ऑफिस के वाशरूम में शीशे के सामने खड़ी प्राउड वाली मुस्कुराहट के साथ झुर्रियों वाले गाल ब्लश से चमकाती हुई सीईओ हो या कॉम्पलेक्स प्रोजेक्ट की तरह बालों की उलझन सुलझाती हुई वीयर्ड एक्सप्रेशन वाली मैनेजर या ला ला ला गाती और लाली लगाती हुई उसी वाशरूम की सफाई करने वाली हाउस लेडी हो, सबकी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है कॉरपोरेट कल्चर मेन्टेन करने में. महिला सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण आयाम यहाँ दिखता है.
महिलाएं किसी से कम थोड़े न हैं, ये बात सबने मानी है. तभी तो आज हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपना विशेष स्थान बना लिया है. कॉरपोरेट भी अछूता नहीं रहा. हालांकि फेमिनिज्म की फैशनेबल परिभाषा में डोर सिर्फ पुरुषों को ही होल्ड करना होता है. उनके लिए पुरुषों का लिफ्ट रोकना भी ज़रूरी है और मीटिंग रूम में चेयर कम पड़ जाने पर अपनी चेयर देकर महिला साथी को बिठाना भी. यह सब इसलिए नहीं कि महिलाएं कमज़ोर हैं. वे पुरुषों के बराबर ही नहीं बल्कि उनसे बेहतर हैं और पुरुषों को इस बात का सम्मान करते हुए ऐसा करना चाहिए. इन्हे कौन समझाए कि मंज़िलें एवं मुकाम और भी हैं, फेमिनिज्म के सिवा जहाँ और भी है.
फेमिनिस्ट्स के साथ साथ आम महिलाओं ने भी उन पुराने टीवी कार्यक्रमों और फिल्मों पर आपत्ति जताई जिनमे महिलाओं का कॉरपोरेट में रोल अमीर बॉस की खूबसूरत सेक्रेटरी होने तक सीमित होता था. उनका काम चंद फाइल्स पहुँचाना, बॉस को चाय-कॉफी पूछना, अप्वाइंमेंट लेना-देना और फोन कॉल्स मैनेज करना हुआ करता था. प्रोमोशन के तौर पर कभी कभी बॉस उन्हें विवाह प्रस्ताव ही भेज देते थे. इस तरह गृहस्थी में बंधकर करियर लगभग घर तक सिमट जाता था. मिडिल क्लास के ऊँची नाक वालों पर इस स्टीरियोटाइप कथानक का बहुत असर हुआ और उन्होंने महिलाओं के लिए टीचर या बैंकर जैसी कुछ नौकरियों को ही ‘प्रेफरेबल’ बता दिया. धीरे-धीरे समय बदला, अर्थव्यवस्था बदली. मेहनत और लगन से अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए महिलाओं ने कॉरपोरेट में अपना प्रभुत्व जमाया और कुछ हद तक समाज की सोच भी बदली. यह एक नया विहान था.
अपने परिश्रम का समानुपाती हक़ जताते हुए फैसिलिटीज रिडीम करके वर्क लाइफ बैलेंस करने का गज़ब उदाहरण हैं महिलाएं. ये बड़प्पन ही है कि ऑफिस में देर तक रुकने में वे कोताही नहीं करतीं, दफ्तर पहुँचने में भी लेट लतीफ नहीं होतीं. यदि कॉरपोरेट्स से उचित रिवार्ड की अपेक्षा करती हैं तो यह स्वाभाविक ही है. महिलाओं मे उदारता ऐसी होती है कि वे अक्सर सहकर्मी की बिना बहस किए मदद कर देती हैं. “तुम अप्रूवल ले लो न बॉस से, मुझे सवाल करके टरका देंगे”, “भसड़ मच गई यार, क्लाइंट भड़क गया, तुम संभाल लो” और “अर्रे सुट्टा पीने चलोगी, प्रेजेंटेशन खराब होने का स्ट्रेस है” आदि पर भी जजमेंटल नहीं होतीं.
