राहुल गांधी-मनोहर पर्रिकर मुलाकात विवाद: संवेदना और मर्यादा पर राजनीतिक कुठाराघात

आज भारत की राजनीति में संवेदनहीनता का एक और काला अध्याय लिख दिया गया. देश की जनता का भविष्य और विश्वास उसके जन-प्रतिनिधि पर टिका हुआ होता है. लोकतंत्र को बचाए रखने की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं जन प्रतिनिधियों की होती है. परंतु लोकतंत्र का भविष्य तब अंधकारमय दिखने लगता है जब जन-प्रतिनिधि ही असत्य की नींव पर भविष्य की इमारत खड़ा करने का प्रयास करते हुए संवेदना और मर्यादा का न्यूनतम स्तर भी लांघ जाएं. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने ऐसा ही कुछ किया है.

राहुल गाँधी कैंसर की घातक बीमारी से जूझ रहे गोआ के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से मिलने पहुंचे थे. राजनीति में ऐसा शिष्टाचार तो होना ही चाहिए. मुलाकात हुई और राहुल गाँधी उनकी कुशलक्षेम पूछकर वापस चले गए. ऐसा लगा जैसे भारतीय राजनीति में शिष्टाचार और संवेदना अभी शेष है. लेकिन तब बहुत बड़ी निराशा हाथ लगी जब राहुल गाँधी द्वारा एक तथाकथित सनसनीखेज़ खुलासा किया गया. उन्होने कहा कि मनोहर पर्रिकर जी ने उनसे कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे बिना पूछे राफेल सौदे को बदल दिया था.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए इतनी हल्की बात सबके सामने रखते हैं. उनसे ऐसी अपेक्षा देश नहीं करता है. जब देश की सर्वोच्च अदालत से यह मामला साफ हो चुका है तो उसको स्वीकार करने में क्या परेशानी है. आंख बंद कर लेने से अंधेरा नहीं हो जाता. राजनीति सिर्फ़ अंकों का खेल नहीं है. यह एक ज़िम्मेदारी भी होती है. आपके शब्दों और विचारों में एक गंभीरता नज़र आनी चाहिए. इन पीड़ादायक क्षणों में भी मनोहर पर्रिकर जी अपनी बीमारी में भी गोआ में अपना काम कर रहे हैं. शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट झेल रहे एक व्यक्ति को जब यह पता चलेगा कि उसके नाम से ऐसी सस्ती राजनीति हो रही है तो उसका क्रोधित और निराश होना स्वाभाविक है. क्या विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष के लिए देश में अब मुद्दों की कमी हो गयी है? इस पूरे घटनाक्रम के बाद मनोहर पर्रिकर ने एक पत्र राहुल गाँधी को लिखा है जिसमें उन्होने राहुल जी के लिए ‘गैर-जिम्मेदार’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया हैं. किसी भी स्वाभिमानी राजनीतिज्ञ के लिए यह शब्द पीड़ादायक होगा. राहुल जी को कैसा लगा होगा, वही जानें.

राजनीतिक दुनिया में नेताओं के बीच क्या बातचीत होती है और कैसी टीका-टिप्पणियां होती हैं, यह उनका निजी मामला है. आम तौर पर इस वार्ता का ब्यौरा आम जनमानस में नहीं आता. और यदि ऐसा ब्यौरा गलत पेश किया जाता है तो यह नैतिकता को अंगूठा दिखाने जैसा है. लोकतंत्र में राजनीति की स्वतंत्रता है, लेकिन उसकी भी अपनी कुछ मर्यादाएं होती है. उन मर्यादाओं से बाहर जाना देश के किसी भी राजनीतिज्ञ को शोभा नहीं देता है.

ऐसी घटनाओं से जनता का विश्वास डगमगाता है. राजनैतिक दुनिया में ‘पॉलिटिकल स्कोर’ बनाने के बहुत मौके हैं. इसके लिए संवेदना की कीमत पर मर्यादा से बाहर जाना उचित नहीं. अभी तो राहुल जी युवा हैं. उनके आगे पूरा भविष्य पड़ा हुआ है. राजनीति में ऐसी अधीरता जनता को पसंद नहीं होती और न ही यह लोकतंत्र के लिए शुभ है. आशा है कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष यह समझेंगे.

1 Comment

  1. Shubham kumar
    February 1, 2019 - 6:41 am

    राहुल गांधी कुछ नहीं है उसे जितना अधिक bjp वाले उछालेगे वह उतनी प्रसिद्धी पाता जायेगा congress को वोट लोग राहुल गांधी के दम पर कभी नहीं देते बल्कि उन्हे तो वोट सिर्फ़ एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए और भ्रष्ट नेताओ के जातिवादी राजनिती के बल बुते मिलते हैं

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