भाजपा के हार की समीक्षा…


भाजपा की हार हो चुकी है. हार की समीक्षा होनी चाहिए. आइए, समीक्षा करते हैं. इस चुनाव में सबसे बड़ी बात यह रही कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल की सत्ता विरोधी लहर के बावजूद ऐसे दावे किए गए कि BJP यह चुनाव जीत रही है. नतीजों ने भाजपा समर्थकों को निराश किया. इस चुनाव में जो ध्यान देने वाली बात यह रही कि राहुल गाँधी के नेतृत्व में तीनों राज्यों में ही कांग्रेस ने भाजपा को पछाड़ दिया. मध्य प्रदेश में तो कांटे की टक्कर थी और यहाँ रात 8 बजे के बाद तक काउंटिंग चलती रही.

राजस्थान में वसुंधरा के खिलाफ बेहद प्रचंड लहर के बावजूद कांग्रेस को जीतने में नाकों चने चबाने पड़े हैं. यह बहुत कुछ कहता है. राजस्थान सबसे बड़ा सन्देश यह देता है कि वहाँ वसुंधरा राजे के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के बाद भी लोग कांग्रेस को वोट देने को तैयार नहीं हैं. भ्रष्टाचार में उनका पुराना रिकॉर्ड अभी भी लोगों के दिमाग से उतरा नहीं है. यही बात मध्य प्रदेश में भी देखने को मिली जहाँ 15 साल की सत्ता विरोधी लहर थी. इसके बाद भी राहुल गाँधी ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट को एक साथ लाकर युवा शक्ति और अनुभव का मिश्रण किया जो वह पिछले कुछ चुनावों से नहीं कर रहे थे. जैसी स्थिति दिखाई दे रही है, यह राहुल के लिए और कांग्रेस के भविष्य के लिए अच्छी बात है. लोगों के बीच मोदी की नीतियों को ले कर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं. कांग्रेस की यही नीति होगी कि इन राज्यों के चुनावों की हार को मोदी की हार बताएं. वैसे यह भाजपा के रणनीतिकारों के लिए एक हार ही है. इसको जितनी जल्दी स्वीकार करें, उतना बेहतर होगा.

मध्य प्रदेश की बात करें तो सबसे बड़ा कारण वहां पर SC/ST एक्ट के खिलाफ सवर्णों का गुस्सा रहा. इसमें बहुत सी फ़र्ज़ी खबरों ने भी काफी काम किया. इसके बाद भी शिवराज सिंह चौहान मैदान में बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बेहतर स्थिति में नज़र आते हैं. इसका एक कारण यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिवराज के कार्य नज़र आते हैं.\n साथ ही GST और नोटबन्दी के बाद व्यापारियों को हुई असुविधा भी नज़र आती है. यह भाजपा के लिए चिंताजनक है कि भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों से ही सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है. शिवराज सिंह चौहान ने बाकी मुख्य मंत्रियों से बेहतर काम दिखाया है लेकिन यहां भाजपा ने ही भाजपा को हराने वाला कार्य किया है. अधिकतर विधायक केंद्र और राज्य की सरकार के कार्यों को अपने क्षेत्रों में नहीं ले जा पाए और यह भाजपा के पिछड़ने का एक बड़ा कारण रहा.

छत्तीसगढ़ में पार्टी का इतनी बुरी तरह से हारना बता गया कि जनता आपके कार्यों को ही सराहेगी. अहंकार और कुछ मंत्रियोंका हठ भी इसमें घी डालने का कार्य कर गया. सामने नेतृत्व और चेहरे के न होने का जो अहंकार अधिकतर विधायकों में दिखा. वही कांग्रेस की जीत में सबसे बड़ा योगदान था. रमन सिंह के राज में विधायकों की अपने क्षेत्र में उदासीनता दिखाना जनता के क्रोध का एक कारण बना दिखाई देता है.

इन तीनों ही राज्यों में हिंदुत्व की धार कुंद नज़र आई. हिंदुत्व के मुद्दे से बड़ा मुद्दा सत्ता विरोधी लहर नज़र आई. इसमें भी सबसे बड़ी बात यह नज़र आई कि राहुल गाँधी को अनायास निशाना बनाना भाजपा के नेताओं को महँगा पड़ा. ध्यान देने वाली बात यह रही कि राहुल गांधी ने खुद के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले शब्द ‘पप्पू’ का बेहतर उपयोग किया और अपने लिए एक सहानुभूति बटोरी. यह राहुल गाँधी का एक राजनैतिक रूप है जो शायद अशोक गहलोत और कमलनाथ जैसे अनुभवी नेताओं के साथ रह कर उभरा. इन सब के बाद भी राहुल गाँधी एक नेता के तौर पर उतने परिपक्व नज़र नहीं आते हैं. अपने ही नेता कुंभाराम कानाम भूल कुंभकर्ण बोलना इसका एक उदाहरण है.

नरेंद्र मोदी की ब्रांड वैल्यू में यह एक बड़ा झटका है. कोई नहीं इनकार कर सकता है कि नरेंद्र मोदी के ज़मीन पर उतरने के बाद भी बड़ी हार टाली न जा सकी.  राजस्थान की स्थितियों को एक बार फिर से देख लेना चाहिए. 20-25 सीटों तक एग्जिट पोल्स में आती हुई भाजपा 73 सीटों तक पहुंच गई. यह मोदी की ब्रांड वैल्यूका नतीजा कुछ समर्थको द्वारा बताया जा रहा है. लेकिन इससे कौन इनकार कर सकता है कि यदि इतनी ही ब्रांड वैल्यू है तो जीत क्यों नहीं मिली? अमित शाह का चुनावी प्रबंधन भी इसमें काम नहीं आया. भाजपा की हार हुई लेकिन एक सम्मान जनक स्थिति में हारना हमेशा बेहतर विकल्प होता है. अब यह भाजपा के सुस्त कैडर को चुस्त करेगा जो यह समझते थे कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कुछ न कुछ तो कर ही लेगा.

यह एक बड़ी बात हो सकती है कि जब मोदी अपने लिए वोट मांगेंगे तो असर पड़ेगा, परंतु एक सत्ता विरोधी लहर तो ज़मीन पर फिर भी दिखाई देगी. उससे कैसे निपटेंगे? अब आप यह सोचें कि जब नरेंद्र मोदी अपने लिए वोट मांगने जाएंगे तो जनता किस तरफ वोट डालेगी. यह आपके विवेक पर निर्भर करता है. यह एक सच्चाई है कि 2014 से अभी तक हुए चुनावों में नरेंद्र मोदी हर राज्य में एक निर्णायक नाम रहे हैं, लेकिन क्या उन राज्यों के मुख्य मंत्रियों की करनी मोदी की ब्रांड वैल्यू परअसर नहीं डालेगी? भाजपा को रणनीतियों में कुछ बदलाव करने ही होंगे.

Shares


अब यह जीत कांग्रेस के अंदर नई जान फूंकेगी, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. भाजपा को अब सूक्ष्म तरीके से इसका विश्लेषण करना होगा. एक हारी हुई भाजपा जीती हुई भाजपा से ज़्यादा खतरनाक होती है. बिहार के बाद उत्तर प्रदेश चुनावों ने सब कुछ बदल कर रख दिया था. अब यह तीन राज्यों के नतीजे अमित शाह एंड कंपनी को 2019 के लिए एक ठोस रणनीति तैयार करने को मजबूर करेंगे. अहंकार और तिरस्कार वाली राजनीति पर पोषित नेताओं को पहचानना भी आवश्यक होगा.


Pic source: (Indian Express)