ये शांति की पुकार डर की उपज है

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तानी टीवी पर बैठकर यह उपदेश दिया है कि शांति और बातचीत से ही मसले हल होने चाहिए. उन्होंने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जो तनाव चल रहा है, उसका सैन्य समाधान नही है. पिछले 70 सालों में पाकिस्तान के खाने के दांत और रहे हैं और दिखाने के और. इमरान खान भी उसी परम्परा से आते हैं.

दरअसल इमरान खान जो शांति की दुहाई दे रहे हैं, उसका कारण यह नही है कि वे शांति और बातचीत के समर्थक हैं बल्कि तालिबान को समर्थन देने के कारण पश्चिमी मीडिया इमरान को तालिबान खान के नाम से बुलाती है. एकबार तो इमरान को अमेरिका के जहाज से सिर्फ इसलिए उतार दिया गया था क्योंकि तालिबान समर्थक रहे हैं. यहाँ तक कि मीडिया द्वारा बार बार पूछे जाने के बाद भी इमरान ने कभी भी ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी स्वीकार नही किया और गोल-मटोल जवाब देकर बचते रहे. पाकिस्तान के दूसरे बड़े नेता जैसे नवाज शरीफ, आसिफ अली जरदारी या परवेज मुशर्रफ ऐसी बेशर्मी कभी नही दिखा सके.

2013 के चुनावों में जब पहली बार खैबर पख्तूनख्वा में इमरान को सत्ता का स्वाद मिला तब भी यह तालिबान की मदद से मिला था. इमरान खान का रास्ता साफ करने के लिए तालिबान ने सीमांत गांधी के पोते असफंदयार अली खान की पार्टी के ज्यादातर नेताओं को कत्ल कर दिया.

अब जो नेता बेगुनाहों की लाश पर चढ़कर सत्ता के गलियारे में पहुंचा हो, वह शांति और बातचीत का महत्व समझाने लगे तो उस पर विश्वास करना आत्महत्या करने जैसा ही होगा. यह सवाल स्वाभाविक है कि इमरान अचानक शांति और सद्भावना की बात क्यों कर रहे हैं. इसके पीछे दो कारण हैं.

पहला कारण यह है कि पाकिस्तान की माली हालत बेहद खराब है. अमेरिका ने हाथ पीछे खींच लिया है. टैक्स कोई पाकिस्तान में देता नही. दवा और दूध तक खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा उपलब्ध नही है. ऐसे में इमरान हर उस स्रोत को खंगाल रहे हैं जो पाकिस्तान को डूबने से बचा सके. यदि जंग होती है तो सऊदी अरब तक पाकिस्तान में पैसे लगाने से इनकार कर देगा. तो पाकिस्तान को बचाने के लिए शांति की उसे जरूरत है. दूसरा कारण अधिक महत्वपूर्ण है. दरअसल हिंदुस्तान से जितनी बार जंग हुई है, उसमें पाकिस्तान को हार मिली है. और हर हार के बाद न केवल सत्ता परिवर्तन हुआ है बल्कि पाकिस्तान के नेतृत्व को भारी दुर्गति से भी गुजरना पड़ा है. अभी अभी तो इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं. जाहिर है इतनी जल्दी वे मार्शल लॉ की ज्यादतियों से तो नही गुजरना चाहेंगे. इन्ही कारणों से वे शांति की नौटंकी कर रहे हैं.

इमरान यदि सच मे शांति चाहते हैं और उनके ‘नया पाकिस्तान’ के दावे में तनिक भी दम है तो गुडविल जेस्चर के रूप में उन्हें दाऊद इब्राहिम और उसके परिवार को भारत को सौंप देना चाहिए. दाऊद का कश्मीर मसले से भी कोई लेना देना नही है. दुनिया जानती है कि दाऊद भारत का नागरिक है और मुंबई बम धमाकों में आरोपी है. वैसे तो भारत ने कराची की उस गली और मकान का नम्बर तक पाकिस्तान को बताया है जिसमें दाऊद रहता है. लेकिन फिर भी इमरान को यह पता न हो कि दाऊद कहाँ है तो वे अपने हमवतन क्रिकेटर जावेद मियांदाद से पूछ लें. आखिर मियांदाद दाऊद का समधी है. कम से कम मियांदाद का सम्पर्क तो इमरान खान के पास होगा ही. भारत में आतंकवाद और हत्याओं का आरोपी और भारतीय नागरिक को भारत को सौंप देने में आखिर शान्ति के दूत को क्या दिक्कत हो सकती है? यदि इमरान ऐसा करते हैं तो निश्चित ही यह माना जाएगा कि सत्ता मिलने के बाद इमरान बदल गए हैं और शांति और बातचीत को लेकर गम्भीर हैं.

आश्चर्य होता है कि इमरान और पाकिस्तान की असलियत जानते हुए भी भारत की वाम झुकाव वाली मीडिया उसे शांति का पुजारी और स्टेट्समैन बताये दे रही है. आज जो परिस्थितियां दोनों देशों के बीच है, उसमें भारतीय मीडिया का एक सेक्शन का व्यवहार उनकी निष्ठा पर गहरे प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है.