पिछले दो अंकों में हमने देखा कि भारत की अर्थव्यवस्था किन बड़ी मुसीबतों से होकर गुज़री. अब हम बात करने वाले हैं प्रधानमंत्री मोदी के मोदीनोमिक्स की. प्रधानमंत्री मोदी के विज़न के अंदर बहुत सी चीज़ें चीजें आती हैं, लेकिन बदलती हुई दुनिया में बदलते हुए भारत की कहानी लिखने के लिए भी एक मज़बूत नींव रखनी पड़ती है. यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था के अंदर देखा जाए तो वैसे तो इसने बहुत से उतार-चढावों को देखा गया है, लेकिन 1991 के बाद से जिस प्रकार भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव आया है, वो देखने योग्य है.
भारत में भ्रष्टाचार एक सच्चाई है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता. इसकी जड़ पर प्रहार करने के बाद भी इस पेड़ की ‘ठूठ’ अर्थव्यवस्था में हमेशा रहेगी. प्रधानमंत्री मोदी के पास 5 वर्ष ही थे और वो यह जानते थे. इसीलिए उन्होंने पहला ज़रूरी काम देश की अर्थव्यवस्था में पैसे की बर्बादी को रोकना समझा. यही कारण है कि पहले अर्थव्यवस्था के चक्र से बाहर चल रहे पैसे को इसके अंदर लाने के लिए नोटबन्दी और जन-धन योजना जैसे कदम उठाए गए थे. इसके साथ ही जो सब्सिडी की चोरी होती थी, उसको रोकने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर लायी गयी. यानी पहले नींव बनाई गई, फिर उसके ऊपर इमारत खड़ी करने का काम हुआ. बिजली की उपलब्धता सभी गांवों तक सुनिश्चित की गयी. एलपीजी गैस जैसी ज़रूरी चीज़ को भी गरीबों तक पहुंचाया गया जो उनके जीवन की गुणवत्ता को सुधारेगा.
दूसरी बड़ी चीज़ थी भारत के अंदर की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करना. भारत जैसे बड़े देश में भी एक अर्थव्यवस्था का चक्र चलता है जिसमें राज्यों के बीच लेन देन होता रहता है. इसमें कई प्रकार के ऐसे टैक्स थे जिससे विभिन्न राज्यों के बीच व्यापार में दिक्कतें आती थी. GST के आने के बाद इसमें व्यापक सुधार देखने को मिल रहा है. निश्चित रूप से भारत के व्यापारियों को इससे आरम्भिक दिक्कत हुई है. लेकिन यह कड़वी चाय भविष्य के लिये लाभकारी है, इसमें कोई संदेह नहीं है. वहीं टैरिफ रेट को भी कम किया गया है. इससे निवेशकों में उत्साह बढ़ा है.
प्रधानमंत्री मोदी ने मेक इन इंडिया शुरू किया था, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि इसमें सफलता तभी मिल सकती है जब भारत में कौशल उस स्तर का हो जैसे चीन के अंदर होता है. यहां यह नहीं कहा जा रहा कि भारत में कौशल की कमी है, लेकिन एक ‘स्टैण्डर्ड’ बनाये रखने के लिए चीज़ों को दुरुस्त रखने की आवश्यकता होती है. इसी कारण मोदी ने सोचा कि भारत में ही प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया जाए. इसके लिए भारत में निवेश करने के कानूनों में बेहतर बदलाव किए गए जिसका एक नतीजा है कि भारत की ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ रैंकिंग में सुधार आया है. यही कारण है कि सैमसंग जैसी कम्पनी ने सबसे बड़ी फैक्ट्री नोएडा में खोली है. इसके पीछे विचार यह था कि भले ही आप अपनी प्रतिस्पर्धी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा करें, लेकिन एक स्तर तक भारत में ही उत्पादन करें. यह मेक इन इंडिया की तरफ एक बेहतर कदम के तौर पर देखा जा सकता है.
निश्चित रूप से चीजें और भी हैं जिनको बेहतर किया जाना है, लेकिन 5 साल की सीमित अवधि में जिस नींव को डालने की आवश्यकता थी, उसको किया गया है. अब जैसे अमेरिका ने H1-B1 वीज़ा बंद करने की बात कही थी. यह बात समझ से परे लग रही थी कि भारत की सरकार द्वारा इसमें क्यों दिलचस्पी ली गयी क्योंकि यह सीधे तौर पर आपके ही फायदे की बात थी. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि ये होता है तो भारत से बाहर जाने वाली प्रतिभा भारत में ही रहती और यहां की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करती. जैसे स्नैपडील की शुरुआत करने वाले कुणाल बहल की कहानी को ही ले लीजिए. कुणाल बहल को US का वीज़ा नहीं मिला तो उन्होंने भारत में ही स्नैपडील की शुरुआत कर दी.
एंटरप्रेन्योर को भी बढ़ावा देने का कार्य भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का एक कदम है. भले ही इसके तुरंत अच्छे परिणाम देखने को न मिलें लेकिन लंबी दूरी की रेस के लिए यह एक बेहतर चीज़ होगी. अब भविष्य की तरफ देखें तो ‘मैन्युफैक्चरिंग/सर्विस आउटसोर्सिंग’ एक बड़ा मुद्दा होने वाला है. ज़ाहिर सी बात है कि आज के आधुनिक युग में आप सीमाओं के बंधनों से मुक्त हैं. इससे अमेरिका के निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग पर बड़ा असर पड़ेगा, जिसकी चिंता अमेरिकियों को भी है. आने वाले समय में 5G भारत में आएगा. इसके लिए डिजिटल इंडिया की नींव पहले से ही रख दी गयी है. कहने का मतलब ये कि हर चीज़ को एक योजना के अंतर्गत रखा गया है. आप अर्थव्यवस्था की सभी चीजों को 5 साल के कार्यकाल में दुरुस्त नहीं कर सकते किन्तु एक बड़े वर्ग को छूने का प्रयास प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किया गया है.
कुल मिलाकर भारत के पास आने वाले समय में बढ़ती हुई जनसँख्या के बावजूद इतने अवसर हैं जितने किसी देश के पास शायद ही होंगे. दुनिया की सबसे युवा जनसंख्या हमारे पास होगी. हमारे पास वो सब कुछ होगा जिसको यदि बढियां नींव मिली, तो विकास की इमारत खड़ी की जा सकती है. इसी एक नींव को डालने का नाम है ‘मोदीनोमिक्स’ जिसकी बात हमने की है.
अब देखना यह है कि इससे आगे क्या बदलाव देखने को मिलते हैं, क्योंकि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. 2019 के नतीजे भारत की अर्थव्यवस्था के भविष्य का भी निर्णय करेंगे.

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