राजनीतिक लाभ के लिए नेताओं द्वारा शाम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाना आम बात है. लेकिन यदि केवल वोट बैंक के लिए देश को बांटने या अलग संविधान की बात की जाए तो दुःख होता है. वास्तव में नेताओं द्वारा सैनिकों की शहादतों से लेकर देश के तिरंगे तक का उपयोग वोट मांगने के लिए किया जा रहा है. कुछ नेता तो खुले मंच से देश से अलग होने का ऐलान कर रहे हैं.
ऐसा ही एक बयान सोमवार शाम सामने आया. यह बयान कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का था. उमर अब्दुल्ला सोमवार को कश्मीर के बांदीपुरा में एक रैली को संबोधित कर रहे थे, तब उन्होंने कहा आज हमारे ऊपर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं, तरह-तरह की साजिशें रची जा रही हैं. बड़ी ताकतें जम्मू कश्मीर की पहचान मिटा देना चाहती हैं.
देश की बाकी रियासतें बिना शर्त के हिंदुस्तान के साथ मिल गईं. हमने शर्तें रखीं और हम मुफ्त में नहीं आए. हमने अपनी पहचान बनाए रखने के लिए मांग की थी हमारा अपना संविधान होगा, अपना झंडा होगा. उमर यहीं नहीं रुके उन्होंने अलगावादियों की भाषा बोलते हुए कहा उस समय हमने अपना अलग वजीर-ए-आजम (प्रधानमंत्री) और सदर-ए-रियासत रखा था जिसे वापस लाया जाएगा.
बता दें कि उमर अब्दुल्ला के बयान से पहले जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का बयान भी सामने आया था. महबूबा ने कहा था कि यदि धारा 370 को समाप्त करने का प्रयास किया गया तो कश्मीर का भारत से रिश्ता खत्म हो जाएगा.
उमर अब्दुल्ला का यह बयान अमित शाह के एक इंटरव्यू व अरुण जेटली के लेख का उत्तर जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार 2020 तक अनुच्छेद 35A व 370 को समाप्त कर देगी. यह दोनों ही ’35A व 370′ कश्मीर को भारत से अलग दिखाते हैं, जिस कारण कई बार कश्मीर की वास्तविकता पर भी अंदेशा होता है. साथ ही कश्मीर के वर्तमान हालात के लिए भी यह यह दोनों ’35A व 370′ ही ज़िम्मेदार हैं.
धारा 370 के अंतर्गत ही 35A को निरूपित किया गया था. इन अनुच्छेदों के तहत सिर्फ रक्षा, विदेश नीति, फाइनेंस व संचार जैसे मामलों में ही भारत सरकार दखल दे सकती है. राज्य की नागरिकता, प्रॉपर्टी का ओनरशिप और अन्य सभी मौलिक अधिकार राज्य के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं. इन मामलों में किसी तरह का कानून बनाने से पहले भारतीय संसद को राज्य की अनुमति लेनी जरुरी है.
अलग प्रॉपर्टी ओनरशिप होने की वजह से किसी दूसरे राज्य का भारतीय नागरिक जम्मू-कश्मीर में जमीन या अन्य प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता है. देश में भले ही एकहरी नागरिकता का नियम है लेकिन 370 की वजह से जम्मू-कश्मीर के मामले में दोहरी नागरिकता काम करती है. एक देश की और एक इस राज्य की. जम्मू-कश्मीर के नागरिक तो भारत के नागरिक होते हैं, लेकिन भारत के नागरिक जम्मू-कश्मीर के नागरिक नहीं हो सकते.
अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिन्ह भी है. जबकि सरकार चाहती है कि पूरे देश में एक समान नियम-कानून लागू हो. यदि इन दोनों अनुच्छेदों को हटा दिया जाए तो कश्मीर में निश्चित तौर पर शांति व्यवस्था कायम हो सकती है. कश्मीर के नेता यह नहीं चाहते, क्योंकि यदि ऐसा हो गया तो इनका बड़ा बोट बैंक कमज़ोर हो सकता है.
