क्या चीन की शासन -व्यवस्था ध्वस्त होने की कगार पर है? यह प्रश्न आज न केवल अंतराष्ट्रीय जगत में बल्कि खुद चीन के भीतर विद्वानों और बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा का गंभीर विषय बन चुका है.
चीन की राजनीतिक व्यवस्था आज आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर विभिन्न प्रकार के दबावों को झेल रही है. चीन की अर्थव्यवस्था की गति 2015 के बाद से लगातार धीमी हो रही है. इसके साथ ही उसे वित्तीय ऋण का भार ढोना पड़ रहा है. किसी मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए भी जीडीपी के अनुपात में कर्ज का 100% से अधिक बढ़ जाना कोई सामान्य घटना नही है. धीमी अर्थव्यवस्था और कर्ज के दबाव में चीन को अपने सार्वजनिक कल्याण के विभिन्न कार्यक्रमों में कटौती करनी पड़ रही है. आय की असमानता में लगातार वृद्धि हो रही है. बेरोज़गारी बढ़ रही है. सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुविधाएं अपर्याप्त हैं. सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का आवश्यक्ता के अनुसार विस्तार नही हो पा रहा है. इन सब के अलावा चीन के वृहद औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप पर्यावरण संबंधी समस्याएं जन्म ले रही है. आज चीन की गिनती दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शुमार है. इन सब कारणों से चीन की जनता में असन्तोष लगातार बढ़ रहा है.
इतना ही नहीं, चीन का साम्यवादी शासन आज दूसरे अन्य मुद्दों पर भी कमज़ोर साबित हो रहा है. चीन में साम्यवादी दल सत्ता का दुरुपयोग अपने निजी स्वार्थों के लिए कर रहा है. भ्रष्टाचार चरम पर है और अब व्यवस्था का अभिन्न अंग बन कर नीचे तक फ़ैल गया है. चीन में न केवल आंतरिक तनाव और असंतोष बढ़ रहा है बल्कि जिस तरह से मानवीय अधिकारों के उल्लंघन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, चीन को अंतराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना सहनी पड़ रही है. यही नही चीन की जनता भी अपने राजनीतिक, नागरिक और धार्मिक अधिकारों के प्रति सजग हो रही है.
वैश्विक राजनीति में चीन को सबसे बड़ी चुनौती स्वाभाविक रूप से अमेरिका से मिल रही है. चीन-अमेरिका सम्बन्धों में ट्रेड वॉर और टैरिफ टैक्टिक के अतिरिक्त हाल के दिनों में ट्रम्प प्रशासन की ओर से जिस तरह की बयानबाजी की जा रही है, वह एक नए शीत युद्ध के संकेत दे रही है. अगर अमेरिका ने इस नए शीतयुद्ध को चीन के प्रति अपनी नीति के रूप में बनाये रखा तो ये कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी की अमेरिका इसका अंत चीन में शासन परिवर्तन कर के करना चाहेगा. उपर्युक्त परिस्थितयां चीन को पतन की ओर ले जायँगी या नही ये तो वक्त बताएगा पर ये तो निशचित तौर पर कहा जा सकता है कि चीन गंभीर सामजिक, आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रहा है. ऐसे में न केवल चीन की अमेरिका की जगह सुपर पॉवर या द्विध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में दूसरी बड़ीमहाशक्ति बनने का दावा कमजोर पड़ रहा है बल्कि एशिया की सुपर पॉवर बनने का सपना भी संदेह के घेरे में है.
सवाल यह है की चीन के बदलते हालात क्या भारत के लिए एशिया और वैश्विक राजनीति और व्यापार में अनुकूल स्थिति पैदा करेंगे? क्या भारत इन परिस्थितियों से लाभ उठा सकता है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. यह लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी ताकत है. चीन की साम्यवादी व्यवस्था पश्चिम की सोच से मेल नही खाती. उसके अलोकतांत्रिक एकदलीय शासन प्रणाली को अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश संदेह की नजर से देखते हैं. चीन की बदमाशियों से उसके पड़ोसी देश जापान और वियतनाम भी परेशान हैं. सोवियत रूस के बिखरने के बाद विश्व एक ध्रुवीय हुआ है. अमेरिका इतनी आसानी से कम्युनिस्ट चीन को शक्ति का दूसरा केंद्र नही बनने देगा. ऐसे में लोकतान्त्रिक भारत को दुनिया सम्मान और उम्मीद की नजर से देख रही है. अंतर्राष्ट्रीय जगत चीन को रोकने के लिए भारत के साथ खड़े होने को तैयार दिख रहा है. भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी और तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. जहाँ चीन मैनुफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ी ताकत है वहीं भारत भी सेवा क्षेत्र और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी में मजबूत पकड़ बनाये हुए है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत ने अपनी उपस्थिति मजबूत तरीके से दर्ज करवाई है. एक मजबूत नेता और पूर्ण बहुमत वाली सरकार को वैश्विक नेता जितना महत्त्व देते हैं उतना ढुलमुल सरकारों के नेताओं को नही. भारत को इस समय आवश्यकता है एक मजबूत स्थाई सरकार की जो आर्थिक सुधार और मूलभूत संरचना में विकास के साथ- साथ हमारी अर्थव्यवस्था को नई उचाइयां दे सके.
