जन्मदिवस की बधाई, नेताजी!

नेताजी को एक शब्द में परिभाषित करना हो तो वह शब्द होगा- विद्रोह. अन्याय और असमानता के विरुद्ध विद्रोह और संघर्ष ही नेताजी के जीवन का ध्येय रहा. प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढाई के दौरान जब एक अंग्रेज प्रोफेसर ने हिन्दू परम्पराओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की तो नेताजी ने कक्षा में ही उसकी पिटाई कर दी. उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज छोड़ना पड़ा लेकिन इससे उनके मिजाज में कोई फर्क नहीं पड़ा.

सन 1920 से सन 1947 तक का कांग्रेस का दौर गाँधी युग माना जाता है. गाँधी युग में सुभाष चन्द्र बोस एकलौते ऐसे नेता थे जो कांग्रेस में रहते हुए भी गाँधी जी के विचारों का खुलेआम विरोध करने का साहस रखते थे. गाँधी जी के लिए सम्मान का भाव रखते हुए भी सुभाष चन्द्र बोस ने हमेशा माना कि गाँधी के व्यक्तिगत प्रयोगों के लिए देशहित को दांव पर नही लगाया जा सकता. 1922 में चौरा-चौरी काण्ड के बाद महात्मा गाँधी ने अंतरात्मा की आवाज पर चरम पर चल रहे असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया. नेताजी ने गांधीजी के निर्णय को अलोकतांत्रिक मानकर इसका विरोध किया और कांग्रेस से त्यागपत्र देकर स्वराज दल के साथ चले गये. 1928 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस स्वयंसेवक दल के अध्यक्ष के रूप में जब सुभाष चन्द्र बोस सैन्य वेशभूषा में नजर आये तो गाँधी जी ने उन्हे सर्कस का रिंग मास्टर कहकर उनका मजाक उड़ाया. नेताजी को अपने मिजाज की कीमत इस रूप में भी चुकानी पड़ी कि युवा नेता के तौर पर गाँधी जी ने आधिकारिक रूप से जवाहर लाल नेहरु को आगे बढाया. सन 1929 में मोतीलाल नेहरु के बाद जवाहर लाल नेहरु को कांग्रेस का अध्यक्ष घोषित कर दिया गया.

इसके बावजूद देश भर में नेताजी की लोकप्रियता बढती रही. कांग्रेस के पदाधिकारियों के लिए बेशक गाँधी ही सर्वोच्च नेता थे लेकिन सन 1935 आते आते सामान्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के लिए सुभाष बाबू ही नेता बन चुके थे. कांग्रेस के अंदर के समाजवादी ब्लॉक में नेहरु खुद को सुभाष बाबू के सहयोगी के रूप में ही पेश करते थे. 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया गया. उनके विरोध में कोई भी उम्मीदवार खड़ा नही हुआ. इस तरह सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के निर्विरोध अध्यक्ष बन गए. लेकिन इस तीन दिवसीय अधिवेशन में सुभाष बाबू को गाँधी जी का असहयोग झेलना पड़ा.

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो चुका था. ऐसे में सुभाष चाहते थे कि भारत के सैनिकों को उस युद्ध से दूर रखने का प्रस्ताव पास हो और अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए 6 माह का अल्टीमेटम दिया जाए. लेकिन गाँधी जी इसके लिए सहमत नही थे. अध्यक्ष बनने के बाद नेताजी ने राष्ट्रीय योजना समिति बनाई जिसे भारत के आर्थिक उन्नति और औद्योगिकीकरण पर रिपोर्ट देनी थी. इसे गाँधी जी के चरखा अर्थव्यवस्था का विरोध माना गया. दोनों पक्षों में असहयोग और अविश्वास की खाई बढती गई.

1938 का साल नेताजी के लिए अच्छा नही रहा था. हरिपुरा अधिवेशन के बाद स्वास्थ्य कारणों से लगभग पूरे साल ही वह सक्रिय राजनीति से दूर रहे थे. लेकिन स्वस्थ्य लाभ के बाद सक्रिय राजनीति के लिए अब वह पूरी तरह तैयार थे. ऐसे में कांग्रेस के अगले अधिवेशन में भी अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी की अपनी इच्छा उन्होंने सन 1938 के दिसम्बर माह में ही सार्वजनिक कर दी थी. गाँधी जी इस बार नेताजी को अध्यक्ष पद से रोकने के लिए कृतसंकल्प थे. उन्होंने जवाहरलाल नेहरु से कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने को कहा लेकिन नेहरु ने भविष्य के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सुभाष बाबू के सामने दावेदारी पेश करने से मना कर दिया. मौलाना आजाद ने भी गाँधी के आग्रह को  ठुकरा दिया. ऐसे में आंध्र प्रदेश के नेता पट्टाभि सीतारमैया को गाँधी गुट के उम्मीदवार के रूप में तैयार किया गया.

