एक धक्का और दो, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तोड़ दो!

पाकिस्तान का रुपया डॉलर के मुकाबले 148 रुपये पहुंच गया है. यह पाकिस्तान के घर का मामला है, लेकिन यह हमारे लिए संभावनाओं के द्वार खोल रहा है. कोई कितना भी लिबरल बन ले, लेकिन सच्चाई यही है कि पाकिस्तान का अहित कहीं न कहीं भारत के हित में है.

वैसे भारत ने कभी भी किसी देश का अहित नहीं चाहा है. यह भारत की कुल परंपरा और संस्कृति का हिस्सा नहीं. लेकिन फिर भी, जिस आतंकी और बम धमाकों के दंश भारत ने झेला है, वह पाकिस्तान का ही है.

यह खबर कई मायनों में भारत के लिए खुशखबरी है. इसको ज़रा पाकिस्तानी नागरिकों की ओर से देखते हैं. वैसे खुद को पाकिस्तानी नागरिक सोचना भी बहुत कठिन है, लेकिन फिर भी एक बार कोशिश करते हैं. पाकिस्तान में एक डॉलर की 148 रुपये कीमत उसके व्यापार ही नहीं, बल्कि उसके अन्य मंसूबों पर भी पानी फेरता है. उदाहरण के लिए उसका चीन पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर! 

चीन ने पाकिस्तान पर बोरियां भर-भर के निवेश किया है. पाकिस्तान उसका कर्जदार है. इस कर्ज़ ने पाकिस्तान के युवाओं का भविष्य पहले ही अंधकार में डाला है. दूसरी तरफ एकबार स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के आंकड़ों पर नज़र डालते हैं. इसने 12 महीने पहले पाकिस्तान के रुपये की कीमत एक डॉलर के मुकाबले 111 बताई थी.

अब यही पाकिस्तान के पैसे की कीमत एक डॉलर के मुकाबले 148 बता रहा है यानी 12 महीने में सीधे एक तिहाई का मुद्रा अवमूल्यन!

यह पाकिस्तान के इकॉनॉमिस्ट्स (यदि कोई है तो) के लिए चिंता का विषय है. वहीं पाकिस्तान के अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा देखें तो उनका रेवेन्यू या तो गिर रहा है, या स्थिर है. कर्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा है. ग्रोथ गिर रही है. उद्योग की बेहद खस्ता हालत है. इस हिसाब से देखें तो पता चल जाएगा कि पाकिस्तान आने वाले समय में एक बेहद ही बड़ी मुसीबत में फंसने वाला है. यह महंगाई को भी बढ़ावा दे रहा है.

भारत के लिए यह सुनहरा मौका है. भारत की तरफ से 200% का इम्पोर्ट ड्यूटी भारत में पाकिस्तानी बाजार को एकदम खत्म कर चुका है. दूसरी तरफ भारत के किसानो ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को कुछ भी बेचने से मना कर दिया है. यह उस देश के टमाटर प्रेमियों के लिए बुरी खबर है. 

कुल मिलाकर पाकिस्तान 1991 में भारत की आर्थिक इमरजेंसी से भी बुरी स्थिति में जाने वाला है. भारत ने उस समय अपना बाजार दुनिया के लिए खोला था लेकिन पाकिस्तान तो पहले से ही यह कर चुका है. अब उसके पास घुटने टेकने के अलावा कोई चारा नहीं है. फिर भी वह आतंकवाद का साथ नहीं छोड़ेगा. यह उसके भविष्य के लिए और भी अधिक घातक है.

अब बस समय ही बताएगा कि भारत का एक असफल पड़ोसी इतिहास के पन्नों में कब तक रह पाता है. जैसे ही इसका मूल्य 200 रुपये पहुँचेगा, असली खेल आप तब देखेंगे.