एक तरफ जहां देश का बहुसंख्यक समाज होली के रंग में सराबोर था, दूसरी तरफ हमारे पड़ोसी मुल्क से एक ऐसी खबर आ रही थी जो देश की बहुसंख्यक आबादी को कई स्तरों पर एक संदेश दे रही थी. होली के दिन पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में दो हिंदू लड़कियों का अपहरण कर जबरन उनको इस्लाम कबूल करवाया गया है. अत्याचार की सीमा तब पार हो गयी जब उनका निकाह दो मुस्लिम युवकों के साथ करवा दिया गया. बच्चियों के पिता इस समय अपने होश में नहीं हैं. पाकिस्तानी धरती और अपनी किस्मत को कोस रहे हैं. यह किसी भी देश के लिए एक लज्जित करने वाला क्षण होना चाहिए, बशर्ते वो देश पाकिस्तान न हो.
1947 में जिस धार्मिक बुनियाद पर पाकिस्तान बना, उसने पाकिस्तान की ‘सीमित सोच’ वाले दायरे की लकीर सिर्फ सीमा पर ही नहीं खींची, बल्कि उसके समाज में भी खींच दी गयी. 70 वर्षों के बाद जब आप भारत और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के आबादी को देखते हैं तो अंतर स्पष्ट समझ में आता है. हमारे अल्पसंख्यकों में एक वर्ग जहां ‘दूसरा बहुसंख्यक’ बनने की कगार पर आ गया है, वहीं पाकिस्तान के बहुसंख्यक अब 1% की आबादी से भी नीचे जा चुके हैं. खासकर हिंदुओं का तो हाल बहुत ही बुरा है. उनके आंसुओं का हिसाब देने के लिए पाकिस्तान का कोई नेता खड़ा नहीं होता. एटमी बमों की कोरी धमकियों को सीने के पूरा जोर लगाकर चिल्लाने वाले कभी अपने गिरेबान में झांक कर देखते ही नहीं है कि जिस आधार पर वह खड़े हैं वह कितनी खोखली है.
इस मामले को लेकर आज सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान में तैनात भारतीय उच्चायुक्त को तलब किया और इस मामले में जानकारी मांगी.
अपराध बोध में ग्रसित पाकिस्तान के एक मंत्री फवाद हुसैन ने इस बात के लिए हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को निशाने पर लिया है. उनका कहना है कि भारत अपने यहां अल्पसंख्यकों की स्थितियां देखे. पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल न दे.
इसके बाद सुषमा जी ने फवाद हुसैन को खाने भर का दिया है. उन्होंने पाकिस्तान के अपराध बोध को दिखाते हुए फवाद हुसैन को सत्य का आईना दिखाया है. वैसे सुषमा स्वराज जी इसके लिए जानी भी जाती हैं.
एक देश जो धार्मिक नींव पर खड़ा हुआ, आज जिस मुकाम पर पहुंच चुका है, वह दुनिया को एक सबक है. भारत और पाकिस्तान के बीच का अंतर मात्र भौगोलिक परिस्थितियों का ही नहीं है, बल्कि एक सोच का है. हमारे देश की आम जनता देश के अल्पसंख्यकों को भी उतना अधिकार इसलिए दे पाती है क्योंकि इस देश की आत्मा में सर्व समावेशी बीज है. आज से ही नहीं, युगों-युगों से हमारा इतिहास इसी एक सोच की नींव पर टिका हुआ है. परंतु इस बीच हमारी रक्षात्मक नीति में परिवर्तन आया है. सुषमा स्वराज का उन दो हिंदू लड़कियों हेतु यह ट्वीट उसी को परिलक्षित करता है.
वो दोनों हिंदू लड़कियां भारत की नागरिक नहीं थी. वह किसी नेता अथवा अधिकारी की रिश्तेदार भी नहीं थी. उसके बावजूद भारत के विदेश मंत्रालय की मुखिया द्वारा उनके प्रति अपने उच्चायुक्त को तलब करना बताता है कि जिस मानवाधिकार का इस्तेमाल कर पाकिस्तान भारत पर हमले करता था, आज भारत के उसका जवाब देना सीख लिया है. यह हमारे लिबरल बिरादरी के लिए भी एक संदेश है. इतना घृणित कार्य करने के बाद भी पाकिस्तान के किसी मानवाधिकार संगठन ने सड़को पर रैलियां नहीं निकाली हैं. उनका कोई नेता उनके देश के प्रधानमंत्री को निशाने पर भी नहीं ले रहा है. यदि यही घटना हमारे देश में अल्पसंख्यकों के साथ हुई होती तो पाकिस्तान से पहले हमारे देश का विपक्ष ही अपने लाव लश्कर के साथ सरकार को घेरने के लिए तैयार हो जाता.
भौगोलिक सीमाओं के बंधनों से मुक्त मानवाधिकार सिर्फ एक देश की बपौती नहीं है. यह सभी धर्मों पर लागू होता है. दुनिया के अंदर एक तथाकथित समुदाय जिस राजनैतिक उद्देश्य से खुद को प्रताड़ित दिखाता रहा है, उससे भी अधिक प्रताड़ित एक दूसरा समुदाय है जिसकी बात सिर्फ इसलिए नहीं की जाती है क्योंकि वह एक वैश्विक राजनैतिक उद्देश्य का हिस्सा नहीं है. बचा काम हमारे देश की छद्म सेक्युलरवाद वाली राजनीति में कर दिया है. देखना यह होगा कि वैश्विक स्तर पर भारत की अगली रणनीति क्या होती है. एक रणनीति का स्पॉइलर तो माननीय विदेश मंत्री ने दे ही दिया है.
