उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के अल्मोड़ा जिले में एक बुजुर्ग थे जो अक्सर हमारे स्कूल के रास्ते में शराब के नशे में पाए जाते थे. वह स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बताते थे, उनको इसके लिए ताम्र-पत्र भी मिला था.
ताम्र-पत्र हम लोगों को तब दिखा था जब वह किसी और के आंगन में खड़े पेड़ को काटने पहुँच गए थे और विरोध होने पर उन्होंने कहा था; “ये देखो! मेरे पास स्वतंत्रता सेनानी होने का ताम्र-पत्र है. मैं किसी के भी आँगन का पेड़ काट सकता हूँ.” उनका व्यक्तित्व स्कूल की किताबों में पढाये जाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों से बिलकुल मेल नहीं खाता था.
लेकिन समय और समझ, दोनों के अभाव में हमने कभी इस बात पर ज्यादा विचार नहीं किया. हम सब उनको एक स्वतंत्रता सेनानी ही मानते थे और आम बुजुर्गों से थोड़ा ज्यादा सम्मान देते थे.
एक दिन स्कूल से लौटते समय देखा कि उनके हमउम्र 7-8 लोग जो स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, उनको पीट रहे थे. कोई चोरी का मामला था. जब तक हम लोग पहुंचे, पिटाई लगभग समाप्त हो चुकी थी और प्रश्नोत्तर और विवेचना का दौर चल रहा था. अचंभित होकर हम लोगों ने पूछा; “बुबू! ये तो सेनानी हैं, इनको तो सम्मान देना चाहिए, आप लोग मार रहे हो?”
एक कम उम्र के दादा जी ने बताया; “अरे! किस बात का सेनानी? लीसा-चोर था ये. अंग्रेज ठेका देते थे चीड़ के जंगलों में से लीसा (Resin) निकालने का और और ये रात को ठेकेदारों का लीसा चुराता था. एक बार पकड़ा गया और जेल चला गया. तभी सुराज आया (आजादी मिली) और क्लर्क को इसने ये बोला कि मैं भी क्रांतिकारी था और इसीलिए अंग्रेजों ने मुझे जेल भेज दिया. ये तो बचपन से ही चोर था, पहले ककड़ी चुराता था, फिर मुर्गियां चुराता था. जब लीसा चुराने लगा तब पकड़ा गया.”
आज भी बहुत सारे चोर हैं जो ‘सेनानी’ बने एवं ‘पद्म’ और ‘चक्र लिए घूम रहे हैं.
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