2019 – नरेंद्र मोदी बनाम कुछ नहीं!


चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ, अब 2019 के लोकसभा चुनावों की लड़ाई शुरू हो गई है.

ये तो शुरुआती दिन हैं, लेकिन अधिकांश राजनीतिक पर्यवेक्षकों की आम सहमति यह है कि इस बार लड़ाई काँटे की होने की संभावना है, जहां प्रत्येक वोट के मायने होंगे. विभिन्न चुनाव पूर्व  सर्वेक्षण और ‘डेली ट्रैकर्स’ भाजपा की तरफ रुझान के संकेत  दे रहे हैं, जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा को अधिकतम सीटें मिलेंगी, लेकिन 2014 की तरह, सभी एनडीए गठबंधन को स्पष्ट बहुमत देने से बच रहे हैं.

हालाँकि, ख़ासकर हिंदी-भाषी क्षेत्र के निज़ी जमीनी मूल्यांकन के अनुसार, जहाँ एक तरफ श्री मोदी की लोकप्रियता के साथ-साथ अमित शाह की चुनावी कार्यकुशलता की मजबूती है, तो दूसरी तरफ खंडित ‘गठबंधनों’ की एक सरणी, दीवार पर लिखे लेख की स्पष्टता इंगित करता है.

पिछले पांच वर्षों में, शासन की शैली में सकारात्मक बदलाव, और इस परिवर्तन के प्रणेता और उद्धारकर्ता के रूप में श्री मोदी की स्वीकृति की भावना पूरे देश में झलक रही है.

आगामी चुनाव में, चुनाव आयोग द्वारा घोषित मतदाताओं की कुल संख्या 90 करोड़ है, जिनमें से ९ करोड़ मतदाता पहली बार वोट डालने जा रहे हैं. ये महत्वाकांक्षी युवा मतदाता, संभावित रूप से सभी जातिगत बंधनों को काट, भाजपा के भाग्य का फैसला कर सकते हैं. हालाँकि, इस अपेक्षा में एकमात्र दोष यह है कि ये युवा मतदाता शायद कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के तहत भारत के सकल कुशासन से पूरी तरह अनजान हों.

दूसरी तरफ, विपक्ष की हताशा साफ दिखाई दे रही है. यदि प्रतिद्वंदी दूर से भी आश्वस्त थे, तो पुराने कट्टर-शत्रु आपस में अविश्वसनीय गठबंधन करने का प्रयास नहीं करते. फिलहाल, अन्य क्षेत्रीय दलों के विपरीत, कांग्रेस मतदाताओं की नज़र में मुख्य अपराधी बनी हुई है, और केवल क्षेत्रीय दल ही अपने-अपने राज्यों में भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में हैं.

हालांकि, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुई कांग्रेस की जीत इस बात की पुष्टि करती है कि कांग्रेस नीचे हो सकती है, लेकिन दौड़ से बाहर नहीं है. पार्टी के लिए अभी भी कुछ प्रभाव वाले क्षेत्र हैं, और यह समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं.

लेकिन हम बात इस बार राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी के बारे में कर रहे हैं, जिसका इस चुनाव में सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बेमेल मुक़ाबला है.

राहुल की राजनीति की शैली आग लगाकर भागने वाली है. पार्टी के लिए मैदान का निर्माण करने के बजाय, वह लोगों को अपने बेतुके वाक्यांशों से रिझाने और पीएम मोदी पर हमला करने में व्यस्त हैं. ना कोई जमीनी काम, शून्य संगठनात्मक कौशल, और प्रेरणा रहित पार्टी कैडर, राहुल की गैर-गंभीर राजनीति की कुछ विशेषताएं हैं.

कांग्रेस के चुनावी अभियान रणनीति के मूल में अहंकार, विश्वासघात, षड्यंत्र और छल है, जो इस चुनाव में उनकी बहुत मदद नहीं करेगा.

वहीं क्षेत्रीय दल भी भ्रमित और खंडित भी कुंभ और बालाकोट के बाद माहौल ऐसा है कि लोग नरेंद्र मोदी के पीछे पिछली बार से भी ज़्यादा मजबूती से चट्टान की तरह खड़े हैं.

इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी एक वेल आय्ल्ड मशीन की तरह है, जिसका एकमात्र काम चुनावों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को कमल चिन्ह पर वोट देने के लिए बूथों तक पहुँचाना है। श्री मोदी की राह में मुख्य रूप से दो चुनौतियां हैं – पहली, दक्षिण भारत में कमजोर भाजपा और हिंदी-भाषी क्षेत्र की चुनावी जटिलताएँ.

हिंदी-भाषी के क्षेत्र में मोदी लहर फिर से उन्माद के स्तर पर है, जिसने प्रदर्शन की चाह रखने वाले युवाओं को उर्जाशील कर दिया है. इस चुनाव में, बीजेपी समर्थकों पर उनकी पकड़ न केवल निर्विवादित है, बल्कि सर्वकालिक उच्च स्तर पर है.

यदि वर्तमान गति जारी रहती है, तो मोदी अपने व्यक्तित्व, अपनी पृष्ठभूमि और अपने पाकिस्तान-पॉलिसी से लोगों के बढ़ते विश्वास और जनाधार पर वोटों का एक बड़ा हिस्सा जीत सकते हैं.

2019 के चुनाव में इन राज्यों का नतीजा यह तय करने वाला है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं.

ना जात पे ना पात पे, मोदी जी की बात पे” का नया मंत्र आज ग्रामीण यूपी और बिहार में गूँज रहा है.

