अमेठी की लड़ाई: राहुल गाँधी के समाने आगे कुआँ पीछे खाई

कल भाजपा की 2019 चुनावो के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी के अमेठी से चुनाव लड़ने की पुष्टि हो गई. लंबे समय से चले आ रहे अटकलों पर पूर्ण विराम लग गया और ये तय हो गया कि इस बार फिर अमेठी के चुनावों में दो दिग्गजों की लड़ाई देखने को मिलेगी. हालांकि इससे राहुल गांधी के लिए बहुत बड़ा धर्मसंकट भी उत्तपन्न हो गया है.

अमेठी सीट गांधी परिवार के लिए सुरक्षित सीट मानी जाती थी. 2009 के चुनावों में राहुल गांधी 4,64,195 वोट लाकर बसपा के आशीष शुक्ला से लगभग पौने तीन लाख वोटों से जीते थे. वोटों का शेयर भी 72% था जो कि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के 14.54% से बहुत ज्यादा था. 2014 चुनावों में जीत का ये मार्जिन घटकर मात्र 1 लाख 7 हज़ार वोटों के करीब रह गया था, वोट शेयर का अंतर जो 2009 में 58% के करीब था, वो घट कर मात्र 12.4 % रह गया.

यहां ये जानना ज़रूरी है कि 2014 चुनावो से मात्र कुछ दिन पहले ही स्मृति की दावेदारी कन्फर्म हुई थी. मात्र कुछ दिनों के हाई वोल्टेज कैंपेन में ही जीत के अंतर को इतना कम कर दिया था. उधर समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव ने एक इंटरव्यू के दौरान ये बात स्पस्ट किया था की चुनावो में सपा ने अमेठी में लगभग एक लाख वोट कांग्रेस को ट्रांसफर किये थे.

ट्रेंड और नतीजों के दौरान शुरुआती रुझानों में स्मृति राहुल गांधी से आगे चल रही थी. एक समय ये लगा कि शायद बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिले. राहुल आखिरकार जीत गए लेकिन उनके अमेठी से चुनावी भविष्य पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लग चुका था.

और हुआ भी वही, 2017 के विधानसभा चुनावो में इस लोक सभा के 5 विधानसभा सीटों (तिलोई, सालों, जगदीशपुर, गौरीगंज और अमेठी) पर कांग्रेस हार गयी. 5 में से 4 सीट जीतकर भाजपा ने अपने इरादे साफ कर दिए, एक सीट जीतकर बसपा अपनी प्रासंगिकता बचाने में सफल रही. 2 विधान सभा सीटों पर तो कांग्रेस दूसरे नम्बर पर भी नही थी. इसके कुछ महीनों बाद हुए नगर पंचायत चुनावों में भी भाजपा ने कांग्रेस को धूल चटा दी थी, कांग्रेस खिसक कर चौथे नम्बर पर जा पहुँची.

वहीं 2014 के चुनावों में हारने के बाद भी स्मृति ईरानी ने अमेठी को नही छोड़ा. वो लगतार वहां का दौरा करती रही, अपने जनाधार में वृद्धि और स्थिति को और मजबूत बनाती रहीं.

अब हालत यह हो चुकी है कि स्मृति अगर अमेठी में है तो राहुल गांधी अपने पहले से तयशुदा कार्यक्रम को रद्द कर देते हैं. राहुल के हालिया दौरे पर उन्हें जनता से काफी विरोध का सामना करना पड़ा था. राजीव गांधी फाउंडेशन के जमीन धोखाधड़ी मामले में तो किसानों से उन्हें “इटली वापस जाओ” तक सुनना पड़ा था. भाजपा में लगातार विरोधी खेमे के लोगो के जुड़ने की खबर सुनने को मिलती है, राहुल के जनाधार खिसकने की. ऐसे में राहुल के लिए बहुत बड़ा धर्मसंकट आन पड़ा हैं.

यदि राहुल केवल अमेठी से चुनाव लड़ते हैं तो हार की किसी भी संभावना के बाद पहले से टूटते-फूटते महागठबंधन में शायद उनकी बची-खुची इज़्ज़त भी जाती रहे. इसके लिए वो चाहें तो 2 जगहों से चुनाव लड़ सकते हैं. लोगो ने छिंदवाड़ा, नांदेड़ और उत्तरी कर्नाटक का सुझाव भी देना शुरू कर दिया है. लेकिन ये और भी बड़ी मुसीबत खड़ी कर देगा. पार्टी और जनता में ये संदेश जाना कि उन्हें अमेठी की जीत पर शंका है, पार्टी कैडर का उत्साह कम करने के लिए काफी होगा. भाजपा इस मौके को भुनाने में कोई कसर नही छोड़ेगी.

राहुल गांधी के लिए आगे कुआं और पीछे खाई की स्थिति बन चुकी है. ऐसे में देखना है कि वो कैसे खुद उबरकर कांग्रेस की नैया पार लगाते हैं.

एक बात तो तय है कि 2019 का चुनाव दिलचस्प होने वाला है, तो आप भी पॉपकॉर्न लेकर बैठ जाइए…



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