“मैं मस्जिद में आने और प्रार्थना में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हूँ. क्या आप एक हिंदू भगवान को स्वीकार करेंगे? क्या आप हिंदू भगवान को चढ़ाया हुआ भोजन खाएंगे? हम एक साथ रहने के लिए तैयार हैं, लेकिन आप लोगों को विभाजित कर रहे हैं ”
रामलिंगम
यह कथन किसी हिंदूवादी/राष्ट्रवादी संगठन का नहीं है. आरएसएस और भाजपा के किसी नेता का भी नहीं है. यह कथन तमिलनाडु के एक ऐसे व्यक्ति का है जिसको अपने इन शब्दों की कीमत अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी.
रिपोर्ट्स के अनुसार, 42 वर्षीय रामलिंगम पर तंजावुर जिले के कुंभकोणम में अज्ञात लोगों के एक समूह द्वारा अपने घर वापस जाने के दौरान हमला किया गया और उनके हाथ काट दिए गए. अत्यधिक रक्तपात हो जाने के कारण रामलिंगम की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई. स्थानीय लोगों के साथ पुलिस को संदेह है कि हत्या के पीछे रामलिंगम के कुछ मुस्लिम पुरुषों के साथ झड़प एक कारण हो सकता है. रामलिंगम PMK के पूर्व सचिव थे.
रिपोर्ट्स और स्थानीय लोगों के अनुसार मुस्लिम प्रचारकों का एक समूह दलितो के बीच इस्लाम का प्रचार करने गया था. अब इसको संयोग कहें या रामलिंगम की बदकिस्मती, वह उसी क्षेत्र में मौजूद थे. उन्होंने उन प्रचारकों का विरोध करते हुए कहा कि हिन्दू कभी मुस्लिम विरोधी नहीं होते. वह अपने भगवान की पूजा करते हैं और आप अपने अल्लाह की. इसी ‘बोल्ड स्टेटमेंट’ के बाद उस समूह और रामलिंगम के बीच बहस शुरू हो गयी. स्थिति यह हो गयी कि हाथापाई की नौबत आ गयी जिसके बाद कुछ मौलवियों ने बीच बचाव कर दोनों को शांत कराया. इसके बाद जब वह अपने घर की तरफ निकले थे. तब उनके साथ यह घटना घटित हुई. आश्चर्य है कि इस देश में ‘असहिष्णुता’ का ढोल पीटने वाले अभी तक चुप हैं. #JusticeForRamalingam ट्रेंड करता रहा
ट्विटर पर, लेकिन किसी भी मीडिया ग्रुप ने इस खबर की सुध नहीं ली.
यह घटना बताती है कि गंगा-जमुनी तहजीब वाली चादर के नीचे चुपचाप वह खेल खेला जा रहा है जिसकी भनक किसी को नहीं है. देश के अंदर डेमोग्राफी बिगाड़ने का जो षडयंत्र रचा जा रहा है वो भविष्य के लिए बहुत घातक है. उससे भी घातक है सेक्युलरवादी पट्टी बांधें उन नेताओं का रवैया किसी की हत्या पर भी ‘चॉइस’ ढूंढते हैं.
एजेंडे के इस खेल में देश का एजेंडा पीछे रह जाएगा. ख़बरों की भीड़ में जब ‘गो-रक्षकों का आतंक’ जैसे शीर्षक दिखाए जाते हैं तो प्रशांत पुजारी की आत्मा पूछती है कि मेरा क्या कुसूर था. प्यार को धर्म में न बांटने की सीख देते हुए फिल्मी गाने और लंबे आदर्शवादी लेख लिखे जाते हैं, तब अंकित सक्सेना की रूह चिल्लाती है कि ‘प्रेम तो मैंने भी किया था, तो मेरी निर्मम हत्या क्यों कर दी गयी? धर्म एक नहीं था इसलिए?’
सदन में खड़े हो कर जब मुख्य विपक्षी पार्टी का एक युवा नेता तथाकथित रूप से ग्वालियर की आवाज़ बन कर कहता है कि भारत के टुकड़े करने के नारे लगाना देशद्रोह नहीं है, तब चंदन का दुखी परिवार पूछता है कि फिर मेरे बेटे ने क्या गलती की थी जो उसे तिरंगा लहराने के लिए गोली मार दी गयी?’
एक फिल्मी सितारे के ऊपर कोई खरोच भी आ जाने पर ब्रेकिंग न्यूज़ की तख्तियाँ लटकाने वाले लोगों के बीच इस बड़ी घटना पर पसरा सन्नाटा भयानक है. स्वयं को ‘सबसे तेज़’ और ‘आपको रखे आगे’ जैसे तमगे देने वाले भी मौन खड़े हैं. ये चुपचाप देश को एक और बंटवारे की तरफ ले जा रही है और जनता को पता भी नहीं चल रहा है.
रामलिंगम की हत्या एक सन्देश है कि जो भी आवाज़ उठाएगा, वो अपनी जान हथेली पर ले कर चले. संविधान का इतना बड़ा मज़ाक शायद हमारी राजनैतिक विभुतियों के लिए कोई खतरे की घण्टी नहीं है. उनके लिए एक विशिष्ट समुदाय के आगे दण्डवत हो जाना ही सेक्युलरवाद है. ऐसा यह पहला संदेश नहीं है, ना ही आखिरी.
दुर्भाग्यपूर्ण बात बस ये है कि अभी भी कान पर हाथ और आंखों पर फिल्मों का 3D चश्मा लगाए लोग इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. हाल के वर्षों में इस तरह की घटनाओं में तेजी आयी है और एक समाज के तौर पर हमें इसके कारणों और कारकों के बारे में सोचने को लगातार मजबूर करती जा रही है. ये हम सबको एक समाज के तौर पर सोचना होगा कि इस समस्या को हम कितनी जल्दी समझ पाते हैं.
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लेखक: गेंदा भईया

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