इन चुनावों में हमने वो रंग भी देख लिया जब देश के पूर्व सेनाध्यक्षों और सैनिकों पर भी राजनीति की जा रही है. देश में सेना के शौर्य पर कभी इंदिरा गांधी दुर्गा बन जाती हैं तो कभी मोदी छप्पन इंची सीने वाले प्रधानमंत्री, लेकिन हमेशा एक महीन लकीर सेना और राजनीति के बीच रही है जो सेना को राजनीति से अलग करती है. आज उस लकीर को भी मिटाया गया.
खबर आई है कि देश के पूर्व सेनाध्यक्षों और सैनिकों ने राजनीति में सैनिकों और सेना के राजनीतिकरण को ले कर राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी है.
उनका कहना है कि राजनीति में सेना का इस्तेमाल सेना के मनोबल को तोड़ता है. उनके शौर्य को राजनेताओं द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी ख़बर को देखकर विपक्षी पार्टियों को कहने का मौका मिल गया. कांग्रेस का कहना है कि देश की सेना के जवान अब मोदी के खिलाफ खड़े हैं. यही मोदी की हार का कारण बनेगा.
लेकिन सेना के शौर्य पर पकाई जा रही चुनावी खिचड़ी उस समय फीकी पड़ गयी जब उस चिट्ठी में एक नाम ने उस चिट्ठी पर सवाल उठा दिए. एयर चीफ मार्शल एन सी सूरी ने कहा कि उस चिट्ठी में लिखी बातें उनका मत नहीं है. उनकी बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया.
आश्चर्य वाली बात ये है कि एक एयर चीफ मार्शल का नाम एक चिट्ठी में आता है और उनके विचारों को तोड़ मरोड़कर पेश करने के बाद उन्हें पता चलता है कि गलती हुई है.
इस चिट्ठी के अन्य नामो को भी देखते है. विष्णु भागवत, जो देश के पहले ऐसे चीफ है जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया गया. रामदास, जो आम आदमी पार्टी के नेता हैं. वहीं दीपक कपूर के बारे में कौन नहीं जानता है. दरअसल प्रथम दृष्टया यह एक अजीब स्थिति दर्शाता है.
राष्ट्रपति भवन से भी खबर आई कि ऐसी कोई चिट्ठी उन्हें मिली ही नहीं. यह और भी अधिक गंभीर बात है कि आखिर देश के सैनिकों के नाम पर गलत खबरें क्यों फैलाई जा रही हैं.
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के ट्विटर हैंडल से इसे ट्वीट कर मुद्दा बनाना और अधिक गंभीर है. बिना किसी जानकारी के ऐसे ट्वीट करना कहाँ तक सही है, यह जनता जाने.
विश्व में हमारी सेना एक सबसे अनुभवी और प्रोफेशनल सेना के रूप में जानी जाती है. हमारी सेना के सैनिकों के साथ पूर्व सरकारों में कितना कार्य हुआ है, यह सब जानते हैं लेकिन सेना के नाम पर ऐसी राजनीति कहीं से भी ठीक नहीं है.
देश के प्रधानमंत्री एक चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं. अगर देश की सेना कुछ कार्य करती है तो उनकी जवाबदेही देश के प्रधानमंत्री की होती है. जब देश की सेना सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट जैसे हमले करती है तो उसका गर्व भी देश के प्रधानमंत्री को ही होता है क्योंकि अंत में निर्णय उनका होता है.
यदि उनके नेतृत्व में ऐसा कार्य हुआ है तो विपक्ष को उसकी तारीफ करने में गुरेज नहीं होना चाहिए. लेकिन पर्दे के पीछे ऐसे खेल देश के लिए बहुत घातक होने वाला है. जनता इस पर पैनी नज़र रखे
