राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है, न तेवर और न कलेवर एवं न मित्र और न शत्रु. भारत की राजनीति में इस समय यह रंग में दिख रहा है. सैद्धांतिक बैसाखी पर चलने वाली पार्टियां उन बैसाखियों को फेंककर वोट यात्रा की रेस में दौड़ लगा रही हैं. इस दौड़ में उनके सिद्धांत किसी खाली गोदाम में फेंक दिए गए हैं. यही आज की राजनीति की एक सच्चाई बन गयी है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता.
गुजरात चुनावों में अपना इटालियन सूट से धोती कुर्ते पर उतरे राहुल गांधी का जनेऊधारी अवतार देखकर जनता ने यह मान लिया था कि आज तक जो नहीं हुआ है, वो अब होगा. 2019 का चुनाव बहुत से मामलों में खास है. कांग्रेस पर अस्तित्व बचाने का संकट है तो बाकी क्षेत्रीय दलों में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने की दौड़. इस दौरान इफ्तारी पार्टियों के चूसे जाने वाले आम ये सोचकर दुखी है कि आज कल नेता जी नज़र ही नहीं आते हैं. इसी दौरान किसी ज़माने में भगवा को ‘सांप्रदायिकता’ का चिन्ह बताने वाले लोगों में भी ‘टेंपल रन’ की प्रतियोगिता चल रही है.
अपने बड़े भाई राहुल की तरह प्रियंका ने भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू कर दिया है. कल इसकी शुरुआत माँ गंगा के तट से हुई थी. आज यह यात्रा मंदिर तक पहुँची है. यह तब है जब 2009 में ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी नया शब्द गढ़ा गया था. जिन्होंने दिया, उनका क्या हाल हुआ, ये 2014 के चुनावों ने बता दिया.
2013 में एक कम्युनल वॉयलेंस बिल आया था. इस बिल के प्रावधानों को पढ़कर ऐसा लगा जैसे देश का बहुसंख्यक समाज ‘सेकुलरिज्म की दीवार’ गिराना चाहता है. दस हज़ार साल पुरानी सभ्यता वाले लोग अब साथ में नहीं रह पा रहे हैं. इन्हीं सब कारणों से ए. के. अंटोनी की रिपोर्ट में कहा गया कि कांग्रेस पार्टी की ऐसी छवि बना दी गयी है जैसे वो हिंदू विरोधी है. ध्यान दीजिए…’छवि बना दी गयी’.
अब इन सबके बाद 2014 का चुनाव आया और देश में बदलाव हुआ. यह बदलाव बस सत्ता परिवर्तन का नहीं था बल्कि दशकों पुरानी सेक्युलर राजनैतिक फॉर्मूले का अंत था. महज़ दो साल के अंदर लोगों को समझ में आ गया कि बहुसंख्यक आबादी को नाराज़ कर चुनाव नहीं जीता जा सकता है. नेताओं का दाना-पानी तो चुनावी जीत पर ही निर्भर है. वहीं जब किसी पार्टी पर अपना अस्तित्व बचाने का संकट हो तो वह हर कार्य करने के लिए तैयार रहती है. वैसे भी ‘गांधी ब्रैंड’ का जांचा परखा नाम उनके पास है. उसका पूरा इस्तेमाल इस बार भी किया जा रहा है.
इस बीच देश की जनता 1947 से उठकर 2019 वाली बन चुकी है. बहुत से बदलाव हुए हैं और यदि कोई यह सोचता है कि इस देश की जनता पर 70 साल पुराना फॉर्मूला काम कर जाएगा तो वह भ्रम में है. 2014 से 2019 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में विशेषज्ञों ने सब कुछ देख ही लिया है. जो अब भी नहीं समझ पा रहे हैं, 23 मई को समझ जाएंगे.
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