कश्मीर जो प्राकृतिक सुंदरता का अनुपम उदाहरण व स्वर्ग का प्रतीक है, अर्थात् धरती का स्वर्ग है कश्मीर.
26 अक्टूबर 1947 को जब कश्मीर के शासक राजा हरिसिंह गौर ने कश्मीर के भारत में विलय को स्वीकार किया था, तब शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि विलय के सत्तर साल बाद तक कश्मीर विवाद का विषय होगा. किन्तु आज भी कश्मीर अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है, कभी सत्ता जीत हासिल करती है, तो कभी विरोधी ताक़तें लेकिन कश्मीर हर रोज़ वजूद की लड़ाई हार रहा है.
कभी उरी, कभी पठानकोट तो कभी पुलवामा जैसे हमले कश्मीर की छाती को छलनी कर जाते हैं, और कश्मीर रोता विलखता रहता है. अब जबकि एक बार फिर देश का ज़र्रा-ज़र्रा आंसुओं से भरा हुआ है, तब देश को दो गुटों में बांटने का प्रयास हो रहा है, पहला राष्ट्र भक्त तो दूसरा पाकिस्तान भक्त.
राष्ट्रभक्त आज भी अकेले बैठकर सोच रहे हैं कि क्या पाकिस्तान से बदला लिया जाएगा, यदि हां तो कब? जबकि पाकिस्तान भक्त ‘पुलवामा त्रासदी’ को लेकर खुशियाँ मना रहे हैं, वे इसे ‘गिफ़्ट’ के रूप में देख रहे हैं. पाकिस्तान भक्त सोशल मीडिया में खुल कर भारत के खिलाफ लिख रहे हैं, चाहे वह फेसबुक हो या फिर ट्विटर या अन्य, साथ ही खुलेआम आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद व पाकिस्तान समर्थित नारे लगा रहे हैं. इन सब के बीच राष्ट्रभक्त भी रुकने वाले नहीं हैं, खुल कर देश विरोधी ताकतों को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार बैठे हैं.
चूंकि पुलवामा हमले का मुख्य आरोपी कश्मीरी नागरिक है, इसलिए राष्ट्रभक्तों द्वारा कश्मीर के उन लोगों को लगातार सोशल मीडिया व अन्य तरीके से लगातार ट्रॉल किया जा रहा है जो पाकिस्तान परस्त हैं या जैश या अन्य आतंकी संगठनों का समर्थन कर रहे हैं, जो कि आवश्यक है. लेकिन भारतीय मीडिया के तथाकथित नवाबों द्वारा यह दिखाया जा रहा है कि देश प्रेमी सभी कश्मीरियों पर निशाना साध रहे हैं, जबकि सच्चाई बिल्कुल उलट है, क्योंकि ऐसा कतई नहीं कि सभी कश्मीरी नागरिक देशद्रोही हैं, या देश के खिलाफ बात कहने की हिमाक़त कर रहे हैं.
1965 का भारत पाक युद्ध इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है, 1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने यही सोचकर आक्रमण किया था कि कश्मीरी उसकी मदद करेंगें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कश्मीरी नागरिकों ने भारत के बहादुर सैनिकों की ज़बाजी के साथ सहायता की थी.
लेकिन यहाँ सवाल यह नहीं है कि देश भक्त देश द्रोहियों को परेशान कर रहे हैं, बल्कि सवाल यह है कि जब लाल सलाम गैंग या टुकड़े टुकड़े गैंग, कोई कारनामा करते हैं तो मीडिया के नवाब ख़ामोश हो जाते हैं, व सड़क के गड्ढों की रिपोर्टिंग तैयार करते नज़र आते हैं, लेकिन अब जबकि देशभक्त राष्ट्र हित की बात उठा रहे हैं तो उन पर ‘बेचारे कश्मीरियों ‘ को सताने का आरोप लगाया जा रहा है.
ये मीडिया के वही लोग हैं जो 26/11 हमले में टीवी पर लाइव दिखा रहे थे किस प्रकार भारतीय सेना तैयार हो रही है, सैनिक शरीर के किन हिस्सों पर बुलेट प्रूफ जैकेट से लैश हैं और कहाँ पर नहीं, चूंकि मुंबई में हुए 26/11 हमले में पुलिसकर्मी बहुत ही जोश के साथ कार्य कर रहे थे, जिससे अधिकांश पुलिसकर्मी गले को बुलेट प्रूफ से लैश करना भूल गए थे, व आतंकियों ने टीवी देखकर ही पुलिस कर्मियों पर निशाना साधा था जिसके कारण कई पुलिसकर्मियों को शहादत देनी पड़ी थी. लेकिन मीडिया के ये चंद लोग तब भी शर्मिंदा नहीं हुए थे, अब भी नहीं हैं.
अरे साहबान तनिक मेहरबानी कीजिए, जिस देश में रह रहे हैं, जहाँ का खा रहे हैं उसकी तरफदारी कीजिए, इसमें ही आपकी भलाई है.
राष्ट्र भक्त, लाल सलाम या टुकड़े टुकड़े गैंग की तरह कोई गैंग नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के हित की विचार रखने वाले लोग हैं जो प्रत्येक क्षण मातृभूमि के हित न्यौछावर होने के लिए भी तैयार होते हैं.
अभी तो बात केवल पुलवामा की है, देश हित मे जहाँ भी जैसी भी आवश्यकता होगी, देशभक्त एकजुट थे, हैं और रहेंगें.

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