पिछले साढ़े चार बरस,
जो गये बुरे दिनों को तरस,
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
खरबों रुपये के घोटालों को,
दामाद, मामा व दलालों को,
हर डील पर लटके तालों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
यह देखने जो गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
आये दिन आतंकी हमलों को,
‘हिंदु आतंकी है’ के जुमलों को,
पुरोहित, साध्वी पर ज़ुल्मों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
इस स्थिति को गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
विदेशों मे गिरती धाक को,
भारत पर हावी पाक को,
अंडर अचीवर्र की शाख़ को।
पिछले साढ़े चार बरस,
इस मंज़र को गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
पिच्चतीस तरह के करों को,
एक्साइज के रजिस्टरों को,
सरकारी दफ़्तर के चक्करों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
दोहराने को गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
बैंकों से लूटते पैसों को,
जो गया माल्या जैसो को,
जनधन पर मंत्री की ऐशों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
जो गये देखने यह तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
अधमर्रा सी सड़कों को,
हाईवे पर उन गड्ढों को,
बदन पर लगते झटकों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
यह झेलने जो गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
नेताओं के इफ़्तार को,
उनकी टोपी जालीदार को,
हिंदुओं के दुतकार को।
पिछले साढ़े चार बरस,
यह सहने जो गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
हर जगह पसरे अंधेरों को,
शोर मचाते जेनरेटरों को,
इन्वर्टर पर चलते घरों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
यह देखने जो गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।
महँगाई की लहरों को,
बढ़ते ब्याज की दरों को,
पंहुच के बाहर घरों को।
पिछले साढ़े चार बरस,
यह सहने जो गये तरस।
सुधार लेना अपनी भूल को,
और चुन लेना राहुल को।

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