जब एक दलित को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए खेला गया घिनौना खेल

नरेन्द्र मोदी को दूसरे कार्यकाल से रोकने के लिए जिस तरह के गठजोड़ और जिस तरह की रणनीतिक साझेदारी दिख रही है, वह अवसरवादी राजनीति की पराकाष्ठा है. बसपा और सपा में जो गठजोड़ हुआ है, वह कुछ वर्ष पूर्व कल्पना के परे था. बसपा और सपा में तो गठजोड़ तो है ही, कांग्रेस भी अपने उम्मीदवारों का चयन इस तरीके से कर रही है जिसका फायदा सपा और बसपा को ही हो. लेकिन यह पहली बार नहीं है. सन 1977 और सन 1980 में एक दलित को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए एक ऐसा ही अनैतिक गठजोड़ हुआ था.

1977 की जनता लहर में कांग्रेस उत्तर भारत में साफ़ हो गई थी. अब समस्या प्रधानमंत्री चुनने की थी. जनता पार्टी के चार मुख्य घटक थे- 1) भारतीय लोकदल या समाजवादी धड़ा 2) भारतीय जनसंघ 3) कांग्रेस संगठन और 4) कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी. भारतीय लोकदल के नेता थे चरण सिंह. भारतीय जनसंघ और लोकदल इसमें सबसे बड़े घटक थे. मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम प्रधानमन्त्री पद के लिए दावेदारी कर रहे थे. सबसे बड़ा घटक होने के बाद भी जनसंघ ने इस रेस में शामिल होने से इंकार कर दिया. मोरारजी देसाई कांग्रेस संगठन [कांग्रेस (ओ)] के नेता थे, अच्छे प्रशासक और बेहद इमानदार माने जाते थे. लेकिन वह जिद्दी बहुत थे. उनके तौर तरीके गठबंधन की सरकार के लिए सही नही माने जाते थे. चौधरी चरण सिंह के पास एक तिहाई सांसदों का समर्थन तो था लेकिन उनके पास राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव नही था. उनके आलोचक यहाँ तक कहा करते थे कि चौधरी चरण तब तक किसी भी दक्षिण भारतीय राज्य में नही गये थे. 

वहीं जगजीवन राम अच्छे प्रशासक माने जाते थे, लम्बे समय तक देश के रक्षा मंत्री रहे थे. बांग्लादेश मुक्ति आन्दोलन के समय भी देश के रक्षा मंत्री जगजीवन राम ही थे. ठंढे दिमाग के आदमी थे और जरूरत के हिसाब से राजनीतिक समझौते कर लेते थे. लेकिन आपातकाल का प्रस्ताव जगजीवन राम ने ही संसद में प्रस्तावित किया था. आपातकाल खत्म होने के बाद तक वे कांग्रेस के साथ बने रहे. लेकिन उनके समर्थक कहा करते थे कि जनता लहर जगजीवन राम के जनता पार्टी के साथ आने के बाद ही शुरू हुई थी.

जनसंघ धड़े का समर्थन जगजीवन राम को ही था. आरएसएस का मानना था कि एक ऐतिहासिक अत्याचार की आंशिक भरपाई एक दलित को प्रधानंत्री बनाकर हो सकेगी. लेकिन समाजवादी किसी भी कीमत पर जगजीवन राम को प्रधानमंत्री स्वीकार करने को तैयार न थे. अंततः बीच का रास्ता निकाला गया और मोरारजी प्रधानमन्त्री बने. जनता सरकार बन तो गई लेकिन कुछ मोरारजी की उम्र और कुछ उनके मिजाज की वजह से यह साफ़ था कि वे लम्बे समय तक प्रधानमन्त्री नही रहेंगे. मतलब साफ़ था की जगजीवन राम की दावेदारी खत्म नही हुई थी. इसके बाद जगजीवन राम को रोकने के लिए समाजवादियों और कांग्रेस पार्टी ने एक घिनौना षड्यंत्र किया.

जगजीवन राम के पुत्र सुरेश कुमार थोड़े मनचले किस्म के आदमी थे. लुटियन दिल्ली में यह बात सभी जानते थे कि सुरेश कुमार एक बड़े बाप के बिगडैल बेटे थे. जगजीवन राम की डोर काटने के लिए उनके विरोधियों ने उनके बेटे को मोहरा बनाया. सुरेश कुमार की मित्रता दिल्ली विश्विद्यालय में पढने वाली एक युवती से थी. उन दोनों के अन्तरंग क्षणों की तस्वीरें उतारी गई और नेशनल हेरल्ड के सम्पादक और इंदिरा के करीबी खुशवंत सिंह तक पहंचा दी गई. खुशवंत सिंह ने लिखा है कि उन्हें ये तस्वीरें चौधरी चरण सिंह के एक करीबी आदमी ने दी. खुशवंत ने तस्वीरें इंदिरा गाँधी तक पहुंचा दी थी. जगजीवन राम को जब ये बात पता चली तो उन्होंने इंदिरा से आग्रह किया कि ये तस्वीरें सार्वजनिक नही की जाये. लेकिन इंदिरा जगजीवन राम से खार खाए बैठी थी और उन्हें हर हाल में सबक सिखाना चाहती थी. नतीजन मेनका गाँधी के सम्पादन में छपने वाली सूर्या पत्रिका में ये तस्वीरें छाप दी गई. पूरे देश में हंगामा मच गया.

सुरेश कुमार ने इस मामले में चौधरी चरण सिंह के करीबी केसी त्यागी और ओमपाल सिंह पर मुकदमा किया था. केसी त्यागी आजकल जनता दल यूनाइटेड में हैं और यदा कदा राजनीतिक शुचिता पर भाषण देते हुए देखे जा सकते हैं.

वैसे तो इस मामले में कुछ भी गैरकानूनी नही था और यह मामला जगजीवन राम के बारे में भी नहीं था. लेकिन सार्वजनिक जीवन कानून से अधिक नैतिकता से प्रभावित होता है. वास्तव में जगजीवन राम इस स्कैंडल से कभी उबर नही सके. एक दलित राजनेता जिसने अपने श्रम और बुद्धि से बिहार के एक छोटे से गाँव से सत्ता के राजमार्ग का सफर तय किया था, उसकी प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया गया. जगजीवन राम वंचितों के सबसे बड़े नेता थे.

तमाम मन्दिरों के दरवाजे उन्होंने हरिजनों के लिए खुलवाए. वह हरिजनों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे लेकिन कभी समाज को तोड़ने की बात नही की. वे कभी कोई चुनाव नही हारे. वे शानदार प्रशासक और चतुर राजनेता थे. वे देश का प्रधानमन्त्री बनकर इतिहास को बदल सकते थे लेकिन समाजवादियों और कांग्रेसियों के गठजोड़ के कारण ऐसा नही हो सका.

बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश एक बार फिर समाजवादी और कांग्रेसी एक हैं. मकसद साफ़ है- एक अति पिछड़ा फिर से प्रधानमन्त्री न बन जाये.

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.