पानीपत से ठीक पहले..

  

दत्ताजी सिंधिया को पेशवा बालाजी बाजीराव ‘ईश्वरचा सिपाही’ कहते थे. एक ऐसा योद्धा जो देवताओं की तरह लड़ता था और शत्रु दल पर दावानल बनकर टूट पड़ता था.

रघुनाथ राव ने भगवा ध्वज अटक के किले पर लहरा दिया था और 1758 में पुणे लौट गए थे. अब पंजाब और दिल्ली के सुरक्षा का दायित्व 35 वर्ष के दत्ताजी राव सिंधिया पर था. पानीपत के तृतीय युद्ध की पूर्वकथा लिखी जा रही थी.  रघुनाथ राव ने पुणे लौटने के पहले दत्ताजी सिंधिया से वचन लिया था कि वे हर कीमत पर दिल्ली की रक्षा करेंगे.


दत्ताजी के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उत्तर में उस समय मराठों का कोई मित्र या सहयोगी न था और उनकी सेना भी छोटी थी. लेकिन ‘इस्लाम की रक्षा’ के लिए आततायी डकैतों की सेना लेकर जब अब्दाली चला तो रोहिलखण्ड (पश्चिमी उत्तरप्रदेश) का नवाब उसके साथ हो लिया. अब्दाली को स्थानीय समर्थन की कमी न थी. अब्दाली की सेना सिंधिया की सेना से 10 गुणी बड़ी थी. ऐसे में दत्ताजी ने पंजाब से पीछे हटकर दिल्ली को बचाना आवश्यक समझा.

यमुना नदी के बुराड़ी घाट पर जो तब दिल्ली के बाहर हुआ करता था, सिंधिया सेना ने पड़ाव डाल दिया. अहमद शाह अब्दाली के पास यमुना नदी को पार करने की तरकीब न थी. लेकिन नजीब के खेमे में ऐसे लोग थे. रातों-रात अब्दाली ने यमुना पार किया और ब्रह्म मुहूर्त में ही मराठा सेना पर हमला कर दिया. यह 10 जनवरी, 1760 का दिन था. युद्ध मे पराजय निश्चित था. शत्रु की सेना 10 गुणी बड़ी थी और फिर मराठा सेना तो अभी तैयार भी न थी. लेकिन दत्ताजी सिंधिया जान देकर भी दिल्ली की रक्षा के लिए वचनबद्ध थे.


महाकाल के भक्त दत्ताजी में जैसे स्वयं महाकाल ही प्रवेश कर गए थे, भयंकर युद्ध हुआ. दत्ताजी राव का अश्व जिस दिशा में घुमा, उस दिशा से आततायी आक्रांता साफ हो गए. अफ़ग़ान लुटेरों को भारी क्षति उठानी पड़ी, लेकिन कबतक? शत्रु सेना लगातार दत्ताजी को ही निशाना बना रही थी और एक साथ कई गोलियाँ उनके सीने में उतार दी गई. दत्ताजी राव अश्व से गिर पड़े. सेनापति के गिरते ही युद्ध समाप्त हो गया. रोहिलखण्ड के सरदार नजीबुद्दौला ने दत्ताजी राव के सीने पर तलवार रखकर पूछा; क्यों पटेल…….और लड़ोगे?


ईश्वर के सिपाही, धर्म धुरंधर दत्ताजी ने उत्तर दिया – हाँ. जियेंगे तो और लड़ेंगे. नजीबुद्दौला ने घायल दत्ताजी का सर धड़ से अलग कर दिया.


हाँ! जियेंगे तो और लड़ेंगे – दत्ताजी के ये अंतिम शब्द मराठा सेना के लिये आने वाले अफ़ग़ान-मराठा संघर्ष मे वन्दे मातरम जैसा मन्त्र बन गया. इस हत्या के साथ ही पानीपत के युद्ध की पूर्वकथा समाप्त हो गई और तय हुआ कि हिन्दू धर्मध्वजा के वाहक मराठे और इस्लाम के रक्षक अफ़ग़ान अब शीघ्र ही भिड़ेंगे. इसके बाद जो हुआ वह 18वीं शताब्दी का सबसे भयंकर युद्ध था जिसे हम पानीपत तृतीय के नाम से जानते हैं.

 
जाने क्यों, मुझे आज पानीपत चतुर्थ की आहट सुनाई दे रही है.

 

आप भी सुन पा रहे हैं न?….

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1 Comment

  1. Vignesh
    December 11, 2018 - 9:05 am

    प्रेरणादायक

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