जबलपुर जिले के त्रिपुरी गाँव में 1939 का कांग्रेस अधिवेशन हुआ. कांग्रेस के तमाम बड़े नेता सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ और गाँधी के साथ थे. नेताजी के खिलाफ एक घृणित अभियान चलाया गया जिसमें उन्हे शराबी और अय्याश तक बताया गया. यह अभियान कितना घटिया था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नेताजी की देखभाल के लिए अक्सर उनके साथ रहने वाली उनकी भतीजी और नेताजी के सम्बन्धों पर भी कीचड़ उछाला गया. मतदान से दो दिन पूर्व तेज ज्वर ने नेताजी को जकड़ लिया. ऐसे में वे कार्यसमिति को सम्बोधित करने और अपनी कार्य योजना प्रस्तुत करने में भी सक्षम नही थे. अब यह तय माना जाने लगा कि पट्टाभि सीतारमैया सुभाष बाबू को बुरी तरह पराजित करेंगे. लेकिन जब 29 जनवरी को परिणाम आये तो पूरा देश चौंक गया. सुभाष बाबू को 1580 मत मिले थे, वहीं सीतारमैया को 1377 मतों से ही संतोष करना पड़ा था. गाँधी जी ने सीतारमैया की हार को अपनी पराजय बताया.

सुभाष बाबू ने गाँधी जी के नॉमिनी को कार्यकर्ताओं के जोश से हरा तो दिया था लेकिन कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के खिलाफ होने के कारण वे पार्टी चलाने में सक्षम नही थे. ऐसे में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर फॉरवर्ड ब्लाक का गठन किया. द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार ने भारत के नेताओं की राय जाने बिना, भारत को भी युद्ध का हिस्सा बना दिया. इसके विरोध में सुभाष बाबू ने कलकत्ता में आन्दोलन आरम्भ कर दिया जिसके नतीजे में पहले जेल और फिर घर पर ही सुभाष बाबू को नजरबंद कर दिया गया. सुभाष बाबू मानते थे कि द्वितीय विश्वयुद्ध भारतीयों के लिए एक मौके के तौर पर आया है जिसका लाभ हर हाल में उठाना चाहिए. ऐसे में जब भारत में कांग्रेस से उन्हें कोई आशा नही रही तो उन्होंने देश से बाहर जाकर संघर्ष का निश्चय किया.

अफ़ग़ानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंचकर सुभाष बाबू ने जब राष्ट्र के नाम सन्देश पढ़ा तो भारत में उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी थी. जर्मनी से जापान पहुंचकर नेताजी ने जब आजाद हिन्द फ़ौज का गठन किया. यह सन 1857 के 85 वर्षों बाद स्वतन्त्रता के लिए पहले सैन्य संघर्ष की घोषणा थी. संसाधनों के अभाव में आजाद हिन्द फ़ौज अपने पूर्ण लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रही लेकिन इसने ब्रिटिश भारतीय सेना में राष्ट्रभक्ति और आत्मसम्मान का भाव जगाकर भारत में अंग्रेजी शासन के टिकने की आखिरी सम्भावना को भी समाप्त कर दिया.

सुभाष बाबू के जीवन का अंत कैसे हुआ, यह आज भी एक पहेली है. उन्होंने हमेशा ही साध्य को साधन से अधिक महत्व दिया. उन्हें आजादी अहिंसा से अधिक प्रिय थी. विचारों से वे सेंटर-लेफ्ट थे लेकिन देश की स्वतंत्रता के लिए नाजी जर्मनी और विस्तारवादी जापान से सहायता लेने में उन्हें कोई दिक्कत न थी. उनके समकालीन नेताओं ने उन्हें जितना नकारने की कोशिश की, भारत की जनता के हृदय में वे उतने ही गहरे उतरते गये. दिनोंदिन उनकी स्वीकार्यता बढती ही गई. महाराष्ट्र के जनमानस में क्षत्रपति शिवाजी महाराज को, राजस्थान के जनमानस में महाराणा प्रताप को और गुजरात के जनमानस में सरदार पटेल को जो स्थान प्राप्त है, पश्चिम बंगाल के जनमानस में वही स्थान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का है.

नेताजी के जीवनकाल में भी और उसके बाद भी उनके लिए निकृष्टतम शब्दों का प्रयोग करने वाले कम्युनिस्ट हों, दल छोड़ देने के लिए मजबूर करने वाले कांग्रेसी हों, भाजपाई हों या तृणमूल कांग्रेसी हों, नेताजी सबके लिए पूज्य हैं. ऐसे विभूति किसी राज्य के नहीं, राष्ट्रीय धरोहर होते हैं.