देश में डर का व्यापार फैलाते राजनीति के व्यापारी

कल की खबर है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि यदि नरेंद्र मोदी को 2019 में आने से नहीं रोका गया तो वह हमेशा के लिए इस देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे.

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ठीक यही बात अशोक गहलोत, जयराम रमेश और पत्रकारिता की दुनिया के ‘जात कुमार’ तहलका डॉट कॉम भी कह रहे हैं. कौन कहता है विपक्ष में एकता नहीं.

इस देश में डर का कारोबार सबसे तेजी से फैलने वाला कारोबार है. इसकी खासियत यह है कि इसमें पूंजी तो एक पैसे की नहीं लगती है लेकिन मुनाफा इतना होता है कि सदियों तक एक देश पर राज किया जा सकता है. इस देश की राजनैतिक पार्टियों ने यह करके दिखाया है. यदि विश्वास नहीं होता है तो इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए. अंग्रेज़ो ने भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही किया था. बस उनके पास दिखाने के लिए हथियारों का डर था. आज की राजनीति में एक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे एक व्यक्ति इस राजनीति की धुरी बन चुका है जिसके इर्द गिर्द सारी चीजें हो रही हैं. भारतीय जनता पार्टी चाहें इसका कितना भी क्रेडिट लेने की कोशिश करे, लेकिन असल सच्चाई यही है कि इस देश के विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी को देश की राजनीति की सर्वप्रमुख धुरी स्वतः बना दिया है. 2002 से 2014 के बीच दिल्ली की यमुना में बहुत पानी बह चुका है.

अरविंद केजरीवाल ‘फियर मोंगरिंग’ का विरोध करते नहीं थकते हैं. जिस चीज़ को बताने के लिए वो हाथ से लेकर पैर की बीसों उंगलियों को सुजा चुके होंगे, आज वो वही बात खुद अपने मुखारविंद से कर रहे हैं. मतलब ऐसा क्या हो जाएगा यदि 2019 में नरेंद्र मोदी वापस आ जाते हैं? आखिरकार चुनकर तो उसी संवैधानिक प्रक्रिया से आएंगे जिससे अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं. क्या उनको देश के संविधान पर भरोसा नहीं है. 

केजरीवाल खुद यह कह चुके हैं कि भाजपा इस देश के संविधान को बदल देगी. हमारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब इस देश के संविधान में सत्ता के समुद्र मंथन के दौरान पक्ष और विपक्ष, दोनों ही तरफ समान अवसर दिए हैं, तो एक सत्ताधीश पार्टी उसको अकेले कैसे बदल देगी. कम से कम अपने अधिकारी वाले दिनों को तो अरविंद केजरीवाल याद कर ही लेते कि इस देश का संविधान कैसे काम करता है.

1975 में इस देश के संविधान पर एक खतरा आया था. तत्कालीन राजनैतिक युग के एक विराट व्यक्तित्व ने इस देश के संविधान को अपने अस्तित्व से छोटा समझने की भूल की थी. इमरजेंसी के उन्हीं दिनों में हमने जयप्रकाश नारायण जैसे नेता का भी उदय देखा है. इस देश की मिट्टी में हमेशा से वो दम रहा है जिसने ऐसे लाल पैदा किये है जिन्होंने बड़े-बड़ों का घमंड तोड़ा है. इसी कालखंड में मीडिया पर सेंसरशिप लगाई गई. विभिन्न राज्यों में धारा 356 का दुरुपयोग कर विपक्ष की सरकारों को गिरा दिया गया था. उनसे उनके अधिकार छीन लिए गए थे. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जेल के दर्शन करने पड़े. देश की व्यवस्था एक व्यक्ति विशेष के लिए गिरवी रख दी गयी थी, तब भी यह देश खड़ा हो गया था. 

देश के संविधान पर उस बड़े खतरे के कालखंड के बीच भी यह देश एकजुट हो कर इंदिरा जैसे व्यक्तित्व के खिलाफ खड़ा था. इमरजेंसी हटानी पड़ी. संविधान पर आज़ाद भारत में हुए हमलों को भी खुद संविधान ने ही रोका था. आज संविधान को कमज़ोर करने की काल्पनिक हवा विपक्ष द्वारा क्यों बनाई जा रही है.

इस देश के प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता ही अपने नेता को चुनती है. यदि जनता चाहेगी तो मोदी आएंगे. नहीं चाहेगी तो नहीं आएंगे. आपकी व्यक्तिगत राजनीतिक शत्रुता हेतु देश में काल्पनिक भय की कहानियां बनाना कितना उचित है? क्या इससे देश में अस्थिरता का माहौल नहीं बनेगा. और यदि यह बनता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? इतने वर्षों से राजनीति में रहे वरिष्ठ नेताओं को तो हर कालखंड के विषय में जानकारी है. उनको इस देश की नाज़ुक भावनात्मक डोर का भी पता है. उनके द्वारा यह कार्य क्यों किया जा रहा है. इसको एक व्यक्ति विशेष से शत्रुता को व्यक्तिगत स्तर पर ले जा कर देश के संवैधानिक ढांचे पर प्रहार क्यों न कहा जाए?

उसमें भी तहलका डॉट कॉम जैसे मीडिया प्लेटफार्म इस्तेमाल किये जा रहे हैं. बड़े और विशाल संपादकीय लिखे जा रहे हैं. बड़े-बड़े संपादकों द्वारा उसका संपादन किया जा रहा है ताकि एक एक शब्द तीर की तरह निशाने पर लगे. ऐसा लगता है जैसे राजनैतिक पार्टियों की कैंपेनिंग की सीमाएं अब नए स्तर पर जा चुकी हैं.

अभी तो युद्ध का बिगुल फूंका है. युद्ध का नियम होता है कि पीठ पर और बिलो द बेल्ट वार नहीं किया जाता है. भय का माहौल बनाकर चुनाव जीतने का प्रयत्न इन्हीं दो नियमों का उल्लंघन है. ऐसा हो ही नहीं सकता है कि इस सरकार ने कुछ गलतियां न की हो. लेकिन दयनीय स्थितियां तब बन जाती है जब सरकार की गलतियों को बताने के बजाय यह दिखाया जाता है कि संविधान खतरे में है. यह बात भी वही लोग कहते हैं जो इसी सरकार के दौरान उसी संवैधानिक प्रक्रिया से चुने हुए हैं. विडंबना इसी को कहते हैं. देश की जनता के पास 2 महीनों के समय शेष है. वह अपना भाग्य तय कर सकती है. हमें विश्वास है कि वीरों की धरती और जवानों का देश अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर जवाब देना जानता है.