अभी खबर आयी थी कि देश-विदेश के 108 अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों ने आर्थिक आंकड़ों में राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर चिंता जतायी थी.
जीडीपी के आंकड़ों के कैलकुलेशन में बदलाव करने तथा NSO द्वारा रोजगार के आंकड़ों के मामले में शुरू हुए विवाद के मद्देनजर यह बयान आया था. इस पर प्रतिक्रिया स्वरुप आज 131 चार्टेड एकाउंटेंट्स सरकार द्वारा लागू पद्धति के समर्थन में आ गए हैं. हाल ही में 108 अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों में ऐसा इल्ज़ाम लगाया कि भारत में अर्थशास्त्र के सांखियिकी से खिलवाड़ किया जा रहा है. उन्होंने ऐसा इल्ज़ाम भी लगाया कि इसमें राजनैतिक मध्यस्थता भी है. उनका कहना है कि पिछली सरकारों में NSSO और CSO स्वतंत्र और विश्वनीय थे पर अब नहीं हैं.
सरकार को आड़े हाथों लेना तो एक्सपर्ट्स का काम है पर यह काफी असामान्य है कि एक इतना बड़ा वर्ग इकट्ठा होकर इतने समय से चले आ रही संस्थाओं और उनके द्वारा दिये गए आंकड़ों पर सवाल उठा रहा है. इस अपील में यह भी कहा गया है कि सरकार वह आंकड़े छुपा रही है जो उसके खिलाफ जा रहे हैं. GDP का आधार हमेशा से ही बदलता आ रहा है पर अचानक इस ओर सवाल खड़े करने के पीछे कुछ राजनीतिक कारण नज़र आ रहे हैं. यहां तक कि यह वर्ग सेना द्वारा दिये गए आँकड़ों को भी मानने को तैयार नहीं है. कहीं न कहीं यह घटना ‘अवार्ड वापसी’ से मेल खा रही है जहां तथ्यों को नकार निराधार बातें की जा रही हैं.
1960 से लेकर 2014 तक के समयकाल में भारत लगभग सभी एशियाई देशों से पिछड़ गया था. पर उस समय किसी भी अर्थशास्त्री ने यह सवाल नहीं खड़ा किया की ऐसा क्यों है? केवल अभी सवाल उठाने से मन में शक पैदा होता है कि क्या यह फॉरेन इन्वेस्टर्स को डराने की साज़िश है? 2008 -2014 में के बैंकों के NPA बढ़े, PSU की लेन देन बुक वैल्यू से कहीं नीचे थी पर किसी ने NPA के आँकड़ों की मांग नहीं की.
अर्थशास्त्रियों द्वारा लिखे खत में न तो कोई तथ्य दिया गया है ना ही अपने दावों के समर्थन में कोई आंकड़ा दिया है. केवल एक आधारहीन आरोप लगाया गया है कि GDP का बेस ईयर चेंज हुआ और NSSO का लेबर फोर्स सर्वे पब्लिश नहीं हुआ. शायद यह लोग यह भूल चुके हैं कि बेस ईयर 1967, 78, 88, 99 और 2006 में भी बदला गया था. समय समय पर बेस ईयर को बदला जाता है ताकि वह अर्थव्यवस्था के हिसाब से समायोजित हो जाए. असल बात यह है कि बेस को 2004-05 से 2011-12 में UPA काल में बदल गया था पर इसके आँकड़े NDA काल में आना मात्र संयोग है. यह बदलाव UN की गाइडलाइंस के अधीन है. पर फिर भी यह वर्ग इन बदलावों से संतुष्ट नहीं है, और मुद्दा यह भी है कि यह अभी तक चुप क्यों बैठा था ?
भारत जैसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में कुछ गड़बड़ी होने की आशंका हमेशा रहती है. इन अर्थशास्त्रियों को देश में हो रही उन्नति नहीं नज़र आती, जन धन, स्वच्छ भारत, बिजली पानी, सड़क, सभी अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर भारत की रैंक बेहतर होती हुई नज़र नहीं आती. गैस इत्यादि मुद्दों पर हुई प्रगति नहीं नज़र आती .भारत FDI में चीन से आगे बढ़ चुका है. NPA, काल धन, बिना किसी स्कैम के चलने वाली सरकार की सच्चाई नज़र नहीं आती. आखिर यूंही नहीं हम पांचवी सबसे बड़ी इकोनॉमी हैं. IMF और वर्ल्ड बैंक जैसे बड़ी बड़ी संस्थाएं भी भारत का लोग मान रही हैं पर हमारे ही देश के एक वर्ग के अर्थशास्त्रियों को देश की सफलता पर शक हो रहा है.
CA समुदाय यह अपील करता है कि सभी लोग आगे आकर इन निराधार आरोपों को खंडित करें और देश की साफ छवि दुनिया के सामने प्रस्तुत करें जिसमे कोई राजनैतिक स्वार्थ न हो.

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भारत का लोहा कर लिजीए…. बाकी शानदार🙏