महिलाओं के स्ट्रगल अलग अलग स्तर पर अलग अलग हैं. सीनियर पोजीशन पर बैठी हुई महिला टेक/कंप्यूटर सेवी नहीं है. उनको जूनियर द्वारा भेजी गई रिपोर्ट सिर्फ इसलिए गलत लगती है कि रिपोर्ट कंप्यूटर में मिनीमाइज होकर खुल रही है. उस जूनियर को डांट लग जाती है जिसने एक टूल बनाया और जेनेरिक ग्रुप में आईडी भेज दी, पासवर्ड xx1234 के साथ. इसमें उस जूनियर की क्या गलती यदि सीनियर महिला ने पासवर्ड वाली अलग भेजी गयी मेल न चेक करके पासवर्ड वाले सेक्शन में xx1234 ही भर दिया. परफॉर्मेंस प्रेशर झेलती मैनेजर महिला के लिए काम के बीच मे एथिनिक डे, ईयर एन्ड पार्टी और फेस्टिव सीजन्स चिढ़न जैसे होते हैं लेकिन औपचारिकता तो निभानी ही पड़ती है. करियर की गला-काट प्रतियोगिता मंद होती नहीं कि अम्मा शादी के एक-दो सॉफ्ट तकाजे कर देती हैं. कॉरपोरेट आकाश में इंटर्न चिड़ियों का धीरे-धीरे फुदकना, चहकना और उड़ना सीखना दुनिया से कदमताल करने का सच्चा अनुभव होता है.
एक मेहनती महिला ऐसे स्ट्रगल के किस्से कहे भी तो किससे कहे. कई बार पुरुष सहकर्मी सुनने एवं सांत्वना के बहाने कंधे या हाथ पर हाथ रखने का बहाना पा जाते हैं. अब इतनी सी बात के लिए HR में ER भी तो रेज नही कर सकते ना. हाउस लेडी का दुख भी कुछ कम नहीं जिसे कम्पनी की सिक्युरिटी वाले अक्सर पूछ लेते हैं; “घर छोड़ दें क्या?”.
एक सफेद वर्दी वाले महोदय के अनुसार कॉरपोरेट जगत की महिलाएं दुनिया का ताम-झाम नहीं जानती. ऑफिस देर होने के चक्कर मे यदि वे रेड लाइट गलती से क्रॉस हो जाएं तो सामने सफेद वर्दी वाला देख कर स्वयं ही रुक जाती हैं. चालान की व्याख्या किए जाने पर पूरा फाइन देने को तैयार हो जाती हैं. यदि कैश पूरा न हो तो आसपास एटीएम भी पूछती हैं. महोदय ऐसी मासूमियत देखकर दुनिया की व्यवहारिकता आसान शब्दों में समझा देते हैं; “यह काम तो सिर्फ 100 रुपये देकर भी हो सकता है”.
आफिस समय से पहुंचकर नियमित एक घंटे वाशरूम में मेकअप में गुजारने के अलावा तीनों लेवल पर कई अन्य बातें भी कॉमन हैं. इनमें से एक है, ऑफिस के साथ साथ घर भी को उचित समय देना. काम मेहनत से सिर्फ इसलिए नहीं करना क्योंकि करियर की होड़ है बल्कि हाउस लेडी को बच्चों का भविष्य भी देखना है और पति को सपोर्ट भी करना है. मैनेजर महिला को पिता का मान बढ़ाना है, माँ को हर त्योहार पर साड़ी ले जाना है और अपना करियर प्रोस्पेक्ट भी चमकाना है. सीईओ को अपना पैकेज और पर्क और मोटा ही नहीं करना बल्कि आने वाली पीढ़ी का प्रेरणा स्रोत भी बनना है.
लेखिका: अंकिता सिंह (@MissSingh16)
Pic Credit (The Seattle Times)

1 Comment
मंज़िलें एवं मुकाम और भी हैं, फेमिनिज्म के सिवा जहाँ और भी है…सही lines हैं बिलकुल !! फिर सबकी अपनी अपनी जिंदगी और अपना अलग ही रायता हैं … खुद का पाप खुद को ही मिटाना होता हैं!! … अच्छी लिखी हैं … लिखते रहिये !!