ऐसा प्रतीत होता है जैसे राहुल गांधी न्यूनतम आय गारंटी के साथ भारत को वेनेजुएला जैसी आपदा बनाना चाहते हैं. 5 करोड़ परिवारों के लिए कांग्रेस अध्यक्ष के प्रस्तावित 72,000 वाली बड़ी खैरात अर्थव्यवस्था पर कहर बरपाएंगे. आइये ज़रा देखते हैं कि कैसे मोदी की योजनाएं पहले से ही गरीबों को मजबूत कर रही हैं.
न्यूनतम आय गारंटी (MIG) बुनियादी आय है जिसे सरकार गरीबों को गारंटी के तौर पर देती है ताकि उन्हें एक निश्चित पूर्व-निर्धारित वित्तीय सीमा में लाया जा सके.
अब मान लीजिए कि सरकार एक सीमा तय करती है कि प्रत्येक परिवार को प्रति माह कम से कम 12,000 रुपये कमाने चाहिए और वर्तमान में जिनकी आय 5,000 रुपये प्रति माह है, सरकार उन्हें 12,000 रुपये तक लाने के लिए प्रति माह 7,000 रुपये का भुगतान करेगी. यदि वे कुछ भी नहीं कमाते हैं, तो सरकार पूरे 12,000 रुपये का भुगतान करेगी.
क्या भारत में कभी ऐसी भव्य प्लानिंग की गई है?
इसको समझने के लिए आप मध्य प्रदेश में किए गए एक पायलट प्रोजेक्ट के बारे में विवरण देख सकते हैं. मैं संक्षेप में विवरण समझाने की कोशिश करूंगा.
इस पायलट प्रोजेक्ट में लगभग 12 गांवों में 6,000 लोगों को 12 महीने के लिए 200 रुपये का भुगतान किया गया था और उनके बचत और खर्च के पैटर्न का विश्लेषण किया गया था. विशेषज्ञों ने परिणामों की जांच करने के बाद कहा कि यह योजना तभी काम करेगी जब अन्य सभी सब्सिडी हटा दी जाएंगी और सिर्फ इन भुगतानों को रखा जाएगा.
इस तरह के भुगतानों से अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, इस पर एक त्वरित नज़र डालते हैं :
- सब्सिडी हटा दी जाएगी.
- यह देशवासियों द्वारा काम करवाने के लिए एक प्रोत्साहन के तौर पर नहीं देखा जा सकता है.
- यह आय रिसाव (इनकम लीकेज) के लिए एक उपकरण बन सकता है.
- इसके दायरे से बाहर आने वाले समाज के बाकी लोगों को ऐसा लगेगा जैसे उन्हें अर्थव्यवस्था में अकेले छोड़ दिया गया है.
- अगर सब्सिडी के अलावा इसे भी साथ रखा जाए तो यह राज्य के वित्त पर भारी लागत है.
- महंगाई की मार अर्थव्यवस्था पर पड़ेगी और बढ़ी हुई आय को भोजन खरीदने में खर्च कर दिया जाएगा. सीधी सी बात है कि अर्थव्यवस्था में अधिक नकदी इसके लिए एक आर्थिक इमरजेंसी के हालात पैदा कर सकते हैं. 1991 इसका उदाहरण है.
- यह बहुत ही महंगी योजना है.
इस तरह की योजना को लागू करना विनाशकारी होगा…
राहुल गांधी ने क्या वादा किया है?
राहुल गांधी 72,000 रुपये प्रति वर्ष के साथ देश के 20% गरीब परिवारों के लिए एमआईजी सुनिश्चित करना चाहते हैं. आइए हम कुछ संख्याओं पर ध्यान दें.
हमारी आबादी लगभग 130 करोड़ है और जनगणना के अनुसार औसतन हमारे परिवार में लगभग 4.8 सदस्य हैं. इसलिए, भारत के 20% सबसे गरीब परिवारों का हिसाब लगभग 5 करोड़ घर बनते है. इन परिवारों में से प्रत्येक को 72,000 रुपये प्रति वर्ष का खर्च मतलब कुल 3.6 लाख करोड़ रुपये बनता है. हम यह मानकर चल रहे है कि ये सभी परिवार शून्य आय अर्जित करते हैं. तो इस बड़ी योजना को फंड कौन देगा?
