एक प्रॉफिट मोटिव वाली इंडस्ट्री को राजनैतिकी रंग देते फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के इंटेलेक्चुअल योद्धा

भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के समर्थकों को जिसका इंतज़ार था, वो उनको आज मिल गया. नरेंद्र मोदी की जीवनी पर बनी फिल्म ‘PM नरेंद्र मोदी’ का ट्रेलर यूट्यूब पर रिलीज कर दिया गया. नोटबंदी और GST की तरह इस फ़िल्म के ट्रेलर को भी आधी रात को रिलीज़ किया गया है.

फ़िल्म में विवेक ओबेरॉय नरेंद्र मोदी के किरदार को निभा रहे हैं. अब कोई चीज़ बाजार में आती है तो उसके समर्थक और विरोधियों के भिन्न मत होना स्वाभाविक है. इस फ़िल्म के बारे में भी यही कहा जा रहा है. कुछ लोगों का कहना है कि यह पूरी तरह से एक प्रोपगंडा मूवी है. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इस फ़िल्म को इलेक्शन कमीशन के नियमो को ताक पर रख कर रिलीज़ किया जाएगा. कुछ परम ज्ञानियों का यह भी मत है कि ये भाजपा का अब तक का सबसे महंगा प्रचार है.

एक लोकतंत्र की यही खूबसूरती होती है कि सभी को अपनी बात रखने की आज़ादी है. कुछ राजनैतिक पार्टियों के ‘यूट्यूब सेलेब’ बने ‘माउथपीस’ इस फ़िल्म की तुलना 1935 में आई फ़िल्म ‘ट्रायम्फ ऑफ द विल’ से कर यह बता रहे हैं कि हिटलर ने भी खुद के ‘ब्रैंड प्रोमोशन’ के लिए ऐसी फिल्म बनाई थी. मतलब दिल्ली में बनी फिल्म को जर्मनी तक पहुंचाया जा रहा है, लेकिन इतनी जहमत नहीं उठाने की सोच रहे कि एकबार जा कर फ़िल्म देख ही आये. कल्पना की उड़ान देखिये साहब! यहां ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ वाली चिड़िया को छेड़ा नहीं जा रहा नहीं तो खेल बिगड़ जाएगा. 

यह समझ से परे है कि एक फ़िल्म को ले कर इतना बवाल क्यों बनाया गया है. जो भी तर्क रखे जा रहे हैं, लगभग सभी अपनी जगह सही हैं, लेकिन एक फ़िल्म को ले कर एक व्यक्ति विशेष को निशाने पर लेना कितना उचित है? यह सही है कि फ़िल्म में कुछ कमियां रह गयी होंगी, क्योंकि कोई भी फ़िल्म परफेक्ट के दायरे में नहीं आती है. विवेक ओबेरॉय मोदी के किरदार को कितना अच्छे से निभा पाए या मोदी के जीवन के कितने रंगों को वो बड़े पर्दे पर उतार पाए हैं, इसके लिए फ़िल्म को देखना पड़ेगा.

बिना फ़िल्म देखे 2:46 मिनट के ट्रेलर से आप उनकी अदाकारी पर कोई निर्णय नहीं सुना सकते हैं. बात रही प्रोपगंडा की तो फ़िल्म जगत एक ही बात जानता है…प्रॉफिट! अगर उसको प्रॉफिट मिल रहा है, तो वो हर उस विषय पर फ़िल्म बनाएगा जिसको कुछ लोग प्रोपगंडा कहते हैं. इस देश में नेहरू, गांधी, इंदिरा पर कई फिल्में बन चुकी हैं. आज यदि प्रॉफिट का नाम मोदी बन चुके हैं और यह बात हम नहीं बल्कि महागठबंधन खुद बता रहा है. इसलिये उनके ऊपर फ़िल्म बना कर प्रॉफिट कमाना फ़िल्म जगत का प्रोपगंडा कैसे हुआ?

वैसे भी बॉलीवुड को हम ‘एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री’ कहते हैं और एक इंडस्ट्री हमेशा प्रॉफिट के लिए काम करती है. अब इसमें कुछ लोगों को भाजपा का प्रोपगंडा दिखता है तो यह उनका व्यक्तिगत विचार है. वैसे इससे सबसे ज़्यादा फायदा टी-सीरीज़ को ही हुआ है. महीनों पुराने टी-सीरीज़ बनाम ‘प्यूडी पाई’ वाले डिजिटल विश्व युद्ध में टी-सीरीज़ ने बाजी मार ली है. 

अच्छा कुछ लोगों को यह भी शिकायत है कि परम आदरणीय अटल बिहारी बाजपेयी और अब्दुल कलाम जी पर बायोपिक क्यों नहीं बनी है. मांग तो हम भी करते हैं कि बननी चाहिए. लेकिन इस पैमाने पर आप किसी दूसरी फिल्म को सिर्फ यह कह कर नहीं नकार सकते हैं कि इसके पहले दो व्यक्तियों पर फ़िल्म बनाओ नहीं तो हम ये वाली नहीं देखेंगे. जिन्हें देखना होगा वो देखेंगे. जिन्हें नहीं देखना होगा, वो नहीं देखेंगे. इसमें विवाद का तो कोई विषय ही नहीं है. वैसे भी फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की पूरी ब्रिगेड तो बॉलीवुड में ही है, तो यह सवाल उनसे बनता है कि इन महापुरुषों पर आज तक फ़िल्म क्यों नहीं बनी है. 

कुल मिलाकर राजनैतिक माहौल के बीच ऐसी फिल्म का आना सवाल तो स्वाभाविक रूप से उठाएगा ही, लेकिन सवालों की भी एक सीमा होती है. आज कल के चुनावी माहौल में सब कुछ राजनैतिक राडार के अंदर आ चुका है. 5 अप्रैल 2019 को यह फ़िल्म सिनेमाघरों में लगने वाली है. कुछ और फिल्में भी हॉल में लगी होंगी. फिल्मों का पूरा बूफे लगा हुआ होगा, जो पसंद आ जाये उस स्क्रीन में घुस जाना. बाकी ये राजनैतिक शोर तो 23 मई जारी रहेगा. मजे लीजिए, और ऐसा नहीं कर सकते तो थोड़ा एडजस्ट ही कर लीजिए.