2019-चुनाव के मद्देनज़र ‘असहिष्णुता-लिन्चिस्तान-गिरोह’ की वापसी

करीब 200 से अधिक अज्ञात-प्रख्यात लेखक केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने  एक बयान के साथ आगे आए हैं. कुछ दिन पहले ही, कुछ अज्ञात-प्रख्यात फिल्म निर्माताओं ने भी एक बयान जारी करके लोगों से लोकतंत्र को बचाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता से बाहर करने का आग्रह किया था.

इस सूची में वे नाम शामिल हैं जो अपने रचनात्मक कार्य या लेखन के लिए कमऔर अपनी वामपंथी-विभाजनकारी राजनीति के कारण ज़्यादा परिचित हैं. यह पहली बार नहीं है जब यह प्रयास किया जा रहा है, और यह प्रचार एक स्पष्ट पैटर्न दिखाता है.

यहाँ हमें इन प्रयासों के कालक्रम पर ध्यान देना ज़रूरी है।

श्री नरेंद्र मोदी के भारतीय जनता पार्टी से प्रधान मंत्री के चेहरे के रूप में घोषणा से भी पूर्व, 65 संसद सदस्यों ने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को दिए एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें अमेरिकी प्रशासन से उनके वीजा को अस्वीकार करने का आग्रह किया गया था. लेकिन अफ़सोस, वह असफल रहा. 

भारतीयों ने नरेंद्र मोदी को एक मजबूत जनादेश दिया. 2014 के लोकसभा चुनावों मेंनरेंद्र मोदी की जीत के बारे में सुन कर कांग्रेस के वाम-उदारवादी-तंत्र का अविश्वास मानसिक झटके में तब्दील हो गया. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने लगातार चुनावी जीत दर्ज की, और अबप्रतिक्रियाएं झटके से पागलपन की ओर बढ़ने लगीं. फिर दिल्ली इलेक्शन आया. कुछ किया जाना था.

क्या आपको फ़र्ज़ी “चर्च अंडर अटैक” की कहानी याद हैं? बिना किसी संदेह के, यह भारतीय मीडिया द्वारा फैलाया गया 2015 का सबसे बड़ा झूठ था. इस बड़े आख्यान को छोटे-छोटे झूठों का समर्थनप्राप्त था जिसने उसके पीछे के तर्क और सत्य को दबाने में मदद की. ये वे ही सेलेक्टिविस्ट लोग थे, जिन्होंने अपने कई उद्धरणों और साक्षात्कारों के साथ इस कथा को फेंटा और फिर इसके ग़लतउजागर होने के बाद कभी माफी नहीं मांगी. इसके बाद “चर्च हमले” की एक पूर्ण-प्रतिकृति के रूप में, दादरी में तांडव मच गया, जिसका उद्देश्य बिहार चुनाव के लिए पिच तैयार करना था.

ये तथाकथित बुद्धिजीवी और उदारवादी ठग सिर्फ़ आत्म-प्रचार और इनाम के लिए, तथ्य को काटते-छाँटते रहते हैं. यह शायद ही उनके लिए मायने रखता है कि कौन अपराधी है और कौन पीड़ित, क्यूंकीउनका अपना अस्तित्व ही दांव पर लगा होता है.

मार्च 2016 में एक रिपोर्ट आई कि एक नहीं, मोदी सरकार ने सरकारी आवासों पर से 1531 अवैध कब्जे हटाए. अब तो असहिष्णुता का उदय होना ही था और वैसा हुआ भी. तकरीबन उसी समय‘अवॉर्ड-वापसी-गैंग’ उभर कर जनता के सामने आई और बढ़ती असहिष्णुता का हाय-तौबा मचाने लगी.  

ये वही कांग्रेसी इकोसिस्टम के वामपंथी-उदारवादी लोग थे जो आज भी कभी बुद्धिजीवी, कभीलेखक, कभी फिल्मकार के नाम पे नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बयान दे रहे हैं. लेकिन इनकी फ़ज़ीहत भी खूब हुई. कई जाने-माने लेखकों, वैज्ञानिकों, फिल्मकारों, और कलाकारों ने खुलकर इस‘अवॉर्ड-वापसी-गैंग’ का विरोध किया.

दुर्भाग्य ऐसा की देश की जनता ने भी इस ‘बढ़ती-असहिष्णुता’ के खेल को बखूबी समझा और सिरे से नकार दिया. इसके साथ दुर्भाग्य और की भारतीय जनता पार्टीकी एक राज्य से दूसरे राज्य में बढ़ती लोकप्रियता थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।

तब शुरू हुआ “लिन्चिस्तान” का खेल. आपको ‘मोहम्मद अख़लाक़’ नाम ज़रूर याद होगा, जो बछड़े को चुराने की परिस्थिति में मारा गया, को इस कांग्रेसी-तंत्र द्वारा भारत में असहिष्णुता का चेहरा बनादिया गया था. लेकिन तेलंगाना में सुबह एक आरती करने के लिए एक इमाम द्वारा मारे गए एक मंदिर के पुजारी को मीडिया में या इन फ़र्ज़ी-विद्वानों के बीच कोई हमदर्द नहीं मिला.

