मैं अभी संगमरमर के चमचमाते हुए पत्थरों पर चल रहा हूँ, दीवारें भी संगमरमर से सुसज्जित हैं. दीवारों का रंग नेत्रों को सुख पहुँचा रहा है. अब मन्त्रोच्चारण भी कानों में गुंजायमान होने लगा है. हर ओर अद्भूत वातावरण है. मेरे सम्मुख जिस पट्टिका में ‘सब कुछ’ लिखा हुआ है, वह निश्चित ही स्वर्णिम है व उस पर जड़ित वह चमकीला पत्थर कुछ और नहीं, हीरा ही है.
कुछ बच्चे जो बमुश्किल पाँच-छः वर्ष के होंगें, वे इस ओर ही चले आ रहे हैं. अरे यह क्या, यहाँ तो लगभग सभी एक ही प्रकार के वस्त्र धारण किए हुए हैं, जो शीघ्र कहीं पहुँचने की चाह में हैं.
कुछ शिलाएँ यहाँ रखी गईं हैं, जो टूटी हुई हैं. आखिर कब टूटीं, कैसे…..?
पता नहीं! पर क्यों? इसका उत्तर है मेरे पास.
‘स्वर्णिम-मनोहर-अद्भुत-अविश्वसनीय-अकल्पनीय’ दृश्य जिसे देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि स्वर्ग ऐसा हो सकता है. कदाचित स्वर्ग ऐसा भी न हो, स्वर्ग से भी उत्तम है यह स्थान.
ख़ैर स्वर्ग-नर्क तो कर्मों का खेल है. इस पर बात क्यों?
अरे यह घण्टों के बजने की आवाज़ है, अहा!
मन्त्रोच्चारण अब लगभग स्पष्ट है.
गुंबद के ऊपरी भाग पर पवन के वेग से बातें कर रही ध्वजा मानो कह रही हो कि आज अंबर को छू लेना ही एकमात्र प्रण है. मैं मुख्य द्वार से तनिक दूरी पर ही हूँ. ह्रदय चींख-चींख कर कह रहा है कि जीवन का संपूर्ण सुख आज ही प्राप्त होगा.
अरे, यह मुख्य द्वार तो स्वर्ण निर्मित है, जिस पर अंकित है मेरे ‘अराध्य’ का नाम. अराध्य का नाम देख नेत्र भर आए हैं. यह खुशी के अश्रु हैं, मुझे खुशी हो रही है, हृदय गर्वित हो रहा है और मन बल्लियों उछलने को आतुर है. मैं मंद-मंद गति से आगे बढ़ रहा हूँ, किन्तु नयन अब भी अश्रुपूरित हैं. मेरे नेत्रों को विश्वास नहीं हो रहा है कि जो भी वह देख रहे हैं, वह सब सच है, किन्तु हृदय आंखों को बार-बार समझा रहा है कि सम्मुख उपस्थित दृश्य शत प्रतिशत सत्य है.
.कुछ कदम ही चला हूँ कि एक और प्रवेश द्वार सम्मुख है. यहाँ मैं दण्डवत् हो गया हूँ. नेत्र पुनः जलधार का स्राव कर रहे हैं. अब मैं अंदर प्रवेश कर गया हूँ. मेरे कदम स्वतः ही उस ओर जा रहे हैं जहाँ पूर्व से ही हज़ारों-हज़ार लोग खड़े हुए हैं. कदाचित ये किसी अक्षौहिणी सेना की टुकड़ी के सैनिक होंगें.
मन विचलित हो रहा है. एक मात्र प्रश्न कोलाहल कर रहा है कि जिस हेतु मैं यहाँ आया हूँ, वह कार्य अभी पूर्ण होगा या नहीं. और अब सेना की इस टुकड़ी के कुछ सैनिक आगे बढ़ रहे हैं. निश्चित ही ये सब परिक्रमा कर रहे होंगे.
भीड़ छंट रही है, किन्तु कुछ अन्य ‘सैनिक’ भी आ चुके हैं. सब दर्शनाभिलाषी हैं. मेरे समक्ष भीड़ अब हट चुकी है. अश्रु फिर बह रहे हैं. मेरे सम्मुख प्रतिमा है, मेरे प्रभु मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की. मैं नवनिर्मित भव्य राम मंदिर के प्रांगण में हूँ. मैं जहाँ हूँ, यह नगरी है अयोध्या.
और तभी टी. वी. चालू की आवाज से नींद खुलती है. बिजली आ चुकी है. समाचार चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई की बात हो रही है. प्रभु श्री राम को जितना समय वनवास काटने में लगा, उससे कई गुना अधिक अब लग रहा है जबकि प्रभु सिर्फ ‘छत’ मांग रहे हैं.
ये राम वो ही हैं जिन्हें निषाद ने मंदाकिनी तट पर आश्रय प्रदान किया और जिन्हें वानरों ने किष्किंधा में पलकों पर रखा.
वो श्रीराम आज न्यायालय की ओर टकटकी लगा कर देख रहे हैं. दुःख तो यह है कि पाँच सौ साल से चल रहे मन्दिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट से पाँच मिनट का समय भी नहीं लिया जाता.
सब तारीख में यह दर्ज हो रहा है कि तारीख बदलती रही, नयी तारीखें मिलती रहीं.
मैं अब भी समाचार देख रहा हूँ. अश्रु अब भी बह रहे हैं.
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लेखक: आकाश शर्मा ‘नयन’

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