चचा संपादक हैं हमारे!

धरती के जिस कोने से हम आते हैं, वहाँ भतीजा होना अपने आप में बहुते बड़ी उपलब्धि होती है. लोग-बाग भतीजे होते हैं सांसद जी के, विधायक जी के, मुखिया जी के, डी यस पी साहब के और दरोगा जी आदि के. 

खूब चांदी होती है ऐसे लोगों की. स्कार्पियो में घूमते हैं रे बैन लगाकर, वो नही तो री भेंन लगाकर बुलेट से. मजाल किसी की जो हेलमेट के लिये रोक दे या लाइसेंस माँग ले, ड्राइविंग का या फिर बन्दूक का ही. मास्टर की मजाल जो यह पूछ ले कि तीसरी घन्टी हो गई, अब आ रहे हो बउआ? या प्रखंड कार्यालय में बीडीओ किसी काम के लिए मर-मजाक में ही पूछ दे कि पान पता नही कराइएगा भैयाजी ? सस्पेंड थोड़ी होना है उसको. भतीजे लोग का अलग टैप का टशन होता है. मने ऐसा वाला कि अमेजेनिया मिर्जापुर के मुन्ना शुक्ला जैसे लोग उनके मोटरसाइकिल के पीछे राजा बाबू के शक्ति कपूर जैसे बैठते हैं. 

हम तो हम ठहरे. ऊपर जब किस्मत के रिसोर्स अलोकेशन में ‘किसको कौन चचा मिलेगा’ की ‘फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व बेसिस’ पर बंदरबांट चल रही थी, तब हम छोटे लाल के पान दोकान पर तुलसी डबल ज़ीरो बंधाते रह गए और हमको मिल गए चचाजी एडिटर, मने संपादक आ उहो हिंदी वाले. हमारी आगे की व्यथा कुछ ऐसी है:

बचपन हमारा ऐसा बीता कि इस्कूल को इस्कूल कह देने पर मस्ट्राइन ने इसलिए उल्टे हाथ पर डस्टर से मारा कि चचा संपादक हैं तुम्हारे और स्कूल बोलना नही आता? उच्चारने गोल है तुम्हारा एकदम. 

“पर मैडम वो तो उच्चारण होता है? सही तो आप भी नही…” टोकते ही बेल्टे-बेल्ट…

सालों बीत गए पर बरमूडा ट्राइंगल जैसी यह मिस्ट्री अब तक न सॉल्व हुई कि मार अपने एक्सेंट के वजह से पड़ी थी या इस कारण कि चचा यदा कदा पैरेंट टीचर मीट में जाकर उनको इगनोरित करके रंग्रेजी वाली मैडम से पूछ डालते; “सो होऊ इज़ माय वार्ड डूइंग?” जब जवाब मिलता कि वेरी वेल तो चचा सप्लीमेंट्री सवाल दाग देते; “एन्ड यू?”

हम थोड़े बड़े हुए. किशोरावस्था में मनोज तिवारी का गाना आया ‘चचा हमार बिधायक भइले नाही डेराइब हो, ए डबल चोटी वाली तहके टाँग ले जाइब हो’. ससुर (यदि चचा के कैंची से बचते बचाते यह शब्द फाइनल पब्लिश्ड वर्जन तक पहुंच जाए तो भाषा के लिए माफ़ करें) सदर विधायक का भतीजा क्लासमेट रहा. मार झारे ताव आई टी आई मैदान में, महिला खो खो देखते हुए रिकार्ड प्लेयर पर गाना चला के. हम, थैंक्स टू संपादक चचा, तब यमक और अतिशयोक्ति अलंकार के उदाहरण लिखने पढ़ने में ही जियान हो रहे थे. 

समय का चक्र किसके लिए रुका है जो हमारे लिए रुकता. हम और बड़े हुए. पहुँच गए वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय इतिहास में बीए-एमए करने. एमे-ओमे करते हुए छुटभैया नेतागिरी का शौक लग गया, जैसा उस उम्र में वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय पहुँच जाओ तो लग ही जाता है. और हम तो हिंदी साहित्य अनुरागी भी थे. शौक लग गया तो लग गया. सिविल लाइन्स से लेकर पुलिस चौक तक चाय की दुकानों पर हमारी बैठकी लगने लगी. 

चचाजी उन दिनों जिले के एक इनफेमस अखबार ‘क्राइम खबर’ जिसकी रीडरशिप कुल जमा 42 थी, की बेबाक संपादकी करते थे. बेबाक सम्पादकी से मतलब यह कि एक्सटॉर्शन का धंधा करते थे. किसी भी बड़े आदमी के खिलाफ कुछ कलम घिस देते और उसके दरवाजे पर पहुँच जाते. पहले चाय, पानी, खस्सी, मुर्गा इत्यादि करते और फिर लेख दिखाकर इज्जत का हवाला देते और कुछ रुपये लेकर चेतक स्कूटर पर बैठ घर आ जाते. बढ़िया धंधा था, बीच बीच में कुछ पान पराग भत्ता हमपे भी छिड़क देते चचा. 

