आतंकवाद को लेकर लगातार बहस होती रही है. क्या आतंकवाद का कारण विकसित देशों का शोषण है? क्या आतंकवाद किसी सभ्यता के खिलाफ है? क्या आतंकवाद सभ्यताओं का टकराव के कारण हैं? या फिर आतंकवाद किसी धर्म से प्रेरित है या कोई धर्म अपने प्रचार प्रसार के लिए दुनिया को डराने के लिए आतंतवाद का सहारा लेता है?
इस बहस को ईमानदारी से आगे कभी नही बढाया गया बल्कि यू कहें कि अलग अलग समय में अलग अलग जगहों पर आतंकवाद को अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर परिभाषित किया गया.
अमरिका ने आतंकवाद का जब तक सामना नही किया था, तब तक वह भारत सहित तमाम देशों को यही प्रवचन देता था कि यह स्थानीय कानून व्यवस्था की समस्या है. 9/11 की घटना के पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान के आईएसआई प्रमुख हमीद गुल के साथ मिलकर पूरे अफगानिस्तान में सोवियत यूनिन के खिलाफ सीधी लडाई न लडकर तालिबान नाम से जाने जाने वाली एक मुजाहीदीनो यानि मज़हबी लड़ाको की एक पूरी फौज ही खडी कर दी.
मुझे याद है उस वक्त पाकिस्तान के मुल्ला और मौलवी आईएसआई के इशारे पर बडे बडे जलसो मे अमरीका के हक में मजहबी किताबो की आड़ लेकर जुमे की नमाज के बाद दिए जाने वाले खुतबे में कहा करते थे. “हमें एहले किताब के साथ खडा होना चाहिए या दहरिया – काफिर सुर्ख झंडे के साथ”, और वहा खडी नमाजियो की भीड एक ही आवाज मे कहती थी- ‘नार-ऐ- तक़बी अल्लाह हो अकबर’.
अमरिका ने मजहब के नाम से बनी इस भीड का अपने मकसद के लिए जमकर इस्तमाल किया और काम निकल जाने के बाद मुजाहिदिनो को मरने के लिए छोड दिया. लेकिन कुछ समय बाद उसी मुजाहिदीन सोच ने जब पलटकर अमरिकी घमंड की उचाईयाँ छूने वाले ट्वीन टावर को धूल मे मिला दिया तो दुनिया भर मे लोकतंत्र की दुहाई देने वाले अमरिका ने दुनिया की हर अदालत और मानव अधिकार संस्थाओ,
अंतराष्ट्रीय मंचो को धत्ता बताते हुए बार इस हमले को इस्लामिक आतंकवाद का न सिर्फ नाम दिया बल्कि बिना वक्त गवाए इस आतंकवाद का काम तमाम करने के लिए एक के बाद एक कई देशो पर ताबडडतोड़ हमले कर दिए. अब अमेरिका का अपना दर्द संसार का दर्द हो गया.
जानकार इस थ्योरी से बहुत कम सहमत है और ऐसा सोचने के कारण भी हैं. भारत में आतंकवाद की चर्चा वैसे ही होती है जैसे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिक्ता पर हमें सुनने और देखने को मिलती है. और यहीं से शुरु होती है हिन्दु और मुसलमान की सियासत. दोनो ही पक्ष इस मुद्दे पर जो कहते है, वो करते नही हैं और जो करते हैं, वो कहते नही हैं.
सतही बातें करने में दोनो खूब गाल बजाते हैं. भारत की मिट्टी कभी सैक्यूलर शब्द की मोहताज कभी नही रही लेकिन लोकतंत्र के अंक गणित ने भारतीय राजनीति को सैक्यूलरिज्म का बंधक बना दिया. कश्मीर में भारत के खिलाफ लडी जा रही जंग को धार देने के लिए इस्लाम से प्रेरणा लिया जा रहा है.
