युनिवर्सल बेसिक इनकम

युनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) एक ऐसा मॉडल है जिसके अन्तर्गत नागरिकों को उनकी आमदनी, रोजगार, संसाधनों और सामाजिक स्थिति से इतर सरकार द्वारा प्रति माह एक राशि दी जाती है जिससे गरीबी और पिछड़ापन कम हो और जीवन स्तर की गुणवत्ता में सुधार आए.

इस पर भारत जैसे देश में गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है. हमारे देश में अब भी 20% से अधिक परिवार गरीबी  रेखा के नीचे हैं. गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले अधिकतर सीमांत किसान परिवार हैं, जिनकी जोत की भूमि 1 एकड़ या इससे कम है. सरकार पहले से भी इन लोगों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से मदद दे रही है.

बेसिक इनकम का विचार दुनिया के कई देशों में प्रायोगिक तौर पर या किसी शासकीय इकाई में समग्रता के साथ लागू किया गया है. उदहारण के लिए, अमेरिका ने 1960 के दशक में चार प्रयोग किये गए जिसके तहत आयकर में छूट दी गयी. यूबीआई में लोगों द्वारा प्राप्त धन दवाईयों और विलासिता उत्पादों पर नहीं जाया किए गए.  इसके परिणामस्वरूप स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गई. लेकिन स्वस्थ्य या अन्य मामलों में कोई खास प्रगति देखने को नही मिली. घर के मालिकाना हक पर भी इसका प्रभाव नगण्य रहा.

इससे मिलता जुलता एक प्रयोग कनाडा के डॉफिन में 1974 और 1979 में भी किया गया जिसे मिन्कम (मिनिमम इनकम) के नाम से जाना जाता है. इसके परिणामस्वरूप रोगियों और खास तौर पर मानसिक बिमारियों से पीड़ित लोगों की संख्या में कमी आई. मिन्कम प्रोजेक्ट से दो वर्गों का काम में जाना कम हुआ. ये वर्ग थे युवतियां जो हाल ही में माँ बनीं थीं और वैसे युवा ने कम उम्र में पढाई छोड़कर काम करने की जगह 12 वीं की पढ़ाई करने लगे. इससे हाई स्कूल पास करने वाले छात्रों का अनुपात बढ़ा और प्रसूति महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ा.

भारत में सन 2010 में मध्यप्रदेश के 20 गांवों में यूबीआई से जुड़े प्रयोग किये गये जिसके परिणाम सकारात्मक रहे. इनमे से आठ समूहों को बेसिक इनकम मिला और शेष नियंत्रण समूह बने. ग्रामीणों ने भोजन और शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया. 68% परिवारों के बच्चों का शिक्षा में प्रदर्शन बेहतर हुआ. इससे कुपोषण से लड़ने में मदद मिली. विकलांगों को बेहतर मौके मिले. लोगों ने अधिक बचत भी की. शिक्षा और स्वास्थ्य में विशेष सुधार हुआ. क्षेत्र सीमित होने के कारण इस प्रयोग की सफलता सीमित थी, कई जगह वांछित सफलता नहीं मिली लेकिन इससे सीख लेकर और इसकी कमियों में सुधार करके इसे पूरे देश में लागू करने में कोई नुकसान नही दिखाई देता.

इसके तीन टारगेट ग्रुप (लक्ष्य समूह) हो सकते हैं:

  • गरीबी रेखा के नीचे व् सीमांत किसान जिन्हें दस हजार रुपये प्रति माह की मदद दी जाये.
  • 2 एकड़ तक की जोत वाले छोटे किसान जिन्हें साढ़े सात हजार रुपये प्रति माह तक की मदद दी जाये.
  • 5 एकड़ तक की जोत वाले किसान जिन्हें  5 हजार रुपये प्रतिमाह का समर्थन दिया जाये.

इसके अतिरिक्त कोई छूट अथवा सब्सिडी न दी जाये. यूबीआई का पैसा परिवार की गृहिणी के बैंक खाते में सीधे कैश ट्रान्सफर के माध्यम से दिया जा सकता है. इससे नारी सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिलेगा और साथ ही पैसे का अधिक सकारात्मक उपयोग सुनिश्चित होगा.

प्रश्न उठता है कि आखिर इतने पैसे कहाँ से आएंगे. सबसे पहले मनरेगा जैसी योजनाएं और अन्य प्रकार की सब्सिडी बंद कर दी जानी चाहिए.  पिछले 5 वर्षों में विभिन्न करों से सरकार की आय लगभग दोगुनी हो गई है और इसमे उत्तरोत्तर बढ़ोतरी की संभावना भी है. सरकारी खर्चों में कटौती की लगातार माँग होती रहती है और इस पर थोड़ा काम भी हुआ है. इससे भी धन बचाया जा सकता है. इन सबसे यूबीआई लागू किया जाए तो अफसर की जगह लोग खुद ही फैसला कर सकेंगे कि सरकारी मदद का उन्हें कैसा उपयोग करना है. ऐसा विश्वास किया जा सकता है कि डायरेक्ट कैश ट्रान्सफर और आयुष्मान भारत, उज्ज्वला, सौभाग्य इत्यादि योजनाओं से लोगों के जीवन स्तर में सुधर आएगा.

यूबीआई का दूसरा फायदा यह होगा कि लोग अपने बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा के लिए भेज सकेंगे. ये स्कूल सरकारी होंगे या प्राइवेट, इसका फैसला लोग स्वयं करें. इससे एक स्वस्थ प्रतियोगिता बढ़ेगी जिससे शिक्षा के बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे. इसके परिणामस्वरुप आरक्षण का मुद्दा भी धीरे धीरे कमजोर होगा क्योंकि बिना आरक्षण भी हर श्रेणी के छात्र बेहतर प्रदर्शन करेंगे. 

यूनिवर्सल बेसिक की संकल्पना लोककल्याणकारी राज्य की धारणाओं के सर्वथा अनुरुप है. भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश मे यूनिवर्सल बेसिक इनकम पर एकबार प्रयोग करने की जरूरत तो है ही.

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