जब आपके अपने घर में आग लगी हो तब आप पहले अपने घर की आग बुझाएंगे न कि दूसरे के घरों को बचाएंगे. पर ऐसा ही कुछ केरल में देखने को मिल रहा है. सबरीमाला के अय्यप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर कई महीनों से घमासान छिड़ा हुआ है जहाँ कई हिन्दू महिलाएं मंदिर में प्रवेश के लिए प्रतीक्षा करने को तैयार हैं. वहीं केरल की सरकार अपने ख़ज़ाने से सबरीमाला की सदियों से चली आ रही परम्परा को खंडित करने को आमादा है. इस विरोध में विडंबनाओं की सूची ही खत्म नहीं होती.
केरल में आई बाढ़ से हुई तबाही से अभी भी केरल उबर नहीं पाया है. अर्थव्यवस्था तहस नहस हो चुकी है. वो अलग बात है कि बाद में केंद्र सरकार पर मदद न करने का ठीकरा फोड़ा जा सकता है. केंद्र सरकार को विलन बना कर वोट मांगे जा सकते हैं. केरल भले ही देश के सबसे साक्षर राज्य हो पर यहाँ रोज़गार की कमी है. युवा इसीलिए गल्फ देशों में पलायन कर रहे हैं. अर्थव्यवस्था गल्फ के रिवर्स फ्लो से भी बिगड़ रही है.
लेकिन इन सब के अलावा सबसे बड़ी विडंबना यह है कि केरल सरकार द्वारा प्रायोजित इस विरोध प्रदर्शन में जो महिलाएं शामिल हैं वो बुरखे में लिपटी मुस्लिम महिलाएं हैं और ईसाई नन हैं जो अपना हर कार्य चर्च के नियमों के मुताबिक करती हैं. ये महिलाएं अपने खिलाफ हो रहे शोषण के खिलाफ शायद कभी आवाज़ भी न उठा पाएं. चाहे ट्रिपल तलाक हो या नन्स का पादरियों द्वारा शारीरिक हनन आपको ये महिलाएं कभी भी इन सब के खिलाफ आवाज़ उठाते नहीं दिखेंगी. इन सब के बीच फेमिनिस्टों ने भी अपने असलीे रंग दिखाएं हैं, एक बलात्कार की मारी नन और ट्रिपल तलाक की मारी मुस्लिम बहन के लिए जिनके मुंह से चूं तक नहीं निकली, वे मंदिर में प्रवेश के लिए दिन दोगुनी रात चौगुनी मेहनत कर रही हैं. जिन्हें मूर्ति पूजा वर्जित है आखिर क्यों वो एक मंदिर में Woman rights की आड़ में घुसना चाहती हैं.
जो महिलाएं एक पादरी द्वारा चरित्र हनन किये जाने पर एक शब्द नहीं बोल पाई आखिर क्यों वो मंदिर में प्रवेश करना चाहती हैं? और सबसे हैरानी की बात यह है कि इन सब का खर्चा सरकार उठा रही है. ऐसे तो कामरेड नास्तिक होते हैं, फिर इन्हें दूसरों के मंदिर जाने या न जाने की चिंता क्यों सता रही है? आखिर क्यों ये महिलाओं के मस्जिद जाने, पर्दा प्रथा और नन्स के चर्च प्रमुख बनने की मांग नहीं करते?
कम्युनिस्टों को किसी के हक की चिंता नहीं है, वो बस ये चाहते हैं कि हिंदुओं को नीचा दिखाया जाए, उन्हें रूढ़िवादी करार् दिया जाए और यह भ्रम फैलाया जाए कि हिन्दू महिलाओं को समानता का दर्जा नहीं देते. उनका मकसद केवल हमारे प्राचीन मंदिरों और परम्पराओं को तोड़ना है. उनका मकसद मंदिरों में कैरल्स और ज्ञानवापी मस्जिदें बनवाना है.
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