नॉर्थईस्ट का कल्चर मज़ाक का विषय नहीं है लल्लन!

देश का प्रधानमंत्री देश का नेता पहले है और अपने दल का नेता बाद में. इसलिए प्रधानमंत्री का एक डिफॉल्ट सम्मान लोकतंत्र में होना चाहिए. लेकिन बहुत से ‘डिजिटल क्षत्रप’ अपनी लिबरल स्वछंदता में ऐसा नहीं मानते. ट्विटर पर न्यूट्रालिटी का स्वप्रदत्त कवच पहनकर व्यंग्य के नाम पर आए दिन कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जो न सिर्फ इस डिफॉल्ट सम्मान की खिल्ली उड़ाता है बल्कि सामाजिक मर्यादा की परिधि से भी बाहर चला जाता है. व्यंग्य का ‘बिलो द बेल्ट’ अटैक युद्ध के ‘बिलो द बेल्ट’ अटैक से अधिक संवेदनशील है.   

कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अरुणाचल प्रदेश में थे. ‘जैसा देस वैसा भेस’ की परम्परा राजनीति में बहुत पुरानी है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी वहां की पारंपरिक पोशाक पहनी हुई थी. बस यही बात एक डिजिटल क्षत्रप को अखर गयी या उनके अंदर का व्यंग्य हिलोरें लेने लगा. फोटो लगाकर उन्होने ट्विटर पर लिख मारा; “आज दुग्गल साहब मोर हैं.” फिर शुरु हुआ पद की गरिमा, राजनीतिक और लोकतांत्रिक परम्परा का घटिया उपहास. यह ट्वीट करने वाले ‘लल्लनटॉप’ के संपादक या पत्रकार बताए जाते हैं.

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@TheLallantop के आशीष मिश्रा का ट्वीट जो उन्होंने अब डिलीट कर दिया हैं
प्रसार भारती के पूर्व चैयरमेन मृणाल पांडे का आशीष को जवाब

बात इतनी बढ़ गयी कि अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि यह अरुणांचल प्रदेश का अपमान है. हरियाणा से मंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने भी इस पर आपत्ति दर्ज कराई. वैसे हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में बहुत दूरी है, लेकिन फिर भी एक समानता है जो हमको ‘भारतीय’ बनाता है. इसी समानता को ‘लल्लनटॉप’ के आशीष मिश्र समझ नहीं पाए.

अरुणांचल प्रदेश के मुख्य मंत्री पेमा खांडू का पोस्ट
भारत सरकार में समाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री और फरीदाबाद से संसद कृष्ण पाल गुर्जर का पोस्ट

किसी राज्य की पारंपरिक वेशभूषा को यदि देश के प्रधानमंत्री पहनते हैं तो इससे उस राज्य के लोगों के प्रति अपनत्व का प्रदर्शन होता है. बात यदि उत्तर पू्र्व के संदर्भ में हो तो मामला और भी संवेदनशील इसलिए है कि उत्तर पूर्व में अलगाववादी उसे मुख्यधारा से काटने की कोशिश में लगे रहते हैं. उत्तर पूर्व की परंपराओं और वस्त्रों का अपमान सीधे तौर पर अलगाववादियों के हाथ मजबूत करता है. इसलिए जिन लोगों को प्रधानमंत्री के पारंपरिक पोशाक पहनने में ‘मोर’ नज़र आता है, वे स्वयं अंग्रेज़ी का ‘मोरोन’ प्रमाणित करते प्रतीत होते हैं. आदर्श पत्रकारिता तटस्थ होनी चाहिए. तटस्थ हो नहीं सकते तो दिखने की कोशिश तो करिए. यह भी नहीं कर सकते तो तो तटस्थता का भारी लबादा उतार फेंकिए. ऐसा करके भी आप मर्यादा और राष्ट्रीय हित की जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो जाएंगे. 

आउटरेज हमेशा ही फिजूल नहीं होता. आशीष मिश्र के इस वाहियात ट्वीट का लोगों ने सोशल मीडिया पर जमकर विरोध किया. मजूबर होकर उन्हे अपना ट्वीट डिलीट करना पड़ा. ट्वीट डिलीट करके उन्होने लिखा; “मोर वाला ट्वीट डिलीट कर दिया है, नार्थ-ईस्ट वालों को रेसिस्ट लग रहा था. ऐसा उद्देश्य नहीं था. पर जब किसी को कुछ बुरा लगे तो उसकी भावना की कद्र होनी चाहिए, सबसे माफी.” आशीष मिश्र की माफी सोशल मीडिया के दबाव के कारण आयी, इस कारण नहीं कि उन्हे अपनी जिम्मेदारियों का भान हुआ या अपनी गलती महसूस हुई. दरअसल, यह गलती है ही नहीं. यह जानबूझकर पूरे होशो हवास में रहकर, इसके परिणामों की गणना करके किया जाने वाला कृत्य है. माफी मांगने के बाद भी इससे जो नफा-नुकसान होना था, वह हो गया. कितना बड़ा विरोधाभासी दुर्भाग्य है कि देश असहिष्षुणता की चपेट में है, यह आरोप लगाने वाले यही लोग है.

यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आशीष मिश्र को डिफेन्ड करने वाले प्राणी भी हैं. वे तर्क दिया दे रहे हैं कि वेशभूषा पर नहीं, लेकिन व्यक्ति पर कटाक्ष किया गया है. व्यक्ति के प्रधानमंत्री होने की बात थोड़ी देर भूल भी जाएं तो व्यक्ति पर कटाक्ष का स्तर यह होगा. व्यंग्य का भी एक तरीका होता है, उसकी भी अपनी मर्यादा होती है.

लेकिन स्वयं को सच और शूचिता का पहरुआ बताते नहीं थकने वाले ऐसे पत्रकारों को ये बातें समझ नहीं आती या अपने एजेंडा में वे समझकर भी नासमझ बनने का स्वांग करते हैं. तुर्रा यह है कि जब लोग सोशल मीडिया पर उनका विरोध करते हैं तो ये उनलोगों को भक्त बताकर अपनी तटस्थता का लबादा वापस ओढ़ लेते हैं. यह प्रक्रिया पुरानी हो चुकी है और देश को इससे निजात पाने का उपाय खोजना ही होगा.