कितना खतरनाक है अति लिब्रलिस्म?

संपूर्ण विश्व आज आतंकवाद से लड़ रहा है. राष्ट्र विरोधी ताक़तें भी लगभग सभी देशों में कार्य कर रही हैं, किन्तु यदि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में सम्मिलित व्यक्तियों या देशों को एक वर्ग विशेष समर्थन करने लगे तो समझिए कि देश के विकास की राह में रोड़ा यही व्यक्ति हैं.

भारत भी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से त्रस्त है. राष्ट्रविरोधी गतिविधियां करने वाले तत्व कभी ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगाते हैं. ये कभी भारत की सुरक्षा में लगे सैनिकों पर पत्थरबाजी करते हैं तो कभी आतंकी बन कर हिंदुस्तान में आतंक फैलाते हैं. जब सरकार इनके खिलाफ सख्त रुख अपनाने का प्रयास करती है तो लिबरल गैंग इनके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करता है, कई बार इन्हे जस्टिफाई भी करता है.

वह अफ़ज़ल गुरु की फांसी पर रोक के लिए रात में कोर्ट खुलवाना या फिर पत्थरबाजों पर पैलेट गन चलाने पर मगरमच्छ के आंसू बहाना या फिर टुकड़े-टुकड़े गैंग की वकालत करना.

देश का उदारवादी समूह सदैव ही राष्ट्रवादी विचारधारा के विरुद्ध खड़े होने का प्रयास करता आया है. इनकी उदारता इतनी अधिक है कि ये राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा किए गए किसी भी कार्य का विरोध करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. यह वही समूह है जिसने 26/11 हमले में कहा कि पाकिस्तान से बातचीत कर मसला सुलझाना चाहिए और अब जबकि पुलवामा हमला हुआ है, तब भी बातचीत करने का राग अलाप रहा है. इसी बहाने राजनीतिक लाभ तलाशने के प्रयास भी हो रहे हैं. हर बार यह लिबरल ग्रुप राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का समर्थन कर रहा है, तब प्रश्न यह है कि आख़िर कारण क्या है जो यह समूह भारत का साथ देने से कतराता रहा है. तथा इस समूह को भारतीय संस्कृति व रीति रिवाजों से आख़िर समस्या क्यों होती है.

लिबरल्स का बड़ा गुट वामपंथी विचारधारा से प्रेरित है, जिसने सभी समस्याओं के हल के लिए उदारवाद को ढाल के रूप में उपयोग करने का प्रयास किया है. यह वही वामपंथ है जो लेनिन और स्टालिन को गुरु मानता है जबकि सभी जानते हैं कि लेनिन व स्टालिन मानवता के नाम पर कलंक हैं. ये वही लोग हैं जिनके हाथ लाखों मासूम लोगों के खून से रंगे हुए हैं जिन्होने  सोवियत संघ को विशाल यातनाघर बना दिया था. इन्ही तानाशाहों के पुजारी हैं भारत के वामपंथी समूह.

यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि ये लिबरल्स भारतीय परंपराओं और रीति रिवाजों से नफरत करते हैं. इन्हें भारतीय संस्कृति का मज़ाक उड़ाने में कोई भी समस्या नहीं होती. हाल ही में साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा द्वारा छठ पूजा पर्व पर महिलाओं द्वारा नाक पर सिंदूर लगाने पर मज़ाक उड़ाना सबसे बड़ा उदाहरण है.

