लोकतंत्र चार स्तंभों पर टिका है – न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया. लोकतंत्र को बचाए रखने में इन चारों ही स्तम्भों का योगदान है. परंतु बदलती परिस्थितियों में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ एक ऐसा स्तंभ बनता जा रहा है जिसकी नींव लगातार खोखली हो रही है. मीडिया निष्पक्षता की जगह एक पार्टी के आग्रह की बात करने लगे तो यह एक गंभीर विषय बन जाता है.
परसो शाम भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह को स्वाइन फ्लू होने और अरुण जेटली के स्वास्थ्य की खबरें आयीं. देश के सभ्य समाज द्वारा उनके अच्छे शीघ्र स्वास्थ्य की कामना की जाने लगी. एक सभ्य समाज में आपके वैचारिक मतभेद कितने भी पर संवेदना और मर्यादा का एक न्यूनतम स्तर होता है. इसके तहत समाज का एक स्थापित और अघोषित नियम है कि बीमार व्यक्ति के लिए अच्छी दुआएं की जाती हैं और किसी मृत के बारे में कुछ बुरा नहीं बोला जाता. पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर भी यह नियम उतना ही लागू होता है जितना सामान्य जन पर. इस नियम का पालन नहीं करने वाले स्वयं ही अपने आप को छोटा सिद्ध करते हैं.
क्विंट की पत्रकार स्तुति ने कल ट्वीट किया; “स्वाइन फ्लू से तो लोग मर जाते हैं न?”
इसके बाद NDTV की सुनेत्रा चौधरी ने ट्वीट किया; “ठीक है, मैं अपनी प्रतिक्रिया देती हूँ” और इसके बाद उन्होंने कुछ इमोजी भी साझा किए जिससे साफ था कि उनके मन में कितनी प्रसन्नता है.
किसी व्यक्ति की पीड़ा और उसके पारिवारिक दुख पर इस प्रकार से व्यंग्य कसना या उसे सेलिब्रेट करना दुखद ही नहीं बल्कि संस्कारों का एक प्रतिबिंब भी है. यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब ऐसे ट्वीट्स तथाकथित ‘पत्रकारों’ के एकाउंट्स से आते हैं. लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में ऐसा दीमक उस स्तम्भ को कमज़ोर ही करता है. अभिव्यक्ति की आज़ादी यदि आपके लिए किसी व्यक्ति की मृत्यु की कामना करने भर तक है, तो यह आपकी अभिव्यक्ति और आपकी सोच के स्वतः ही धरातल से रसातल पर गिर जाने का एक उदाहरण है.
सिर्फ एक ही व्यक्ति ने ऐसा किया हो, ऐसा नहीं है. आप ‘स्क्रॉल’ के पेज पर कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं देखेंगे तो समझ में आएगा कि समाज में यह बीमारी कितनी तेज़ी से फैल रही है. एक व्यक्ति ने कहा कि ‘स्वाइन फ्लू एफेक्टेड ए स्वाइन’; वहीं दूसरे ने लिखा ‘वेल, पिग्स आर ऑफेंडड’. ऐसे ही कई कमेंट्स हैं जो यह बताते हैं कि सभ्य समाज को किस प्रकार से ‘वैचारिक ज़हर’ पाले हुए दीमक खोखला कर रहे हैं.
ये लोग एक व्यक्ति से नफरत की सभी सीमाएं पार कर चुके हैं. हद तो तब हो जाती है जब यही लोग दूसरों पर ‘नफरत की राजनीति’ करने के आरोप लगाते हैं. सोशल मीडिया पर भी कुछ प्रतिक्रयाएं ऐसी आयीं जिन्हे सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण कहना काफी नहीं है.
यह ज़हर सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं, बल्कि 2009 में प्रधानमंत्री मोदी जी के लिए भी इन ‘लिबरल’ पत्रकारों ने उगला था. NDTV की सुनेत्रा चौधरी ने ट्वीट किया था कि नरेंद्र मोदी को स्वाइन फ्लू हुआ है. पता नहीं कि यह खबर मुझे क्यों रोमांचित कर रही है. यदि किसी की बीमारी आपके रोमांच का कारण बनती है तो आपका रोमांच बहुत ही फूहड़ दर्जे का है और यह संवेदना एवं मर्यादा के न्यूनतम स्तर से बहुत नीचे है. वहीं जब सोनिया गाँधी अपने इलाज के लिए जब भी विदेशों में जाया करती हैं, प्रधानमंत्री मोदी उनको ‘बेस्ट विशेज़’ वाली शुभकामनाएं हमेशा से देते रहे हैं. वैचारिक या राजनीतिक मतभेद इस संवेदना में बाधक नहीं बनता. यदि यह संवेदना समाप्त हो जाए तो समाज में कुछ भी स्वस्थ शेष नहीं बचेगा.
अमित शाह जी जल्द स्वस्थ हो कर राजनैतिक अखाड़े में उतर सकते हैं. आप इससे विचलित हैं तो राजनीतिक काट खोजिए उनका, न कि उनकी बीमारी को सेलिब्रेट करिए. अपनी संवेदना को मारकर भी की गयी बददुआ से भी आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे. अपना स्तर गिराने का शौक हो तो कोई बात नहीं. यही लोग ‘प्रेस्टीट्यूट’; ‘चमचा’; ‘ग़ुलाम’ इत्यादि शब्दों पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहते हैं कि देश में असहिष्णुता है. वहीं जब यह लोग आपको सरकार का समर्थन करने के लिए ‘भक्त’, ‘चड्ढी धारी’, ‘अनपढ़’; ‘जाहिल’, ‘व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पास आउट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपने लिबरलिस्म पर इतराते हैं, तब सहिष्षुणता की चिंता नहीं रहती इन्हे. भारत के टुकड़े-टुकड़े करने वालों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की वकालत यही लोग करते हैं. देश के चौथे स्तंभ में ऐसे दीमक देश के लोकतंत्र को ही कमज़ोर करते हैं.
सभ्य समाज में खुद को ‘वेल एजुकेटेड’ बताने वाले लोगों से बेहतर वे अंगूठ छाप हैं जो समाज की न्यूनतम संवेदना और मर्यादा का पालन करते हैं. राजनीतिक हित सिद्धि के लिए सामाजिक मूल्यों के प्रति दिखायी जाने वाली असहिष्णुता निंदनीय है. हम अमित शाह और अरुण जेटली के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हैं.



