भारत कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था. आज वह दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से संघर्ष कर रहा है. निश्चित रूप से इसका एक कारण विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण और ब्रिटिश राज का आगमन रहा, लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं था. जब दुनिया को पढ़ना भी नहीं आता था, तब हमारे यहां बड़े काव्य ग्रन्थ लिख दिए गए थे. ऐसी संस्कृति का जनक भारत किस प्रकार से इतना पिछड़ गया. इसका विश्लेषण करें तो कई आश्चर्यजनक नतीजे सामने आएंगे.
आज से एक हज़ार साल पहले भारत की प्रति व्यक्ति आय ब्रिटिशर्स की आय से 110% ज़्यादा थी. सन 1500 तक आते ही यह 75% से 77% तक गिर गयी थी. सन 1600 तक यह प्रदर्शन 60% तक आ गया और सन 1700 तक यह 40% तक गिर गया था. सन 1800 तक यह 27% से 30% तक पहुँच गया. सन 1900 तक यह 14% से 15% हो गयी. वहीं इसी शताब्दी के खत्म होते होते यह 6% से 7% तक आ गयी. ये पूरी कहानी अब तक प्रति व्यक्ति आय की रही है.
हम अमेरिका से भी बड़ी अर्थव्यवस्था के स्तर से चले. आज हम इस स्थिति में हैं. सन 1600 से 1870 के बीच यदि हम दो बड़े स्कॉलर्स ब्रॉडबेरी और गुप्ता की स्टडी पर जाएं तो हम पाएंगे कि हमारी जीवन शैली में एक बड़ी गिरावट आई है. 1800 के दशक की शुरुआत में भारत में औद्योगिकरण में बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी. मुग़लों के आखिरी समय में जब अंग्रेजों ने अपनी पैठ बनानी शुरू की, तब भारत में उत्पादन में एक जबरदस्त गिरावट देखी गयी थी.
बिहार जो आज भारत के सबसे गरीब राज्यों की श्रेणी में आता है,सन 1800 के दशक के शुरुआत में उसकी जनसंख्या का 25 प्रतिशत उत्पादन के क्षेत्र में था. सन 1902 तक आते आते यह 10% तक गिर गया. आज जिनको बीमारू राज्यों की श्रेणी में रखा जा रहा है, एक काल खंड में वो राज्य देश के GDP में एक बड़ा योगदान देते थे. यही कारण है कि सबसे ज़्यादा मार इन्हीं राज्यों को पड़ी थी. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि गंगा नदी के तट पर बसे सभी क्षेत्र न सिर्फ उपजाऊ थे बल्कि व्यापार के मामले में भी बेहतर थे. आज के हिसाब से बिहार और पश्चिम बंगाल के जनसख्या घनत्व को देखें तो यह पूरे न्यूयॉर्क से भी ज़्यादा है. यह आर्थिक रुप से एक समय बहुत लाभकारी था.
सन 1600 से अगले 350 सालों के भीतर भारत की अर्थव्यवस्था इतनी बुरी तरह से धड़ाम हुई जिसकी बानगी आप बीमारू राज्यों के रूप में देख सकते है. सिर्फ राजनैतिक और धार्मिक संदर्भ से ही नहीं बल्कि आर्थिक संदर्भ में भी हमको बहुत बड़ा आघात पहुँचा था. यह पूरी कहानी बताती है कि पिछले 1000 सालों में हमने क्या खोया है. आर्थिक विकास की बात करें तो पहले आपको समझना होगा कि आर्थिक विकास का मतलब क्या होता है. आर्थिक विकास का सीधा सा मतलब है कि आपकी उत्पादकता क्षमता लगातार बढ़ती जा रही हो. यद्यपि यह पूरा सत्य नहीं कहा जा सकता लेकिन एक तरह से देखा जाए तो आर्थिक विकास की ज़मीन यहीं से तैयार होती है.
हालांकि यह विभिन्न अर्थशास्त्रियों के हिसाब से अलग हो सकता है. यह आर्थिक विकास कब हो सकता है? जब देश में शांति हो. पिछले 100 साल के ही आँकड़ें यदि देख लें तो आपको पता चल जाएगा कि भारत में शान्ति रही ही नहीं. यही कारण है कि भारत की अर्थव्यवस्था लगातार गिरती रही. फिर भी डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया लगभग बराबरी पर था. यह इसलिए क्योंकि तब औद्योगिकरण पूरी तरह से यूरोप और बाकी इलाकों में लागू नहीं हुई थी. दुनिया के ज़्यादातर देश आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे.
आज़ादी के बाद क्या ऐसा हुआ कि भारत का रुपया लगातार गिरता गया? यदि आप 1991 के आर्थिक ‘आपातकाल’ को इसका कारण सोच रहे हैं तो आप पूरी तरह से सही नहीं है. इसके पीछे करीब 30 वर्षों की एक छोटी गलती थी जिसको कुछ राजनैतिक कारणों से बड़ी बनाई गई थी. इसी ने 1991 की स्थितियों की एक ज़मीन तैयार कर दी थी.
क्या थी नेहरू के बाद इंदिरा की वह गलती? जानने के लिए पढ़िए इस सीरीज का अगला अंक.
क्रमश …
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ये हर्ष गुप्ता के अंडरस्टैंडिंग मोदिनोमिक्स का हिंदी लेख रूपांतरण श्रृंखला हैं.
Photo Credit : FX Trader Magazine

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