हस्तिनापुर राजदरबार की बैठक चल रही है. उपस्थित हैं; महाराज धृतराष्ट्र, पितामह, महामंत्री विदुर, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, युवराज दुर्योधन, उप युवराज दुशासन, शकुनि और संजय.
महाराज धृतराष्ट्र सिंहासन के दोनों हत्थों को पूरा बल लगाकर मुट्ठियों में भींचे चौंसठ अंश पर मुख को ऊपर किए वायुमंडल ऐसे निहार रहे हैं जैसे इंद्र से बतिया रहे हों. कृपाचार्य एक पुस्तक के पन्ने पलटते हुए कुछ ऐतिहासिक तथ्य ढूँढ रहे हैं. किंचित राजदरबार में धर्म-अधर्म को लेकर कोई शास्त्रार्थ छिड़ा हुआ है.
द्रोणाचार्य निज ज्ञान से विकसित युद्ध कला के नए कौशल को सोच के द्वारा मन ही मन विकसित कर रहे हैं.
उधर पितामह पूरे संसार की बेचारगी मुख मंडल पर समेटे युवराज दुर्योधन से कह रहे हैं;
“तुम्हारे इसी हठ से हस्तिनापुर को वर्षों से तक बहुत अपयश मिला है पुत्र, वर्षों तक बहुत अपयश मिला है. तुमने अपने हठ, अधर्म और अत्याचार से सम्पूर्ण हस्तिनापुर को बंदी बना रखा है पुत्र, बंदी बना रखा है. ऊपर से तुम्हारा ये हलकट मामा हमेशा से आग में गाय का शुद्ध देसी घी डालता रहा है जो इसके चारण गांधार से वाया खैबर पख़्तून खा लाते रहे हैं. तुम चार दशकों से अडल्ट हो चुके हो पुत्र, अडल्ट हो चुके हो. तुम्हें यह समझने की आवश्यकता है कि सम्पूर्ण राज्य को अपने हठ से चलाने की तुम्हारी सोच एक दिन कौरवों के नाश का कारण बनेगी.
तुमने आचार्य द्रोण की पाठशाला में मन लगाकर शिक्षा ग्रहण नहीं की. स्मरण रहे पुत्र कि तुम्हें मात्र युद्धकला और षड्यंत्रशास्त्र से प्रेम रहा. गणित, विज्ञान, साहित्य, धर्म, नागरिकशास्त्र जैसे विषयों से तुम हमेशा वैर करते रहे पुत्र, वैर करते रहे. पाठशाला में तुमने भीम की हत्या का षड्यंत्र किया. वहाँ से निकले तो पांडवों से शत्रुता को नवीन स्तर पर ले जाते हुए तुमने कर्ण को अपना मित्र बनाया. द्रौपदी स्वयंवर में विकट बवाल किया. द्रौपदी का असीम अपमान कौन भूल सकता है?
पूरा हस्तिनापुर आजतक लज्जित है पुत्र, आजतक लज्जित है. पांडवों को तुमने लाक्षागृह में मारने का अपराधपूर्ण प्रयास किया. द्यूतक्रीड़ा में अधर्म का सहारा लेकर तुमने उन्हें वनवास भेजकर उनके राजपाट से अलग कर दिया. श्रीकृष्ण का बारम्बार अपमान किया पुत्र, बारम्बार अपमान किया. और आज तुम….”
पितामह की बात बीच में काटते हुए दुर्योधन बोला; “आप चाहे जितना तर्क दे दें, चाहे जितना धर्म-अधर्म का ज्ञान दे दें परंतु मेरी माँग अडिग है पितामह”
अभी तक पितामह को धैर्य के साथ सुन रहे महामंत्री विदुर ने सिर हिलाया और संसार की समस्त वितृष्णा मुख-मंडल पर लाते हुए पूछा; “परंतु युवराज की माँग है क्या पितामह?”
भीष्म ने आँखें बंद कर हुए अपना सिर हिलाते हुए कहा; “मुझसे न पूछें महामंत्री विदुर मुझसे न पूछें. आप पुत्र दुर्योधन से ही उसकी अडिग माँग के बारे में पूछें”
विदुर ने मुख-मंडल पर छाई वितृष्णा को और गहरा करते हुए कहा; “अच्छा, आप ही बताएँ युवराज कि आपकी यह नवीन अडिग डिमांड क्या है?”
दुर्योधन ने तैश में आते हुए कलाई पर गिर रहे अंगवस्त्र को झटका और बोला; “मेरी डिमांड यह है काकाश्री कि मोदी मस्ट रिज़ाइन”
राजदरबार में उपस्थित दुर्योधन के समर्थक ज़ोर-ज़ोर से नारा लगाने लगे;
“युवराज दुर्योधन की जय”, “युवराज तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है”
“पीयो बीयर वाइन नाउ, मोदी मस्ट रिज़ाइन नाउ”
“दुर्योधन तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है”
अंतिम नारा सुनकर दुशासन बिदक गया. उसने समर्थकों से कहा; “भ्राताश्री हस्तिनापुर के युवराज हैं मूर्खों, उन्हें कैसा संघर्ष करना? बिना अर्थ समझे नारा लगा देते हो?”
दुर्योधन ने दुशासन को समझाते हुए कहा; “नारे में अर्थ या प्रासंगिकता ढूँढना दुर्बल राजनीति की निशानी है अनुज.
नारे लगने दो, उन्हें मत रोको”
दूसरे दिन हस्तिनापुर इक्स्प्रेस, टाइम्ज़ ऑफ़ हस्तिनापुर और हस्तिनापुर टाइम्ज़ में कॉलम लिखे गए जिसमें कॉमन प्रश्न था;
इज प्रिन्स दुर्योधना फ़ाइनली कमिंग ऑफ़ एज?”

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जबरदस्त