18 फ़रवरी 2007 को हुए समझौता एक्सप्रेस के बम धमाके में NIA की अदालत ने स्वामी असीमानंद को बाइज़्ज़त बरी कर दिया है. इसके बारे में बहुत सी बातें की जा सकती हैं, पहले भी की जाती रही हैं. मुख्यतः समझौता बम ब्लास्ट उस सामाजिक विघटन की नींव थी, जिसमें देश की एक राजनैतिक पार्टी विफल हुई है. उसने ऐसा क्यों किया था, यह विशेषज्ञों के ऊपर छोड़ देते हैं. कैसे किया गया, इसकी बात करते हैं.
इस बम ब्लास्ट में मुख्य अभियुक्त थे असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी. इनको बाइज़्ज़त बरी करने का सीधा मतलब यह निकलता है कि जिस काल्पनिक सोच के ऊपर हिंदू आतंकवाद जैसा शब्द गढ़ा गया था, वह बुरी तरह से फ्लॉप हुआ है. ज़रा सोचकर देखिये कि देश की बहुसंख्यक आबादी को आतंकवादी बताया जा रहा था और उसी बहुसंख्यक आबादी के चुने हुए प्रतिनिधि चुप थे. लोकतंत्र का उपहास हो रहा था और उसी लोकतंत्र में सेकुलरिज्म की मजबूती के दावे करने वाले जन प्रतिनिधि गंगा-जमुनी तहजीब की ढाल लिए स्वयं को बचा रहे थे.
इससे पहले भी अन्य अदालतों से स्वामी असीमानंद को बरी किया जा चुका था. देश के रक्षा सौदों में बिना किसी प्रमाण के देश के प्रधानमंत्री को चोर जैसे अपमानजनक शब्द से संबोधित करने वाले उस समय राजनीति का ककहरा सीख रहे थे, तो उनको कोई दोष नहीं दिया जा सकता है. परंतु 70 साल की मेहनत से बनाये विराट व्यक्तित्व के ध्वजवाहक उस समय भी राजनीति में थे, लेकिन इस अन्याय को वो मूकदर्शक की भांति देखते रहे. उसी कालखंड में साध्वी प्रज्ञा भी प्रताड़ित की जा रही थी. आज न्याय के मंदिर से दोनों को ही बाइज़्ज़त बरी किया गया है लेकिन उनके बीते हुए एक दशक की पीड़ा की ज़िम्मेदारी कोई नहीं ले रहा है.
देश की बहुसंख्यक आबादी सदैव से सहिष्णु रही है, और सर्व समावेशी भी. परंतु कुछ दशकों के भीतर ही उनको न सिर्फ साम्प्रदायिक सिद्ध करने के प्रयत्न हुए हैं. कुछ ही साल पहले उनके ऊपर ‘असहिष्णु’ का भी टैग चिपकाने का प्रयत्न हुआ है.
वह भी मात्र कुछ घटनाओं के आधार पर. हम यह नहीं कह रहे हैं कि वे घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण नहीं थी. निश्चित रूप से लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं काला धब्बा है लेकिन क्या व्यक्तिगत अपराध का दोषी पूरा समाज हो सकता है? क्या किसी समूह के आपराधिक गतिविधि के लिए पूरे समाज को कलंकित किया जा सकता है? आखिर इसी सोच के बीज से ही तो ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ वाला बरगद का पेड़ खड़ा हुआ है. उसी पेड़ की जड़ पर प्रहार क्यों किया गया, यह उस समय के हुक्मरानों को जवाब देना चाहिए.
कुल मिलाकर आज जब ‘अभियुक्त’ अदालतों में ‘निर्दोष’ साबित हो रहे हैं, तो उनके बीते हुए दिनों के कष्ट का हिसाब कौन देगा. यदि आज की राजनीति में किसी के पास वो रीढ़ की हड्डी है, तो सामने आए. जनता के समक्ष भी राजनैतिक बिरादरी के दो फाड़ स्पष्ट हैं. देखने वाली बात यह होगी कि अब यहां से स्थितियों में क्या बदलाव आता है, क्योंकि सोच में बदलाव तो सामने दिखाई दे रहा है. वर्तमान इकोसिस्टम की छटपटाहट उसी का एक परिदृश्य है जहां पर आप बड़े नामों की छोटी सोच को रोज़ टीवी चैनलों पर सुन ही रहे हैं.
दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.
