अखिलेश यादव को क्या ज़रूरत आन पड़ी हैं छात्र राजनीति में कूदने की?

टीवी चैनलों पर नित नए शोर के बीच कल एख और मुद्दा गर्म था. आरोपों के अनुसार अखिलेश यादव को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम में भाग नहीं लेने दिया गया. सत्ता पक्ष का कहना है कि अखिलेश यादव की वहां उपस्थिति अराजकता फैला सकती थी. दूसरी तरफ विपक्ष का कहना है कि ‘महागठबंधन’ से होने वाले राजनैतिक नुकसान के कारण सत्ता पक्ष बौखलाया हुआ है. आरोप-प्रत्यारोपों के बीच हमने भी इसको अपने चश्में से देखने का प्रयास किया है.

दरअसल एक कार्यक्रम के लिए अखिलेश यादव को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बुलाया गया था. इस बीच इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दो छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों में झड़प हो गयी, जिससे यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उस कार्यक्रम को रद्द कर दिया. इसके बाद यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार द्वारा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के पर्सनल सेक्रेटरी को एक पत्र लिखा गया जिसमें स्पष्ट शब्दों में यह लिखा हुआ था कि यूनिवर्सिटी कैंपस में राजनीतिज्ञों के प्रवेश से मनाही है. उधर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के लिए प्रस्थान कर चुके अखिलेश यादव को लखनऊ एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया. तर्क दिया गया कि पहले से ही यूनिवर्सिटी प्रशासन के अव्यवस्थित माहौल के बीच अखिलेश यादव का जाना अराजकता को एक दावत थी.

आश्चर्य की बात यह रही कि एक दिन पहले यूनिवर्सिटी प्रशासन की चिट्ठी से अखिलेश यादव अनभिज्ञ थे. इस पूरे मामले को देख लगता है कि सेक्रेटरी जी की नौकरी खतरे में है. इसको समाजवादियों ने अपने स्वाभिमान की लड़ाई बना दी, और प्रदर्शन वाली वही पुरानी  राजनीति की जाने लगी. इस बीच स्थिति ऐसी हो गयी कि पुलिस को लाठियां भी भाजनी पड़ी. रिपब्लिक भारत की एक महिला पत्रकार को भी लाइव रिपोर्टिंग के दौरान छेड़खानी का सामना करना पड़ा. लोहिया के सिद्धांतों ने छत से कूद एकबार फिर आत्महत्या कर ली होगी. टीवी कैमरों में यह भी कैद हुआ कि कैसे एक समाजवादी कार्यकर्ता द्वारा एक पुलिस वाले पर हमला कर दिया गया. इसके बाद पुलिस द्वारा उन महाशय की विधिवत सेवा की गई.

अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा करना आवश्यक था. स्थिति को अगर गहराई से देखें तो यह पता चलेगा कि जिस मुद्दे को ले कर इतना शोर मचाया गया, दरअसल उसकी आवश्यकता नहीं थी. पारंपरिक राजनीति की पाठशाला में पके हुए राजनीतिज्ञों को यह पता रहता है कि लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए विवादों से ऊपर मुद्दों को वरीयता देनी चाहिए. परंतु यह तथाकथित युवा जोश वाली राजनीति का युग है. यहां मुद्दा न मिले तो विवादों से भी काम चलाया जा सकता है. सीधे शब्दों में कहें तो विवाद इस नए युग की राजनीति का खाद और पानी है.

अखिलेश यादव वैसे भी यह कहते आये हैं कि वह मुद्दों की राजनीति करना चाहते हैं. ऐसा तो नहीं है कि उनको अपनी लोकप्रियता का आभास नहीं होगा. यूनिवर्सिटी की लड़ाई के बीच में उनकी उपस्थिति विवाद की आग में घी का ही काम करती. उससे हिंसा और भी भड़क सकती थी. तार्किक रूप से देखा जाए तो अपना टीपू विवादों में पड़ने के बजाय भाषणों में अधिक प्रभावशाली दिखाई देता.

दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस स्थिति को भांप लिया था. इसके पीछे के अपने राजनैतिक कारण निकाले जा रहे हैं. राजनैतिक पंडितों का सरप्लस भारत में सदैव से मौजूद रहा है. वैसे भी राजनीति में दो और दो चार नहीं होता है. वैसे देख कर आश्चर्य हुआ कि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था का हवाला दे कर यदि बंगाल में एक विपक्षी पार्टी के दो मुख्य नेताओं के हेलीकाप्टर उतरने से रोक लगा दी जाती है, तो यहाँ वही नियम लागू क्यो नहीं होता है. यहां तो वैसे भी लिखित चिट्ठी मौजूद थी. राजनैतिक पंडितों के यह भी तर्क है कि इस बड़े बवाल की पटकथा के पीछे प्रियंका गांधी के रोड शो का पराक्रम है. वैसे भी आज कल टीवी पर दिखना ज़्यादा आवश्यक हो गया है.

जो भी हो, लेकिन विवादों की लंबी लिस्ट में एक विवाद यह भी जुड़ गया है. इतनी आसानी से तो इसको हाथ से जाने नही दिया जाएगा. एक आश्चर्य की बात यह भी रही कि मुलायम पुत्र के बचाव में खुद किसी ज़माने में धुर विरोधी रही मायावती मैदान में उतर आई हैं. इस बार उनके तीर ट्विटर से चलाये गए हैं. उसी सोशल मीडिया से जिसको वह राजनीति में अप्रासंगिक मानती रही हैं . समय का एक खेल यह भी है. उनकी बोली और समाजवादी पार्टी की बोली में लेश मात्र भी असमानता नहीं थी. गेस्ट हाउस कांड की उस रात के बाद यह हृदय परिवर्तन अभूतपूर्व रहा है. मायावती क्षमाशीलता में एक मिसाल बन सकती हैं. इस ‘हाथ से हाथ’ मिलाने वाली राजनीति का यह चटख रंग देख राजनीति के छात्रों को मज़ा ज़रूर आ रहा होगा.

अभी तो 2019 के चुनावों में सारी पार्टियों का इंजन चालू हुआ है. एक बार तारीखें आने दीजिये, रेस में साम दाम दंड भेद वाली दौड़ को देखने में मज़ा आएगा.

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