिक शस्त्रागार में इस तरह के पलटफोर्म की आवश्यकता नहीं है. इस तरह के हथियार का परीक्षण करने पर बहुत सारे नतीजे निकल सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए. लेकिन परीक्षण एक मुद्दा नहीं है – हम हमेशा सिमुलेशन और जमीनी परीक्षण पर भरोसा कर सकते हैं. हम भविष्य में देख सकते हैं कि क्या सरकार ऐसा कोई हथियार चाहती है। यदि हां, तो हमारे वैज्ञानिक इसे देने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं.”

उनके मुताबिक उन्होंने ये प्रस्ताव UPA के साशन काल में भी दिया था लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार ने किसी दबाव में ये स्वीकृति नहीं दी

चीन और पाकिस्तान में इस पर बौखलाहट ज़रूर होगी. अभी तक चीन के पास ASAT एकलौता ट्रूप का इक्का था जिसका काट (कम से कम परोक्ष रूप में) भारत के पास नही था, अब आज के बाद ये दूरी भी खत्म हो गयी.

Founding Member of Lopak - @vikrantkumar