स्वच्छ भारत अभियान से बदल रही हैं कस्बों और गाँवो की तस्वीर..

स्वच्छता और स्वास्थ्य से इतर ‘स्वच्छ भारत मिशन’ ने मजदूरों को उनका स्वाभिमान वापस पाने में सहायता की है. 15 अगस्त, 2014 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को एक सपना दिखाया था. उन्होंने नागरिकों से बड़े सपने देखने का आग्रह किया था. समय रहते उन्होंने इस सपने को एक वास्तविकता में बदल दिया. एक अरब से अधिक लोगों के इस सपने को पूरा करने के लिए नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी.  भारत को पूर्णरूप से स्वच्छ बनाने का जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था, उसको 2 अक्टूबर, 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी ने रखा है, जब महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती मनाई जाएगी. 

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पिछले चार वर्षों में यह मिशन धीरे-धीरे ही सही, मगर एक आंदोलन में तब्दील हो गया है और जमीनी स्तर पर एक मौन सामाजिक क्रांति को इस स्वच्छता मिशन ने जन्म दिया है. स्वास्थ्य और स्वच्छता के संदर्भ में स्वच्छ भारत मिशन की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शौचालय की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. हाल ही में डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि स्वच्छ भारत मिशन भारत के द्वारा गांवों और शहरों के खुले में शौच से मुक्त होने के कारण अब तक गंदगी के कारण होने वाली 3 लाख लोगों को मृत्यु से बचाएगा.

हालांकि तथ्य और आंकड़े आसानी से मिशन के सकारात्मक प्रभाव की पुष्टि करने के लिए उपयोग किए जा सकते हैं, लेकिन इस क्रांति की गति को समझने के लिए हमें मिशन को एक सामाजिक प्रिज्म से देखने की जरूरत है. यह मिशन एक ‘आंदोलन’ में परिवर्तन केवल इसलिए नहीं हुआ है क्योंकि देश भर में लाखों शौचालय बनाए गए हैं. यह इसलिए भी एक आंदोलन नहीं है क्योंकि इसके अंतर्गत खुले में शौच को रोका गया है. यह एक आंदोलन इसलिए बना है क्योंकि इसमें वर्षों से अपने स्वाभिमान की बाट खोज रहे मजदूरों को उनका खोया हुआ स्वाभिमान वापस दिलाया है, जो पहले कभी नहीं देखा गया है.

जब प्रधानमंत्री ने चार साल पहले महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में एक स्पष्ट आह्वान किया था, तो क्या हमें पता था कि एक तरह से एक और क्रांति देशभर में खड़ी हो जाएगी? इसका अपना अलग पहलू है. इस पहलू की प्रासंगिकता यह है कि यह अक्सर देश भर के स्कूलों में पढ़ाया जाता है. सामाजिक रूप से उपयोगी उत्पादक कार्य (SUPW) वर्ग के बारे में बच्चों को पढ़ाते हुए इसमें खाना पकाना, शिल्पकारी और सफाई जैसे दैनिक जीवन के कार्यों में उपयोग होने वाले कौशल को बताया जाता था. परंतु दुर्भाग्यवश आज भी इसको एक अनावश्यक घटक के रूप में देखा जाता था. क्लास के कैरिकुलम में इसको सिर्फ इन्हीं दायरों के बीच में बांध दिया गया था. हम यह भूल जाते हैं कि SUPW का एक मुख्य उद्देश्य हमारे बच्चों को श्रमिकों की गरिमा को समझाने में मदद कराना था, जिसको सामान्य भाषा में हम ‘डेड-एंड जॉब ’कहते हैं, जो एक भारी गलती है.

महात्मा गांधी ने ‘ब्रेड लेबर’ की अपनी अवधारणा के माध्यम से श्रमिकों को अत्यधिक महत्व दिया था. अपने एक लेख में,उन्होंने लिखा, “ब्रेड लेबर का अर्थशास्त्र ही जीवन जीने का तरीका है. इसका अर्थ है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने भोजन और कपड़ों को पाने के लिए अपने शरीर के साथ श्रम करना पड़ता है. अगर मैं लोगों को ब्रेड लेबर के मूल्य और आवश्यकता को समझा सकूं तो उन्हें कभी भी रोटी और कपड़ा की ज़रूरत नही होगी. मुझे लोगों को यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि उन्हें विश्वास है कि यदि लोग ज़मीन पर काम नहीं करेंगे या बुनाई नहीं करेंगे तो उन्हें भूखा और नग्न रहना होगा.”

महात्मा गांधी का कहना था कि यदि कोई व्यक्ति दिन में एक घण्टा गरीबों द्वारा किये जाने वाले श्रम को करता है तो उससे महान या अधिक राष्ट्रवादी व्यक्ति की कल्पना वो नहीं कर सकते हैं.

इसके माध्यम से वह मानव जाति के साथ साथ स्वयं को भी पहचानेगा. शिरिश्रमा, जिसका मतलब शारीरिक श्रम और प्रयास होता है, उसके माध्यम से महात्मा गांधी ने कहा कि यह समाज के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक शर्त है. उन्होंने कहा कि वर्ण व्यवस्था के गलत अर्थों ने जिस तरह समाज को विभाजित किया है, उसी प्रकार से श्रम के अवमूल्यन ने भी समाज को विभाजित करने का कार्य किया है.

जब लोगों ने दिल्ली के पहाड़गंज में भीमराव अंबेडकर सेकेंडरी स्कूल के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की मूर्ति के नीचे की ज़मीन साफ करने वाली तस्वीरों को देखा, तो कई लोग प्रभावित हुए. इस एक तस्वीर ने बिना शब्दों के ही कई बातें अपने आप ही कह दी है. इतिहास के पन्नों को फिर से खोलने पर आपको यह पता चलेगा कि वह बाबा साहेब ही थे, जिन्होंने इन सामाजिक रीति-रिवाजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, जो समाज में जन्म और इससे जुड़े पेशे के आधार पर पदानुक्रम पैदा करते थे. प्रतिमा के आस-पास की जमीन की सफाई करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुराने अनुक्रम की अंतिम कड़ियों को भी ध्वस्त कर दिया है.

विरोधी इसे प्रतीकवाद बोल कर अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि जब राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली, सबसे अमीर, और सबसे चर्चित व्यक्ति झाड़ू उठाते हैं और अपने इलाके, अपने शहर और अपने देश को अत्यंत गर्व के साथ साफ करते हैं, तो हर प्रकार से यह एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत है जो श्रमिक के काम से जुड़े तथाकथित कलंक को चकनाचूर कर रही है.

यही कारण है कि इसमें ‘न्यू इंडिया’ देखा जा रहा है.

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फोटो क्रेडिट

लेखक: नवनीत शर्मा