जब देश आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहा हैं तो इतनी घटिया राजनीति ज़रूरी हैं?

राष्ट्र की सुरक्षा, अखंडता और अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए आवश्यक है धर्म. किन्तु यह धर्म हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई या अन्य नहीं होना चाहिए. यह धर्म सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र धर्म होना चाहिए. आप किसी भी जाति धर्म संप्रदाय को मानते हों, किसी भी विचारधारा से प्रेरित हों, किन्तु यदि आपके सम्मुख देश का प्रश्न हो, तब सब कुछ भूल कर देश के लिए प्राणों की आहुति भी लगाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

देश के सैनिक रण बाँकुरे हैं, जिन्हें राष्ट्र के अतिरिक्त कुछ भी दिखता ही नहीं. नागरिकों में भी कमोबेश यही जज्बा होना चाहिए, राजनीतिज्ञों में भी. लेकिन इस देश के कुछ लोगों के लिए राजनीति ही पहला धर्म है. क्योंकि देश के चालीस सैनिकों की शहादत पर लोगों की आंखों के आंसू सूखे भी नहीं थे परन्तु यहाँ के नेताओं ने शहादत (सैनिकों की चिताओं) पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया था.

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हमले की टाइमिंग को लेकर प्रश्न उठाए थे. ममता को पुलवामा हमला चुनाव को देखते हुए जान बूझकर कराया गया लगता है. इन्हें एक बार फिर सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत चाहिए. क्या इस तरह की ओछी हरकतें भारत स्वीकार कर पाएगा? नहीं, कभी नहीं.

कल जो हुआ वह और भी शर्मनाक है. यह शर्मनाक हरक़त दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने की है. इसी केजरीवाल ने पिछली बार हुई सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत चाहिए थे. इस बार इन्हें यह लगता है कि जवानों की शहादत के पीछे केंद्र सरकार व भाजपा का हाथ लगता है.

केजरीवाल ने सीधे तौर पर सरकार को लानत भेजते हुए कहा; “कितने जवान शहीद करोगे, कितने जवानों के घर बर्बाद करोगे, कितने परिवार बर्बाद करोगे, कितनी माँ के बच्चे छिनोगे, कितनों को बेवा करोगे 300 सीट लाने के लिए लानत है ऐसी पार्टी पर लानत है.” केजरीवाल की बदजुबानी यहीं नहीं थमीं. उन्होंने आगे पूछा कि क्या इसीलिए तुमने भारत-पाक सीमा पर ये सब करवाया है.

इस देश में आतंकियों की सज़ा रुकवाने के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवाने वाले केजरीवाल को सच्चे लगने लगे हैं. जबकि पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब देने वाले लोग इन्हें बुरे लगते हैं. यह सब और कुछ नहीं बल्कि सत्ता में आने की चाहत है. ये गिरी हरकतें यूँ ही नहीं की जातीं बल्कि इस देश में चर्चा में बने रहने के लिए कुछ न कुछ करते रहने की आदत सी हो गई है कुछ लोगों को.

इन्हें हिंदुस्तान विरोधी नारे लगाने वाले लोग प्रिय लगते हैं, सेना पर पत्थरबाजी करने वाले मासूम. लेकिन यदि यही सैनिक किसी आतंकी को तनिक भी चोट पहुंचाने का प्रयास करे तो इन्हें दर्द होने लगता है. ये उन्हीं लोगों में से हैं जिन्हें इमरान खान प्रिय लगता है किन्तु भारतीय प्रधानमंत्री इन लोगों को फूटी आँख भी नहीं सुहाते हैं.

ये वही हैं जिन्होंने पाकिस्तान की जेल में बंद पैसठ व इकहत्तर के युद्ध बंदियों के विषय में देश में कभी कोई भी चर्चा तक नहीं की. मुमकिन यह भी है कि इन्हें विषय में कोई जानकारी ही न हो. किन्तु आज जबकि 60 घण्टों के अंदर अभिनन्दन की वापसी सुनिश्चित हो गयी है, इसका अभिनन्दन करने के बजाय पाकिस्तान की हमदर्दी का गुणगान कर रहे हैं. कुछ भी हो देश की जनता शायद इन्हें माफ कर दे और आगामी चुनाव में वोट भी दे, लेकिन देश व सैनिकों की आत्मा इन्हें कभी माफ नहीं कर पाएगी.




फोटो क्रेडिट

Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.