हमारे पास राहुल गांधी का वादा है कि वह जीएसटी और कॉर्पोरेट करों को कम करेंगे. इससे पहले, यूपीए सरकार ने सब्सिडी बढ़ाई थी. वह शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर जीडीपी का 6% खर्च करना चाहते हैं.
MIG के इस नए अतार्किकवाद से हमें जीडीपी का 2% और साल भर के लिए पूरे बजट का 10% खर्च करना होगा. तो फिर मासिक उतार-चढ़ाव आय का ट्रैक रखने वाला कौन है? मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी इसके लिए स्वेच्छा से काम करेंगे.
यह सब सिर्फ इसलिए किया जा रहा क्योंकि वह चुनाव जीतना चाहते हैं. यह सब इसलिए कि वह और उनका परिवार सत्ता से दूर रहने के आदी नहीं हैं. यह सब इसलिए क्योंकि राहुल गांधी को भविष्य की कोई चिंता नहीं है.
अगर देश का घाटा बढ़ता है तो क्या होगा? तो राहुल गांधी के इस अतार्किक प्रस्ताव के ऊपर उँगली कौन उठाएगा? दरअसल इस देश का मेहनती करदाता उनसे प्रश्न पूछेगा और इस प्रस्ताव को रोकेगा क्योंकि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने को आतुर हैं.
तो इस देश के भीतर गरीब से गरीब व्यक्ति के लिए क्या किया गया है?
नरेंद्र मोदी सरकार ने हमेशा अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के इरादे से काम किया है. इस देश के गरीबों को मुफ्त की खैरात और धोखाधड़ी वाली योजनाओं की आवश्यकता नहीं है. उन्हें पीएम किसान सम्मान निधि योजना, पीएम सुरक्षा बीमा योजना, पीएम श्रम योगी मंधान योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला, सौभाग्या, शिक्षा उद्योग और स्किल इंडिया जैसे समर्थकों की आवश्यकता है।
जैसा कि अरुण जेटली ने ट्वीट किया, राहुल ने जो वादा किया है, मोदी सरकार पहले ही उससे बहुत कुछ ज़्यादा दे रही है :
यदि आप इन योजनाओं को प्रति परिवार के मूल्य से जोड़ते हैं, तो इसका मूल्य 72,000 रुपये प्रति वर्ष से बहुत अधिक है. यह गरीब से गरीब व्यक्ति के लिए एक धोखाधड़ी वाला कदम होगा यदि उनसे यह योजनाएं छीन लिए जाते हैं. और यदि इन सभी योजनाओं को रखते हुए राहुल गांधी की इस ‘अति महत्वकांक्षी’ योजना को भी रखा जाता है और दोनों को दिया जाता है, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए एक संकट पैदा करेगा.
कोई एक दिन के लिए कोई आर्थिक लाभ देकर व्यक्ति को फुसला तो सकता है, लेकिन यदि वह यह समझता है कि इससे हमेशा की समस्याएं खत्म हो जाएंगी तो वह लोगों को भी भ्रमित कर रहा है, और खुद भी भ्रमित है. नरेंद्र मोदी सरकार जो कर रही है, वह लोगों को यह जानने के लिए सक्षम कर रही है कि आर्थिक लाभ कैसे बनाये जाते हैं. यह ही दीर्घकालिक समाधान हैं. एक आशा है कि लोगों में स्थितियों की एक बेहतर समझ पैदा होगी और लोग ऐसे नकली वादों से भ्रमित नहीं होंगे. हम इस राजनैतिक खैरात से बहुत बेहतर हैं.
दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.
यह लेख मूलतः mynation में छपे आर्टिकल का हिंदी अनुवाद है।