हालाँकि, सोशल इंजीनियरिंग अभी भी हिन्दी-भाषी राज्यों में एक चुनावी ताकत है. जहां विपक्ष का चुनावी खेल योजनाबद्ध तरीके से जातिगत-रणनीति द्वारा अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए होगा, वहीं नरेंद्र मोदी विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे हैं और आकांक्षी युवा-भारत पूरे दिल से इसे गले भी लगा रहा है.

मोदी-शाह की जुगलबंदी ने 2014 में मंडल की बेड़ी को पहले ही तोड़ दिया था, और इस पर अंतिम मुहर 2017 यूपी चुनाव के दौरान लगाई गई थी. प्रमुख एजेंडे के रूप में विकास के साथ हिंदुत्व का सूक्ष्म रूप भाजपा की हिन्दी-भाषी क्षेत्र के लिए सबसे अच्छा चुनावी टेम्पलेट प्रदान कर रहा है.

आज मतदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं – एलपीजी कनेक्शन, स्वच्छता, शौचालय, गरीबों के लिए मकान, बैंक खाते, प्रत्यक्ष सब्सिडी, आयुष्मान भारत, मुद्रा ऋण, परिवहन, सड़क, हवाई अड्डे, कानून और व्यवस्था, भ्रष्टाचार, आर्थिक विकास, आयकर, नौकरियां, 10% आरक्षण, और सबसे उपर विलुप्त महँगाई.

लेकिन स्थानीय राजनीतिक कारकों से, विशेष रूप से लुटियन दिल्ली की मीडिया, हमेशा अपने आप को अनभिज्ञ पाई है और अवास्तविक कथाओं को हवा दी है. उनके लिए झूठ सिद्धांत बन जाते हैं, सिद्धांत कथा बन जाते हैं और कथा वास्तविकता बन जाती है. और तो और, वे ये भी कल्पना करते हैं कि मतदाता उनकी कथाओं के हिसाब से वोट देने जा रहे हैं.

मैंने आजादी के बाद के एक भी चुनाव के बारे में नहीं सुना है, जिसमें महँगाई प्रमुख मुद्दा नहीं रहा हो. आश्चर्यजनक बात है कि इस चुनाव में  विपक्ष भी इसका उल्लेख नहीं कर रहा है. वे जानते हैं कि ज़मीनी मुद्दों पर वे खुद ही घिर जाएँगे.

सोशल मीडिया के उत्थान और देश भर में स्मार्टफ़ोन की गहरी पैठ के साथ, हिंदी-भाषी क्षेत्र के व्यावहारिक मतदाता खूब भली भाँति जान रहे हैं कि इस बार मोदी के मुक़ाबले कोई नहीं है. वे अब मीडिया की विवादित राफेल कहानी से मूर्ख बनने के लिए तैयार नहीं हैं. वे जानते हैं कि विपक्ष मुखर है, अनाड़ी है और भ्रम से भरा है. मोदी का अर्थ है स्थिरता, और खंडित गठबंधन का मतलब है समझौता, भ्रष्टाचार और फिर एक बार भाई-भतीजावाद वाली सरकार.

और इन सबके शीर्ष पर, पुलवामा त्रासदी – जिसने पूरे देश में एक आक्रोश पैदा कर दिया था जिसे हजारों मील दूर भी महसूस किया जा सकता था. यह सुनने में एक विडंबना लगेगा परंतु, दुखद परिवारों और एक आहत राष्ट्र के लिए पूरे सम्मान के साथ, सत्य यह है की, पुलवामा की दिल दहला देने वाली त्रासदी के बाद मोदी सरकार की प्रतिक्रिया ने इस चुनाव को लहर से सूनामी में तब्दील कर दिया है.

हैरानी की बात यह है कि कुछ शीर्ष नेताओं सहित कांग्रेस के इकोसिस्टम ने पाकिस्तान के लाइन पर हवाई हमले के सबूत और मारे गए आतंकवादियों की संख्या माँग कर, इस मुद्दे का राजनीतिकरण किया. भारतीयों ने यह भी बहुत उत्सुकता से देखा कि कैसे भाजपा के विरोधी दल, हमारी वायु सेना की प्रशंसा करने के बजाय, वे हमारे ही सैनिकों के बलिदानों का अनादर कर हमारी सेना का मनोबल तोड़ रहे थे. चुनाव के ठीक पहले, ये भाजपा विरोधी दलों का खुद पर ही आत्मघाती हमला था.

इसके विपरीत, जो लोग नरेंद्र मोदी की नीतियों और राजनीति के बारे में अलग-अलग मत रखते हैं, वे भी निस्संदेह एक बात पर निश्चिंत रहते हैं कि मोदी ने अगर कुछ कहा है तो वे करेंगे ज़रूर, और वैसा ही हुआ.

इस मौके को हाथ से ना जाए दिए बिना, नरेंद्र मोदी ने गियर्स बदल दिए और प्रमुखत: राष्ट्रवादी मनोदशा से ओत-प्रोत अपने भाषण में एक सकारात्मक और तीखे लहज़े में पाकिस्तान के कथानक के साथ दिखते विपक्षियों के खिलाफ देश का आह्वाह्न किया. जनता ने भी स्वर में स्वर मिलाकर हुंकार किया।

यह मोदी लहर को मोदी सूनामी में बदलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए. अगर मेरी समझ सही है, तो हिंदी-भाषी क्षेत्र की 300 सीटों में से, एनडीए (भाजपा और उसके सहयोगी) को लगभग हर पाँच में से चार या उससे अधिक सीटें मिलनी चाहिए.



दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.