लिबरल्स समूह का बड़ा भाग विदेशी शिक्षा से प्रेरित है, जिस कारण ये आधुनिकता की अंधी दौड़ में भारतीय संस्कृति को व्यर्थ समझते हैं. लिबरल्स को भारतीय संस्कृति का प्रत्येक वह हिस्सा नापसंद है जिसका उल्लेख भारतीय परंपरा या सनातनी धर्म ग्रंथों में है, जैसे कि इन्हें सुअर और गाय में फ़र्क़ नहीं पता. दरअसल वामपंथी समूहों द्वारा जब भी उदारता के सहारे आगे बढ़ने का प्रयास किया गया है, लोकतंत्र व संविधान की दुहाई पहले दी गयी है, जबकि इनकी मंशा इससे उलट ही रहती है, क्योंकि अंततः लाल सलाम गैंग के ये लोग तानाशाही को ही बढ़ावा देना जानते हैं. लिबरल्स और वामपंथियो की विचारधारा के ताल्लुकात इतने गहरे हैं कि यहाँ अब यदि लिबरल विचारधारा वाले वामपंथियो को सीधे तौर पर लिबरल्स कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

यह वही लिबरल्स हैं जिन्हें कश्मीर के आतंकियों के वध पर दर्द तो होता है, लेकिन केरल और बंगाल में हो रहा खूनी खेल इन्हें दिखता ही नहीं. और तो सब छोड़िए साहब म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या इन्हें प्यारे लगते हैं लेकिन कश्मीरी पंडितों का दर्द इन्हें समझ में ही नहीं आता.
लिबरल्स का इतिहास इतना अच्छा है कि हिन्द की आज़ादी में इनका कोई योगदान नहीं है. इन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में ब्रिटिश सत्ता का समर्थन किया था, व ब्रिटिश शासन को भारत के कई टुकड़े कर बहुराष्ट्र की नीति पर चलाने का निवेदन भी किया था. 

ये वही लिबरल्स हैं जिन्होंने जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का खुले तौर पर समर्थन किया व भारत माँ के दो टुकड़े कर दिए. ये वही लिबरल्स हैं जिन पर भारत-चीन युद्ध में चीन का समर्थन करने का आरोप लगता रहा है. इन लिबरल्स को भारतीय राष्ट्रवाद बुर्जुआ राष्ट्रवाद दिखाई देता है, जबकि रूस व चीन का राष्ट्रवाद सर्वहारा. इन लिबरल्स को दक्षिणपंथी विचारधारा से यूँ तो जन्मजात नफरत रही है किंतु 2014 से एनडीए सरकार आने के बाद और भी समस्या हो गयी है क्योंकि इस सरकार ने अराजकतावादी तत्वों को ठिकाने लगाने के सिद्धांत पर आरंभ से ही कार्य करना सुरु कर दिया था. फिर चाहे वह जेएनयू हो या एएमयू.

लिबरल्स जिस प्रकार से हिन्द विरोधी कार्य करते आए हैं या देशद्रोहियों की मदद करते आए हैं इससे इन पर कई बार विदेशी फंडिंग का भी आरोप लगाया गया है. बिना किसी लाभ के कैसे कोई भी व्यक्ति या समूह किसी अन्य राष्ट्र या विचारधारा का समर्थन कर सकता है. कई बार तो ऐसा लगता है जैसे कि लिबरल्स का टारगेट सिर्फ और सिर्फ हिन्दू ही हों क्योंकि इन्हें न तो क्रिश्चियनिटी से समस्या है न ही इस्लाम से. इन्हें तो सिर्फ और सिर्फ हिंदुस्तान के मूल धर्म हिन्दू से. हिन्दू धर्म की पूज्य देवी माँ दुर्गा पर वामपंथियों का बयान जग जाहिर है.

दरअसल उदारवाद गलत नहीं है, किन्तु अति उदारवाद हानिकारक है. जो सदैव ही पाकिस्तान व चीन की हिमाक़त करते आए हैं, वह आगे भी करते आएंगें. राष्ट्रविरोधी शक्त्तियों का समर्थन करने वाले भी राष्ट्र विरोधी ही हैं. जिन्होंने इतिहास में कभी भी भारत का साथ नहीं दिया उनसे आगे कभी उम्मीद करना नाजायज है.

1 Comment

  1. ROHIT
    February 21, 2019 - 12:22 pm

    Bhaisahab Ye Convent me padhe hue hai Convent wala har Vyakti Secular hai

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