एक दिन हुआ ये कि रेलवे फाटक से आते हुए चीनी मिल वाली गली में चचा ने शहर के सबसे बड़े गुंडे झूलन सिंह की भतीजी को किसी के साथ देख लिया, मने खाली साथ में देख लिया. चचाजी के अंदर का सालों से मृत पड़ा रिपोर्टर जाग गया और चचा ने लिख दिया लेख और फ्रंट पेज पर छाप भी दिया. क्राइम खबर छपता ही सिर्फ 42 गो था, उस दिन सब बिका. इतना ही नही बल्कि जिले के ऑलमोस्ट सभी फोटो कॉपी के दुकान पर ट्रेंड भी किया. मतलब चचाजी का लिखा उस दिन शहर का डांसिंग अंकल था. 

चचाजी एक्सटॉर्शन के धंधे के पुराने खिलाड़ी थे. खतरा भाँपकर भाग खड़े होने में आजकल के टीवी जर्नलिस्ट्स से भी ज्यादा निपुण चचा चाची के मायके भाग गए. 

हम पूरे रुआब में इस बड़ी घटना से अनजान पुलिस चौक पर जूस की दुकान पर बिना फिल्टर वाला पनामा सिगरेट धूकते हुए राजनीतिक पतन पर मोनोलॉग टैप दे रहे थे. झूलन सिंह के बेटे-भतीजों की हॉकी डंडे जैसे कस्बाई अत्याधुनिक हथियारों से लैश टोली बगल में खड़ी होकर जूस पीने लगी. ये लौंडे हमें जानते थे और हम उन्हें. इन रेट्रोस्पेस्ट ऐसा नही है कि हमने मूर्खतापूर्ण सवाल नही किया होता तो उनकी नज़र हम पर न पड़ी होती. लेकिन इमानदारी का तकाजा है कि यहाँ यह भी बता दें कि – “केकर खोज होता भाई”; सवाल कर ध्यानाकर्षित हमने स्वयं किया. 

जवाब में इतने लात जूते और हॉकी लाठी पड़े कि हम सदर अस्पतालित हो गए. 6 घंटे तक जब कोई यूनिवर्सिटी वाला जवान भी हमें पूछने न आया तो हमने ड्यूटी पर लगे जूनियर डॉक्टर को ही पूछा; “बाकी सब तो ठीक है पर ये नही समझ आ रहा भाई कि ऐसी गदर कुटाई क्यों हो गयी.” उसने चचाजी के लेख का एक फोटोकॉपी हम पर दे मारा. सारी तस्वीर साफ हो गयी. ढ़ीठ हम बचपने से रहे हैं और इसका एक बड़ा प्रूफ हमने उस दिन भी दिया. भीतरमार का जख्म दिखता नहीं. इसलिए अस्पताल हमें शाम तक डिस्चार्ज कर देने को आमादा था पर हम उस बंकर को छोड़ जाने को तैयार नही थे. हमने कारुणिक आवाज में गुहार लगायी; “अभी लड़का पक्ष वाला सब भी तो शहर में छुट्टा घूम रहा है न भाई.” 

अंततः जिले के सीएमओ जिनको गबन वाले अनपब्लिश्ड खबरें दिखाकर चचाजी मलाई चाँपते रहते थे, उन्होंने एक रास्ता निकाला. हमने चाची के गाँव का पता दोनों ही पार्टियों को बता दिया और दूसरी पार्टी की कूटाई से बच गए. इसके अलावा बात ठंडी पड़ने तक हमें अस्पताल में शरणार्थी रहने का फ्री पास भी मिल गया.

ये सारा घटनाक्रम जेनरल वार्ड में ही हुआ. बगल वाले बेड पर पड़े हर्निया के ऑपरेशन से उबर रहे एक बाबा बोले; “बड़े हरामी हो बेटा तुम.” हमने हँस कर बस इतना कहा; “अरे बाबा, आप हमारे चाचा को नही जानते.” चचा सम्पादक हैं हमारे, ‘क्राइम खबर’ के.

15 दिन बाद आग बिल्कुल ही थम गई. आगे कहीं कुटाने की संभावना नही बची, ये गॉज कर हम अस्पताल से निकले आए.

वहीं ससुराल में पड़े रहकर भी चचा किसी की पकड़ में नही आए थे, ऐसा चचा का दावा था पर चश्मदीदों के एकाउंट चचा के इस दावे की चुगली करते थे. ससुराल से लौटने पर न उन्हे मार लगी और न ही कोई उन्हे खोजने आया. ‘क्राइम खबर’ बदस्तूर छप ही नहीं रहा था बल्कि अब उसका सर्कुलेशन भी 42 से बढ़कर 420 हो चुका था.

फोटो क्रेडिट

Inquisitive. Perpetual Rookie - @ruppanbabu