अख़लाक़ कीहत्या जैसे जघन्य कृत्यों का न तो कोई औचित्य है ना ही कोई सफाई. हालांकि कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि भीड़ की हिंसा प्रशासनिक विफलता और कमजोर कानून प्रवर्तन काएक प्रमाण है लेकिन इसकी चिंता इन पत्रकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा सिर्फ़ इस तरह की घटना में मात्र जाति या धर्म के बीच भेद करने के अजेंडे को बढ़ावा देने के लिए तत्पर ही रहती है.

ठीक उसी तरह राजस्थान के राजसमंद जिले में एक मुस्लिम मजदूर को आरोपी शंभुलाल रेगर द्वारा “लव जिहाद” करने के लिए जिंदा जला दिए जाने के भयानक अपराध को भी “लिन्चिस्तान नरेटिव”को तूल देने के लिए खूब उछाला गया था.

अपराध, अपराध है जिसे राज्य की मशीनरी को निपटना चाहिए. लेकिन इस कांग्रेसी लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड ने वास्तविक कानून और व्यवस्था के मुद्दे को कमजोर करते हुए, इसे एक राजनीतिक स्पिनदेकर, पूरे देश को ही “लिन्चिस्तान” के नाम से पेंट कर दिया.

यहां किसी को जिंदा जलाने जैसे जघन्य अपराध की गंभीरता को कम किए बिना, एकमात्र बिंदु इन पेशेवर ठगों के एजेंडों को उजागर करना है.

बंगाल में कई स्थानों पर भयानक भीड़ ने हिंसा की, परंतु मीडिया ज्यादातर शांत रही. सर्वव्यापी असहिष्णुता सेलेक्टिविस्ट्स अप्रभावित रहे. केरल में हुई लिंचिंग पर असहिष्णुता रेंगी भी नहीं. ठीक उसीदिन जिस दिन बंगाल में कांग्रेस के कार्यकर्ता थियेटर में घुस तोड़ फोड़ करते हैं और “एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर” फिल्म की स्क्रीनिंग को बाधित करते हैं, उसी दिन उनके नेता राहुल गांधी इन्हींबुद्धिजीवियों के बीच भारत में बढ़ती असहिष्णुता की बात करते हैं.

बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ कांग्रेस का मार्च उतना ही फर्जी है जितना कि उनका ‘गांधी’ उपनाम! 

ये तो बिल्कुल साफ है की यदि कोई एक धार्मिक कट्टरवाद की निंदा में सक्रिय है, और अन्य धार्मिक कट्टरवाद की बर्बरता पर पूरी तरह से चुप है, तो वह एक ढोंगी है. ये बुद्धिजीवियों के भेष में घूमतेठग सोचते हैं कि वे सभी लोगों को हर समय बेवकूफ बना सकते हैं.

अफ़सोस की बात की ये “लिन्चिस्तान” नरेटिव भी फेल हो गया, और अब 2019 का चुनाव सर पर है.

आगामी चुनाव ने अपने राजनीतिक संरक्षक के इशारे पर “धारणा-बाज़ार” चलाने वाले इन ठगों को बहुत परेशान कर दिया है, और यही कारण है कि वे फिर एक बार अपनी ओछी हरकतों में लिप्त हैं.यदि इनके राजनीतिक संरक्षक इस बार सत्ता में नहीं आए तो इनकी विलुप्त होती ‘धारणा-बाज़ार’ का क्या होगा? इसलिए यह गिरोह फिर वापस आ गया है. इन्हें लगता है कि इनके हस्ताक्षर-अभियानसे पृथ्वी हिल जाएगी और इनके मसीहा, इनके राजनीतिक संरक्षक फिर से सत्ता में आ जाएँगे.

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के इरादों के बारे में झूठी जानकारी फैलाना, फासिस्ट कहना, जब चुनी हुई सरकार की उपलब्धियों या विफलताओं पर चर्चा करनी चाहिए, तो जनता को ये बताना की ये दलितों-अल्पसंख्यकों के खिलाफ कितने बुरे थे. इनका ये गंदा खेल फिर चालू है. इन पेशेवर रुदालियों की कोई विचारधारा नहीं है, बल्कि केवल एजेंडा है.

इनकी चिंताएं फ़र्ज़ी हैं, सिर्फ़ एजेंडा वास्तविक है. यदिहम इनके इस ख़तरनाक खेल को भली-भाँति नहीं समझते हैं तो यह हमारा सामूहिक अपराध जैसा है. हालाँकि, आज राष्ट्र देख रहा है, देशवासी सतर्क हैं और उचित समय भी आ गया है जब वे इसका जवाब देंगे!