कश्मीर में भारत विरोध की आड़ में हिन्दुओ के खिलाफ नफरत का जहर गली गली, सडक सडक फैलाया जा रहा है. इसे देखने और समझने के लिए चंद नारे जो खुले आम मज्जिदो से लगाए जा रहे है उनकी बानगी देखिए:
’कश्मीर में अगर रहना होगा, अल्लाह हो अकबर कहना होगा’’
’इस्लाम हमारा मक्सद है, कुरान हमारा दस्तूर, जिहाद हमारा रास्ता है’’
‘’हम क्या चाहते हैं निजाम-ए- मुस्तफा’’
‘’ला शिर्किया, ला शिर्किया, इस्लामिया इस्लामिया’’
’दिल में रखो अल्लाह का खौफ, हाथ में रखो क्लाशिनिकोव’’
‘’मुसलमान जागो काफिर भगाओ’’
इस आतंकवाद को धर्मनिरपेक्ष कहेंगे या साम्प्रदायिक. लेकिन वर्षों से कश्मीर की हर सरकार धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर बनती है, कश्मीरियत की दुहाई दी जाती है, सूफी इस्लाम की शहनाई बजती है लेकिन हम एक राष्ट्र की रिट को चुनौती देने वालो को कभी भटके हुए, कभी भूले हुए, कभी सताए हुए, कभी बेरोजगारी की आड़ में तो कभी अन्याय की चीख के तमाम जज़बाती अल्फाज़ो से असल इरादों को ढकने की कोशिश करते रहे हैं.
अब इस तरफ ध्यान देने की बात है कि दुनिया भर से लेकर भारत पाकिस्तान बांग्लादेश मे परचम लहराने वाले तंज़िमों के नाम क्या हैं और इसकी प्रेरणा इस्लाम है या कुरान या फिर मज्जिद का मौलवी या फिर मदरसों का मौलाना.
‘जैश-ए- मौहम्मद’ अर्थात मौहम्मद की फौज, ‘हरकत-उल- मुज्जाहिदीन’, ‘हरकत-उल- अंसार’, ‘हिज़बुल मुज्जाहिदीन’, अर्थात अल्लाह के लडाको की पार्टी. लश्कर-ए- तयब्बा यानि पाक लोगो की फौज, अल-उम्माह अर्थात अल्लाह के लोग. अलकायदा को 1990 में ओसामा बिन लादिन ने बनाया और कुरान, शरिया, हदीस का हवाला देते हुए एक मज्जिद से अमरीका विरोधी फतवें जारी किए.
फतवें में कहा गया दुनिया के मुसलमानों अमरिका और इज़राइल के खिलाफ हथियार उठाओ कुरान इसकी इजाज़त देता हैं कि यहूदियो और यजिदियो को मारना अल्लाह की ख्वाइश को पूरा करना हैं. दूसरे फतवें मे कहा कि तुम्हे जहां भी अमरिकी और इज़राईली नागरिक मिलें उनका कत्ल कर दो ये तुम पर फर्ज आयत हैं.
आखिर ये क्या बात है कि दुनिया के किसी भी कोने में आतंकवादी संगठन हो वो इस्लाम अपने दिल में और कुरान अपने हाथ में लेकर ही कत्ल-ओ-गारत करता है. नाईजीरिया और कैमरुन में ‘बोको हराम’ नाम का इस्लामिक संगठन अब तक आठ हजार से ज्यादा लोगो की सरे आम हत्या कर चुका हैं.
आखिर ये कौन सी प्रेरणा है जो मज़हब पूछ पूछ कर मासूम लोगो की हत्या करने को अपना फर्ज बताता हैं. और ये कौन सी धर्मनिर्पेक्षता है जो केरल में आतंकवादी मदनी को बेल दिलाने के लिए राज्य विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाने पर हमारे मार्क्सवादियो की फिरकापरस्ती के खिलाफ उठने वाली आवाज़ सुनाई नही देती और सात साल से बिना किसी चार्जशीट के जेल में बंद साधवी प्रज्ञा ठाकुर पर सवाल खडा करना साम्प्रदायिकता हो जाती हैं.
